Wednesday, 11 January, 2012

कुछ उलझे हुए विचारों से उत्पन्न कुछ सवाल .....


कहने को फिर 26 जनवरी आने वाली है जिस दिन हम अपना स्वनिर्मित संविधान आत्मार्पित कर अँग़्रेजी कानूनों से भी स्वतन्त्र हो गये थे इस विषय पर बहुत सोचने  पर मुझे ऐसा लगा जैसे मैं कुछ सवालों के घेरे में बस उलझती ही चली जा रही हूँ। क्या मेरे इन सवालों का कोई जवाब है आपके पास...? आज हमारे देश को आज़ाद हुए इतने साल हो गये मगर क्या वाकई आज भी हम उसी श्रद्धा से मनाते हैं इस राष्ट्रीय पर्व को ? क्या दे पाते है इस त्यौहार को वही मान- सम्मान जो वास्तव में हमे इसे देना चाहिए...शायद नहीं कम से कम यदि मैं अपने दिल कि बात कहूँ तो ज़रा भी नहीं सिर्फ़ 26 जनवरी पर जोश भरे गीत गा लेने या सुन भर लेने से, या मिठाइयाँ बांटने भर से ही पूरा नहीं हो जाता देश के प्रति हमारा कर्तव्य। यह त्योहार हम हिंदुस्तानियों के लिए उतना ही महत्वपूर्ण होना चाहिए, जितना कि हमसे जुड़े हमारे रिश्ते, हमारी ज़िंदगी,वास्तव में नए साल की तरह इस दिन भी हमको देश के प्रति अपने फर्ज़ और कर्तव्यों का पालन करने का प्रण लेना चाहिए। जो शायद हम लेते तो हैं, मगर कभी उस पर ईमानदारी से चल नहीं पाते। आज कल तो इन नेताओं कि वजह से, तो प्रण के भी मायने बदल गए है।

हालाकी इस दुनिया में सभी लोग एक से नहीं होते अगर बुरे लोग हैं, तो इस दुनिया में अच्छे लोगों की भी कमी नहीं है। मगर साधारण तौर पर नज़र उठाकर देखो तो कहीं कोई अच्छा होते हुए भी अच्छा नज़र नहीं आता। हर किसी पर विश्वास से पहले संदेह होता है, क्यूंकि ना जाने ज़िंदगी में आगे चलकर कौन कैसा निकले। यूँ तो ज़िंदगी है ही एक जुआ जहां हर एक मोड़ अपने आप में कौन सी गहराई लिए खड़ा है, यह कोई नहीं जानता मगर चलना सभी को उसी पथ पर है। तो मैं कहती हूँ जब ज़िंदगी के छोटे-छोटे फैसलों को ध्यान में रखते हुए हम हर कदम सूझ-भुझ और सावधानी से रखते हुए जीवन पथ पर आगे बढ़ते हैं, तो क्या ऐसा ही कोई मार्ग हम देश की सेवा के लिए नहीं खोज सकते, कि सभी उस पर चलने के लिए बाध्य हों सकें और बंधन के कारण ही सही मगर देश प्रेम की ,देश-सेवा की सही राह पर चल सकें। हालाकी भक्ति कभी किसी से ज़ोर जबर्दस्ती से न कराई गई है और ना ही कभी कराई जा सकती है। वह  तो मन की भावना है, आपकी अपनी श्रद्धा जिसे जबरन उत्पन्न नहीं किया जा सकता। ठीक भगवान के लिए हुई उत्पन्न श्रद्धा की तरह जो जबरन नहीं लाई जा सकती।

