Wednesday 4 January 2012

दलितों की बारी कब आएगी राहुल ...

मेरा अभी भी मानना है कि कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी के बारे में कुछ लिखना, पढ़ना सिर्फ समय खराब करने से ज्यादा कुछ नहीं है। राहुल जब से राजनीति में आए हैं, अगर हम जानना चाहें कि उन्होंने इस दौरान किया क्या है ? तो मुझे तो सिर्फ दो बातें याद आ रही हैं। पहला उन्होंने घूम घूम कर दलितों के घर भोजन किया और दूसरा वो भारतीयों की दुर्दशा से इतने परेशान है कि अब उन्हें भारतवासी होने पर शर्म आती है। मेरा एक सवाल है राहुल गांधी से आखिर दलितों के घर कब तक भोजन करते रहेंगे, कभी दलितों की भी बारी आएगी, जब उन्हें राहुल खुद अपने हाथ से भोजन कराएं।  
देश की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस की पूरी राजनीति गांधी परिवार के ही इर्द-गिर्द घूमती रहती है। बीमारी के बाद सोनिया गांधी स्वस्थ तो हैं, पर पहले की तरह एक्टिव नहीं हैं। चूंकि कांग्रेसियों को गांधी परिवार के अलावा किसी और का नेतृत्व स्वीकार ही नहीं है, इसलिए अभी से राहुल बाबा को कमान सौंपने के लिए एक ग्रुप पूरी ताकत से जुट गया है। बहरहाल ये उनका घरेलू मामला है, मैं इसमें क्या कहूं, लेकिन हां अगर राहुल के हाथ में सरकार की कमान आती है तो देश का दुर्भाग्य ही होगा, क्योंकि मेरा मानना है कि राहुल गांधी से बेहतर है कि जिस दलित के यहां भोजन कर राहुल कुर्सी पाने की कोशिश कर रहे हैं, उस दलित को ही कुर्सी सौंप दी जाए। कम से कम उसे ये तो पता है ना कि गरीबी क्या होती है। आटा चावल दाल की कीमत भी वो जानता है। बहरहाल.....
मेरे मन में कई दिन से एक सवाल है। अगर अखबार में राहुल गांधी की कोई खबर है तो सिर्फ यही की वो यूपी के किसी गांव में दलित परिवार के घर पहुंचे और उनके यहां भोजन भी किया। विदर्भ की कलावती के यहां से शुरू हुआ भोजन का ये सिलसिला कब थमेगा, ये तो मैं नहीं कह सकता। लेकिन इतना तो जरूर है कि जिस दिन अखबारों ने ये तस्वीर छापनी बंद कर दी, तो यकीन मानिये ये सिलसिला भी थम जाएगा। अच्छा राहुल के गांव पहुंचने की एक खास बात और होती है, उनके आने की जानकारी जिला प्रशासन को नहीं होती है, लेकिन अखबार बालों को दी जाती है, जिससे कम से कम कैमरे तो वहां पहुंच ही जाएं।
चलिए आपके भोजन करने से भी हमें कोई ऐतराज नहीं है। मैं जानता हूं कि दलित तो बेचारे अतिथि देवो भव  को मानने वाले हैं, देर रात कोई भी भूखा अगर उनके यहां आएगा, तो उसे अपने हिस्से की भी रोटी खिला देगें। लेकिन बड़ा सवाल ये है कि राहुल गांधी दलितों के यहां भोजन किस भाव से करते हैं। क्या उन्हें सच में भूख इतनी तेज लगी होती है, कि वो होटल पहुंचने का इंतजार नहीं कर पाते और दलित के यहां बैठ जाते हैं खाना खाने। या वो छोटे-बडे़, जात-पात में अंतर नहीं समझते  हैं, ये संदेश लोगों को देना चाहते हैं, इसलिए उनके बीच भोजन करते हैं। या फिर दलित की रोटी से अपनी सियासत की भूख को शांत करते हैं।
इन सवालों का जवाब तो राहुल ही दे सकते हैं, लेकिन मैं दलितों की ओर से कुछ कहना चाहता हूं। क्योंकि राहुल से दलित बेचारे तो ये बात कह नहीं सकते। इसलिए मैं कहता हूं, वो  भी पूरी जिम्मेदारी के साथ। राहुल अगर दलित के यहां भोजन करना ड्रामेबाजी नहीं है, इसमें गंभीरता है, तो बहुत भोजन तुमने दलितों के यहां कर लिया। अब दलितों की बारी हैं। उन्हें भी अपने घर बुलाओ और जैसे तुम डाईनिंग टेबिल पर खाना खाते हो, वैसे उन्हें भी अपने बराबर बैठाकर भोजन कराओ। दलितों ने तुम्हें सोने के लिए अपनी सबसे साफ चादर सौंपी, तुम उन्हें भी अपने बेडरुम में एक रात गुजारने का मौका दो। अगर ऐसा करते हो, तब तो हुई बराबरी की बात, वरना ये फोटो छपवाते रहो, इसका अब किसी पर असर नहीं हो रहा।
चलिए आपसे भी एक सवाल पूछता हूं। राहुल गांधी किसी भी गांव में पूरे काफिले के साथ रात के दस ग्यारह बजे किसी वक्त पहुंच जाते हैं और वहां दलित परिवार का दरवाजा खटखटा दिया जाता है। दिल्ली में अगर दलित परिवार अचानक रात में राहुल गांधी के घर तो दूर आसपास भी पहुंच जाए तो तस्वीर तो उसकी भी छप जाएगी अखबारों में, लेकिन फोटो के नीचे ये नहीं लिखा होगा कि दलित परिवार के लोग अपनी समस्या लेकर राहुल से मिलने आए थे, और सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें मार गिराया, बल्कि ये लिखा होगा कि राहुल गांधी पर हमला करने आए लोगों को पुलिस ने मार गिराया। दलितों के शव के पीछे कुछ पुलिसकर्मी खड़े होंगे और ये तस्वीर सभी अखबारों को जारी कर दी जाएगी। खैर मेरा तो यही मानना है, आप हो सकता है कि इस बात से सहमत ना भी हों।
अच्छा लोगों से मिलने राहुल कभी भी कहीं भी चले जाते हैं, लेकिन उनसे मिलने यहां कोई नहीं आ सकता। अन्ना के गांव रालेगावसिद्धि से पंचायत प्रतिनिधि दिल्ली राहुल गांधी से मिलने आए। उन्हें कांग्रेस के सांसद ने ही राहुल गांधी से मिलने को बुलाया था। दो दिन तक बेचारे यहां धक्के खाते रहे, लेकिन राहुल दिल्ली में होने के बाद भी नहीं मिले। बाद में सांसद ने तो माफी मांग ली, राहुल गांधी ने तो ऐसी चुप्पी साधी जैसे उन्हें कुछ पता ही नहीं।
बहरहाल मैं तो इसी मत को हूं कि अगर कोई मुझे एक बार भोजन कराए, तो मेरी कोशिश होती है कि उसे दो बार भोजन करा दूं। लेकिन गांधी परिवार में ये प्रचलन नहीं होगा, उनके यहां सिर्फ दूसरों का भोजन गटकने का ही प्रचलन होगा। तभी तो तीन चार साल से राहुल दर दर जाकर लोगों की रोटी तोड़ रहे हैं, लेकिन उन्हें रोटी खिलाने की कभी नहीं सोच रहे।

