Thursday, 5 January, 2012

आशा ...

     जब कभी इंसानी फितरत के बारे में सोचो, तो न जाने क्यूँ बहुत अचंभा सा होता है। इंसान की ही क्यूँ, बल्कि अगर यह कहा जाये, कि भगवान की भी ऐसी ही कुछ फितरत रही थी उस युग में जब राम राज हुआ करता था। तो शायद गलत नहीं होगा। हमेशा जो है, उसमें संतुष्ट रहते हुए आगे बढ़ना तो जैसे इंसान ने कभी सीखा ही नहीं, हमेशा जो पास है उसे छोड़कर नये की तलाश में हमेशा ही भटकता रहा है इंसानी मन। अक्सर यह दोस्ती के रिश्ते में बड़ी आसानी से देखा जा सकता है, कि नये दोस्त मिलने के बाद बहुत से लोग अक्सर पुराने दोस्तों को भूल जाया करते हैं और जब उस भूलाए हुए दोस्त की महत्ता समझ आती है। तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। दोस्ती ही क्या और भी ऐसे कई रिश्ते हैं जिनमें यह भावना निहित होती है। मगर मेरा सवाल यह है, कि अपना बागीचा छोड़कर, हमेशा पड़ोसी के बागीचे की घास ही क्यूँ ज्यादा हरी नज़र आती है और जब तक समझ आता है कि  अपनी भी बुरी नहीं है, तब तक अपने बागीचे की घास सूख चुकी होती है। अजीब भावनाओं का खेल है यह, मैं तो जब सोचने लगती हूँ तो ऐसा लगता है, जैसे सारे विचार आपस में बस उलझते ही चले जा रहे हैं। इसे जुड़ा एक छोटा सा किस्सा है, या कहानी कह लीजिये जो मैं आपके साथ सांझा करना चाहती हूँ। वैसे तो बात बहुत पुरानी है और इस विषय पर आधारित न जाने कितनी फिल्में और धारावाहिक बन चुके हैं। मगर फिर भी हर बार देखने और पढ़ने पर भी ऐसे सभी किस्से मार्मिक ही लगते हैं। यह कहानी है एक गोद ली हुई मासूम बच्ची की, जिसका नाम था "आशा" 


     एक विवाहित दंपत्ति ने एक छोटी सी बच्ची को गोद लेने का सोचा, क्यूंकि उनके स्वयं अपनी कोई संतान ना थी। तब उन्होने निर्णय लिया एक बच्ची गोद लेने का, बच्ची भी चुनी तो ऐसी, जिसे देखकर कोई भी मोहित हो जाये...गोरा-गोरा रंग, काली-काली झील सी गहरी आँखें , गुलाबी होंठ, घुंगराले बाल जैसे इंसान की बच्ची नहीं कोई गुड़िया हो, बड़े प्यार और दुलार के साथ उसे घर लाया गया परवरिश भी बड़े प्यार से की जा रही थी। उसका नाम "आशा" रखा गया ऐसे ही समय व्यतीत होता गया बच्ची पूर्णिमा के चाँद की तरह धीरे-धीरे बड़ी होने लगी अभी वो 5-6 साल की हुई ही थी, कि उनके घर उनकी अपनी संतान ने जन्म लिया। वह भी एक बेटी ही थी, देखते ही देखते घर का माहौल बदलने लगा आशा के साथ सौतेला व्यवहार होने लगा। उसकी माँ तो जैसे भूल ही गई, कि  आशा भी उस ही घर की संतान है। हिस्सा है उस घर का, उस से उसके पिता का ज़रूर थोड़ा बहुत लगाव बना रहा। मगर जिस उम्र की आशा थी उस उम्र में अक्सर बच्चों को पिता की अपेक्षा माँ की जरूरत ज्यादा हुआ करती है। आशा के पिता ने कई बार अपनी पत्नी को समझाने का प्रयास भी किया, कि जो तुम आशा के साथ कर रही हो वह ठीक नहीं है। किन्तु उसकी समझ में ना आया। यहाँ तक के आशा की माँ ने स्कूल में उसका दाखिला भी नहीं करवाया था। दिन यूं ही बीत रहे थे कि एक दिन आशा की छोटी बहन बाहर बागीचे में खेल रही थी। तभी एक काला साँप उसके पास आकर बैठ गया। हालांकी अभी तक उस साँप ने आशा की बहन को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया था। तब अचानक आशा की माँ की नज़र उस पर पड़ी ,नज़र पड़ते ही वह ज़ोर-ज़ोर से मदद के लिए चिल्लाने लगी बचाओ-बचाओ कोई तो बचाओ मेरी बच्ची को। उसकी चीख पुकार सुन मुहल्ले के सभी लोग उनके घर के सामने एकत्रित हो गए। मगर किसी की हिम्मत नहीं हुई कि आगे बढ़कर सहायता कर सके। सब के सब डरे सहमे से बस देख रहे थे। अब तक उस साँप ने बच्ची को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया था। तभी इतना शोरगुल सुन आशा वहाँ आ पहुंची और उसने उस साँप को उठा कर फेंक दिया मगर फेंकते-फेंकते उस साँप ने आशा को डस लिया और कुछ ही क्षणों में उसकी वहीं मौत हो गई। तब उसकी माँ को अपने किए पर बेहद पछतावा हुआ। मगर अब उस पछतावे के अलावा और कुछ शेष बाकी ना था। जब उनकी अपनी बच्ची का स्कूल दाखिला होने की नौबत आई तब उन्होने अपनी उस बच्ची का ना "आशा"लिखवाया। 