मगर जैसे बचपन में होता है जब हमको पता भी नहीं होता कि श्रद्धा और आस्था किस चिड़िया के नाम है हम बस नियमानुसार रोज़ मंदिर जाया करते है और धीरे-धीरे वही आदत कब आस्था और विश्वास में बदल जाती है पाता ही नहीं चलता। काश ठीक इसी तरह कोई ऐसा मार्ग निकाल सकता, कि पहले लोगों को देश प्रेम की आदत डलवाई जा सकती और फिर वही आदत भी धीरे-धीरे देश-भक्ति में बदल सकती जैसे आज़ादी से पहले लोगों में देश-प्रेम की भावना जगाई गई थी। जो जंगल की आग की तरह बस बढ़ती ही चली गई थी और मेरा ऐसा मानना है, कि एक मात्र वही कारण था कि आज हम आज़ाद है। मगर अफसोस कि आज हमको हमारी उसी आज़ादी का मोल नहीं पता तभी तो केवल एक दिन दिल में जोश भर कर तिरंगा लहराने, मिठाई खाने और बांटने, देश भक्ति के गीत सुनने और सुनाने, को ही हम आज़ादी का त्योहार माना लेना मानते हैं। जब कि यदि अपने अंदर झांक कर देखा जाये ईमानदारी से तो शायद हर कोई यही पाएगा कि आखिर कहाँ जा रहे हैं हम ... न प्रकृति का साथ निभाया है हमने, न ही देश का ,न धर्म का, यहाँ तक कि इंसानियत के धर्म को तक भूल चुके हैं हम, क्या यही आज़ाद और उन्नत भारत कि पहचान है ? क्या यही वह कारण हैं जिनके आधार पर हम खुद को एक सच्चा देश-प्रेमी या देश-भक्त कह सकते हैं ?

आज आज़ादी के इतने सालों बाद भी मुझे तो ऐसा लगता है कि आगे बढ़ने के बाजये और पिछड़ गए हैं हम, क्यूंकि हमारी संस्कृति के मूल आधार ही अब हमारे नहीं रहे। जिसमें झलकती थी हमारे देश कि संस्कृति और सभ्यता की खुशबू अब उसकी जगह ले ली है आपसी मतभेद और नकल ने फिर उसका क्षेत्र चाहे जो हो वो मायने नहीं रखता। जिस देश के नेता भ्रष्ट हों ,जिस देश कि आने वाली नस्लें खुद अपना ही देश छोड़ के जाने पर आमादा हों, जिस देश के लोगों में अपनी मात्र भाषा को लेकर द्वंद मचा रहता हो। क्या ऐसे देशवासियों को अधिकार है राष्ट्रीय त्योहार मनाने का आज़ादी के गीत गाने का ???? खुद को सच्चा हिन्दुस्तानी कहने का ...??? यदि मेरे इन सवालों का कोई जवाब आपके पास हो तो कृपया ज़रूर अवगत करायें ....                  

15 comments:

  1. thoughtful article
    many Indians see it as a one more holiday date.

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  2. आपका आह्वान विचारणीय है। शुभमस्तु

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  3. बेहतरीन पोस्ट ।
    मेरी नई कविता देखें । और ब्लॉग अच्छा लगे तो जरुर फोलो करें ।
    मेरी कविता:मुस्कुराहट तेरी

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  4. पल्लवी जी आपका झुंजला देने वाला लेख बिलकुल सही है और बहुत गर्मजोशी वाला है .....पर मुझे जो लगता है इस देश में आज़ादी का मतलब अब बदल गया है आज का आम आदमी अपनी दो वक़्त की रोटी में इतना दब गया है की वो क्या सोंचेगा आज़ादी के बारे में उसके लिए तो शायद आज़ादी का मतलब तो केवल उन दो दिनों में मिलने वाले लड्डुओं से ही है.... और इक बात और भी है पहले की आज़ादी में हमारा मुद्दा विदेशी घुसपैठियों को भागना था लेकिन आज अगर हम आज़ादी की बात करें तो लूटने और हमारी आज़ादी छीनने वाले हमारे देश के ही लोग हैं उनका हम कुछ नहीं कर सकते.... जब तक की पोलिटिकल माहोल में फल फूल रहे लोगों को नहीं बदल सकते ...और आज की तारीख में इनकी तादाद इतनी बड़ी है की किसी अच्छे साफ़ चरित्र वाले को बढने ही नहीं देंगे क्योंकी वो लोग बहुत ही ताकतवरहो चुके हैं ....पता भी नहीं लगता है दुनिया से ही गायब हो जाते हैं.
    शायद गलती कहीं न कहीं हमारे प्रोटोकॉल्स में ही है जिससे हमारा देश चल रहा है....जो की जब हम सब आज़ाद हुए थे तब ही बने थे और आज कुछ सही में करना है तो हमें सोंचना चाहिए की उन्हें कैसे मोडिफाई किया जाये अगर हम सब आज एकजुट होके हमारे नेताओं की क्वालिफिकेशन और उनके चुनाव में बदलाव ला सकते है तो शायद कुछ हद तक हम आज़ादी के बारें में सोंच सकते हैं....
    अन्यथा सब कुछ ऐसे ही चलता रहेगा गरीब और गरीब होता जायेगा अमीर और अमीर ..........और आज़ादी का मतलब वही लड्डुओं तक ही सीमित रह जायेगा.