23 comments:

  1. आपकी यह सुन्दर प्रविष्टि जागरण जंक्शन डॉट कॉम पर लिंक की जा रही है...धन्यवाद

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  2. ब्लॉग जगत में इस नवोदित ब्लॉग का इस सुन्दर कृति के साथ स्वागत है

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  3. आगाज बहुत सुन्दर हुआ...स्वागत और बधाई

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  4. राजनीति घिनोना खेल है ..हम सभी इस से भली भाँती परिचित हैं..
    kalamdaan.blogspot.com

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  5. आगाज सुन्दर,ब्लॉग का स्वागत है .

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  6. हमारे पुराने ब्लॉग ‘वेद क़ुरआन‘ पर आपके नए ब्लॉग पर आमंत्रित करती हुई टिप्पणी मिली,
    सो यहां चले आए इस नए ब्लॉग के स्वागत के लिए
    मुबारक हो आप सभी को ।
    राजनेता लोग जो भी करते हैं वह सत्ता के लिए करते हैं। उससे जनता का भला कम और उनका भला ज़्यादा होता है। जो पार्टियां कांग्रेस नहीं हैं। वे भी इसी तरह की ड्रामेबाज़ी करती रहती हैं।
    क्या इन सबके बारे में लिखना ही समय ख़राब करना नहीं है ?
    तब तो ताज़ा राजनीतिक हलचल के बारे में लिखना ही बंद हो जाएगा।
    दरअस्ल ये राजनेता तभी तक ड्रामेबाज़ी कर रहे हैं जब तक कि जनता ख़ुद अपने परिवार के लिए और अपने आसपास के लिए ठोस काम नहीं करती।
    लोग अपने आस पास ठंड से ठिठुरते हुए ग़रीब लोगों को देखते रहते हैं लेकिन वे उन्हें अपने पुराने कपड़े तक नहीं देते। हरेक मध्यमवर्गीय घर में ऐसे कपड़ों का ढेर लगा हुआ है, जिन्हें पहनना बंद किया जा चुका होता है।
    संवेदनाहीन समाज का नेतृत्व खुद ब खुद ऐसे ही लोगों के हाथों में चला जाता है। जिन्हें समस्याओं के वास्तविक समाधान से कोई दिलचस्पी नहीं होती। नेता हमारा नुमाइंदा है। हमारा नेता हमारी सामूहिक प्रवृत्ति का प्रतिबिंब और सूचक है। हम अच्छे और गंभीर होंगे तो हमारा नेता भी अच्छा और गंभीर होगा।