     क्यूँ हमेशा ही ऐसा करते हैं लोग, खास कर ऐसे किस्सों में यही बात हमेशा बाहर निकल कर आती है कि अपना-अपना ही होता है और पराया -पराया ही होता है। फिर भले ही अपने ने चोट और पराये ने मरहम ही क्यूँ न दिया हो। युगों-युगों से यही प्रथा चली आ रही है। कैकयी को ही ले लीजिये उन्हें राम से बेहद प्रेम था। दुनिया जानती है उन्हें भरत से प्यारे राम थे, किन्तु राज्य अभिषेक की बात आते ही मंथरा के कहने पर उनको अपने पति राजा दशरथ से लिए हुए तीन वचन याद आ गये। जिसके चलते उन्होने भरत के लिए राज्य अभिषेक चुना और जान से ज्यादा प्यारे राम के लिए वनवास। कहाँ चली गयी उस वक्त उनकी वो ममता जो मात्र एक दासी के कहने पर उन्होने इतना बड़ा और कठिन निर्णय ले डाला। मगर उनको भी दोनों में से किसी एक पुत्र का सुख भी न मिल सका, राम तो गए ही थे वनवास मगर भरत ने भी उनका चेहरा ना देखा और उनके पास भी यदि कुछ शेष बचा तो वह था केवल पछतावा। 



     क्यूँ कुछ नहीं सीख पाते हम इतिहास से और दुहराते रहते हैं वहीं गलतियाँ बार-बार, जिन्हें करने के बाद केवल हमेशा पछतावा ही हाथ लगता है शेष कुछ भी नहीं ... 

12 comments:

  1. बढ़िया जानकारी इक बार हमरे ब्लॉग को बी देखे

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  2. pallvi ji apka chintan nishchay hi yh sochane pr vivash karta hai ki moh ka jal kahi ghatak hai pr moh ki apni upyogita bhi hai .... prakriti agar moh na de to ma bachhe ki parvarish hi nahi karegi ...aur prakriti ka santulan hi bigad jayega ... es liye prakriti vad hi sarvshreshth jivan shaili degi ...

    ap ne bahut hi sundar vishay ko uthaya hai eske liye apko vishesh abhar ke sath hi badhai

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  3. किर्ती जी और नवीन जी आप दोनों का बहुत-बहुत आभार कृपया यूं हीं समपर्क बनाये रखें धन्यवाद....

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  4. पल्लवी जी! आपने तो पहली गेंद पर ही छक्का जड़ दिया...वाह! बहुत ख़ूब
    आपकी इस सुन्दर प्रविष्टि को जागरण जंक्शन पर लिंक किया जा रहा है। आभार

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  5. धन्यवाद... गाफिल जी हौंसला अफ़ज़ाई के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया

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  6. आपके इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा आज दिनांक 06-01-2012 को चर्चा मंच पर भी होगी। सूचनार्थ

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  7. शुक्रवार भी आइये, रविकर चर्चाकार |

    सुन्दर प्रस्तुति पाइए, बार-बार आभार ||

    charchamanch.blogspot.com

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  8. मार्मिक प्रसंग व्यावहारिक टिपण्णी आपने खुद ही कर दी सवाल भी किए और उनके ज़वाब भी क्यों समाज अपनी गलतियों से नहीं सीखता और इसीलिए इतिहास अपने को दोहराता है .गलतियाँ पुनर बलित होतीं हैं .

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  9. सुन्दर प्रस्तुति

    Gyan Darpan
    ..

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