    मेरा ब्लॉग पढने और जुड़ने के लिए इस लिंक पे आयें.
    http://dilkikashmakash.blogspot.com/

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  5. आप सभी पाठकों का तहे दिल से शुक्रिया कृपया यूं हीं संपर्क बननाए रखें आभार... :-)

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  6. चिन्ता तो जायज़ ही है.....
    ---हमें न तो यह दिवस मनाना चाहिये....न सिर्फ़ इसी दिवस पर कोई प्रण लेना चाहिये....अपितु हमें प्रतिदिवस ही नित्य यह प्रण लेना चाहिये कि हम आज कोई भी अनैतिक कार्य नहीं करेंगे ...बस इतना ही करना है ..
    ---न नेता की गलती है न अन्य की....हमारी ही गलती है...हम ही दोषी हैं..बस यही सोचें तभी कुछ होपायगा ..किसी को भी गाली देने से कुछ नहीं होने वाला....

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    Replies
    1. उत्तम प्रस्तुति ||

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  7. @ पल्लवी जी ! आपका लेख बहुत अच्छा है और हम सभी को यह ज़रूर सोचना चाहिए कि हम अपने देश और अपने समाज के लिए क्या कर रहे हैं ?
    हमारे अंदर इंसानियत कितनी है ?

    लेकिन इसी के साथ आपने कहा है कि हमारे देश की संस्कृति के मूल आधार अब हमारे पास नहीं रहे।

    आपको इन्हें स्पष्ट करना चाहिए था।
    इस देश की संस्कृति के मूलाधार आपकी नज़र में क्या हैं ?
    और वे इस देश में कब थे ?
    कब वह समय था जब आपकी नज़र में यहां बराबरी और इंसाफ़ के गुणों से भरे पूरे लोग बसते थे ?

    वह कौन सा समय था जब यहां औरत और कमज़ोर वर्ग आनंद मना रहे थे ?
    उस समय की संस्कृति को चिन्हित करने के बाद ही उस काल की संस्कृति की पनर्स्थापना का प्रयास किया जा सकता है।

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  8. ‘ब्लॉग की ख़बरें‘ पर आपकी इस विचारणीय पोस्ट का चर्चा है,
    जिसने ब्लॉग पत्रकारिता का सूत्रपात करके हिंदी ब्लॉग जगत को एक नई दिशा दी है।
    http://blogkikhabren.blogspot.com/2012/01/blog-post_11.html

    इसी के साथ अपने कमेंट को सहेजने के लिए आपकी चंद पंक्तियां हमारे कमेंट्स गार्डन में भी शोभायमान हैं-
    http://commentsgarden.blogspot.com/2012/01/blog-post.html

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  9. देश सर्वोपरि है ..निःसंदेह ..
    बहुत अच्छा लेख ..
    पधारें
    kalamdaan.blogspot.com

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  10. आपकी पोस्ट आज के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
    कृपया पधारें
    चर्चा मंच-756:चर्चाकार-दिलबाग विर्क

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  11. सच कहा है की हम पिछड़ गए हैं ... पैसे के पीछे दौड़ते दौड़ते हम स्वार्र्ही हो गए हैं .... देश प्रेम खत्म हो गया है ...

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  12. बहुत अच्छा लिखा है लेकिन जहां तक नेताओं के भ्रष्ट होने की बात है उसके लिए हम सब जिम्मेदार हैं क्योंकि उनको हमने चुना है इसलिए चुना है की वो हमारे संप्रदाय ,हमारी जाती,हमारे क्षेत्र ,हमारी भाषा से संबन्धित हैं।

    निश्चित तौर पर आज़ादी के गीत गाए जाने चाहिए और अपनी आज़ादी को बनाए रखने का संकल्प भी लेना चाहिए।


    सादर

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