    ऐसे लोग भी हुए हैं जिन्होंने ग़रीबों को अपने गले लगाया है और दिल से लगाया है। उनके बारे में और उनके तरीक़े के बारे में कम ही कोई लिखता है।
    प्रस्तुत लेख ऐसा ही है। इस लेख पर आपका सादर स्वागत है।


    ♥ सूफ़ी
    साधना से आध्यात्मिक उन्नति आसान है Sufi silsila e naqshbandiya
    http://vedquran.blogspot.com/2012/01/sufi-silsila-e-naqshbandiya.html

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  7. बेसुरम ने काफी अच्छा सुर छेड़ा है ..

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  8. सही कहा आपने...मै आपसे सहमत हूँ!...नूतन वर्ष की मंगलमय ढेरों शुभकामनाएं!

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  9. शब्दश: सत्यान्वेषण ...

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  10. I admire you friend for a thoughtful post ,magician always hide the facts,it is needed to understand reality .they are no side of any culture, religion . nothing except chameleon .

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  11. बहुत सुन्दर लेख बधाई |
    आशा

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  12. कांग्रेस पार्टी गाँधी परिवार के आस पास ही घूमती है यह सच है और घूमे भी क्यों ना देश के नाम इस परिवार के बलिदान जो हैं | लेकिन एक नयी शुरुआत हो चुकी है पी वी नर सिंघा राव और मनमोहन सिंह के रूप में दो ऐसे प्रधान मंत्री कांग्रेस ने दिए हैं जो गाँधी परिवार के नहीं हैं .......इस लिए परिवार वाद की बहस अब बंद होनी चाहिए | रहा सवाल राहुल जी दलितों की रोटी क्यों तोड़ रहे हैं .....अगर दलितों के घर ना जाएँ तो भी यह जनता उनका जीना मुश्किल कर देगी और फिर लेख छपने लगेंगे " राहुल क्या जाने दलितों की रोटी " एक कुशल राजनेता के रूप में निर्विवाद नेता हैं राहुल जी | .....आज ऐसे लेख नहीं छपे जा रहे हैं जहाँ बहुजन समाज पार्टी की नेता शायद ही कभी किसी दलित की झोपड़ी में गयीं हों ....एक ऐसा तानाशाही रवैया जहाँ सब दरी पर बैठते है और सिर्फ एक कुर्सी रखी जाती है ....क्या कभी एक दूसरा मुख्यमंत्री ब.स .पा उत्तर प्रदेश को दे सकेगी शायद नहीं .... क्या कभी भुख मरी के कगार पर आ चुके सवर्णों के जख्मो पर यह पार्टी मरहम लगा सकेगी ? इस लोकतंत्र में सामाजिक चिंताओं पर आखिर इस लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ मीडिया कब जागेगी ? कम से कम आज के दलितों के राजशी ठाट.बाट पर मीडिया के शब्द मौन क्यों हैं |
    फिलहाल आपका चिंतन सराहनीय है , पर विचार धारा तो विचार धारा होती है सहमत होना आवश्यक नहीं .

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  13. गाफिल जी,प्रश्न तो आपने अच्छा उठाया,किन्तु कांग्रेस में ये सम्भव नही
    कारण कांग्रेस में गांधी परिवार के अलावा अन्य नेता स्वीकार नही,राजनीत
    में तो सभी पार्टियां इस तरह के हथकंडे करती रहती है,ये कोई नई बात नही,....आपका आगाज सुंदर लगा,..बधाई ..
    WELCOME to new post--जिन्दगीं--

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  14. राहुल की राजनीतिक दांव-पेंच का अच्छा विश्लेषण।

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  15. अकाट्य तर्कां के साथ सत्य की साहसिक प्रस्तुति...पूर्ण सहमति

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  16. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि-
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ...!

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  17. मंद बुद्धि को पता ही नहीं है की करना क्या है इसलिए बुद्धि के मामले में दलितों के आसपास ही रहता है .

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