Tuesday 10 January 2012

मायावती का चुनाव निशान बदले आयोग ...

ड़तालिस घंटे के बाद नेट और टीवी से रूबरू हो पाया हूं। एक खबर मुझे बहुत परेशान कर रही है। ये खबर है उत्तर प्रदेश की। आपको पता ही है कि वहां की मुख्यमंत्री मायावती ने इस प्रदेश को वैसे ही बदरंग कर इसका चेहरा बिगाड़ दिया है। अब निर्वाचन आयोग का एक फैसला किसी के गले नहीं उतर रहा है।
दरअसल मुख्यमंत्री मायावती ने सूबे भर में अंबेडकर पार्क के नाम पर मनमानी की है। लखनऊ और नोएडा में तो कई एकड में पार्क बनाने में हजारों करोड रुपये खर्च किए गए हैं। मायावती ने इन पार्कों में दलित नेताओं की मूर्तियां तो लगवाई ही, पार्टी का चुनाव निशान हाथी की भी हजारों मूर्तियां पार्क में लगा दी । अब चुनाव में इसे दूसरे दलों ने मुद्दा बना दिया है। उनका कहना है कि ये पार्क सरकारी पैसे से बने हैं और इसमें खुद मायावती, उनकी पार्टी के संस्थापक कांशीराम, भीमराव अंबेडकर,  बाबा ज्योतिबाफुले समेत तमाम नेताओं की मूर्ति तो है ही, साथ ही पार्टी का चुनाव निशान हाथी की मूर्ति भी एक दो नहीं हजारो की संख्या मे लगा दी गई है। इसका चुनाव पर असर पडेगा।

निर्वाचन आयोग ने इस शिकायत की सुनवाई में बहुत ही गैरजिम्मेदाराना निर्णय दिया है। उनका कहना है कि पूरे प्रदेश में जहां कहीं भी पार्क या सरकारी परिसर में ऐसी मूर्तियां हैं उन्हें चुनाव तक ढक दिया जाए। इन पार्कों में हजारों करोड़ रुपये पहले ही खर्च किए जा चुके हैं। सिर्फ अस्थाई रुप से इसे ढकने पर लगभग पांच करोड रुपये खर्च होने का अनुमान  है। जनवरी में ढकने के बाद इसे मार्च में हटा भी दिया जाना है, ऐसे में सरकारी खजाने से पांच करोड रुपये खर्च करने को कत्तई जायज नहीं ठहराया जा सकता। इन पार्कों को देखने से ही साफ पता चलता है कि इसके पीछे मुख्यमंत्रीं मायावती की मंशा कत्तई साफ नहीं रही है। ऐसे में सजा किसे मिलनी चाहिए ? सजा तो मुख्यमंत्री को मिलनी चाहिए थी, लेकिन जो सजा निर्वाचन आयोग ने सुनाई है कि इसे चुनाव तक ढक दिया जाए, ये सजा तो आम जनता को दे दी गई है। क्योंकि सरकारी खजाने हमारे और आपके ही टैक्स का पैसा है।

मुझे लगता है कि आयोग को इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। चूंकि आयोग ने इन मूर्तियों और हाथी को ढकने का आदेश दिया है, इससे इतना तो साफ है कि वो मायावती को चुनाव आचार संहिता तोडने और चुनाव में गलत तरीका अपनाने का जिम्मेदार मानता है। ऐसे में आयोग को चाहिए कि वो बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) का चुनाव निशान ही बदल दे। क्योंकि सही कारण होने पर चुनाव निशान बदले जाने का प्रावधान भी है। अगर आयोग चुनाव निशान नहीं बदलता है तो आयोग को बीएसपी को ये फरमान सुनाना चाहिए कि वो अपने पैसे से इन मूर्तियों को ढकने का काम करे। वैसे भी अगर कोई उम्मीदवार किसी दीवार पर नारे लिखवाता है तो उस उम्मीदवार को ही अपने खर्चे पर उसे साफ करने का आदेश दिया जाता है। अगर आचार संहिता में इसका प्रावधान भी है, फिर मायावती पर इसे क्यों नहीं लागू किया जा रहा है ?

13 comments:

  1. बहुत सही फ़रमाया आपने एकदम सटीक। आभार

    ReplyDelete
  2. क्या मुर्तिया को ढक भर देने से पब्लिक के पैसे का दुरपयोग ख़त्म हो जायेगा ?
    शर्म आती है ऐसे कानून वयवस्था पे जहाँ कोई भीअपनी मनमानी से जनता
    का पैसा बर्बाद कर अट्टहास करता रहता है
    लाजबाब लेख नववर्ष की मंगल कामनाएं .

    ReplyDelete
  3. मूर्तियाँ ढकने के लिए प्रयास ..
    इतने लोग जो ठण्ड से काँप रहे हैं उन्हें ढकने के लिए ..?
    अफ़सोस ..
    राजनीति ..
    kalamdaan.blogspot.com

    ReplyDelete
  4. बिल्कुल सही फरमाया
    विचारणीय आलेख

    ReplyDelete
  5. "इससे इतना तो साफ है कि वो मायावती को चुनाव आचार संहिता तोडने और चुनाव में गलत तरीका अपनाने का जिम्मेदार मानता है। ऐसे में आयोग को चाहिए कि वो बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) का चुनाव निशान ही बदल दे'।
    सही कहा आपनें,विचारणीय लेख.
    vikram7: हाय, टिप्पणी व्यथा बन गई ....

    ReplyDelete
  6. वाह बहुत बढ़िया!
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल बुधवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

    ReplyDelete
  7. वाजिब सुझाव हैं आपके.

    ReplyDelete
  8. सुंदर अभिव्यक्ति तर्क संगत,चुनाव आयोग BSP का चुनाव चिन्ह ही बदल देना चाहिए आपके विचारों सहमत,विचारणीय लेख धाँसू पोस्ट,..
    ,....
    welcom to new post --"काव्यान्जलि"--

    ReplyDelete
  9. सही कहा आपने!..चुनाव चिन्ह बदल जाने से पब्लिक 'हाथी' पर तो मोहोर नहीं लगाएगी!...लेकिन जैसा कि इस पोस्ट में बताया गया है वैसा पार्क जब बन रहा था तब इसका विरोध क्यों नहीं किया गया?..क्या तब लोग जानते नहीं थे कि चुनाव भी होते है?

    ...बहुत बढ़िया विषय!..धन्यवाद!

    ReplyDelete
  10. बहुत सही कह रहे हैं आप

    ReplyDelete
  11. अच्छा व्यंग्य विनोद बच्चा बड़ा होके नेता बनेगा .सेवा करेगा तभी तो मेवा मिलेगा .उत्तर प्रदेश में तो बड़े अधिकारी भी मायावती को सेंडिल पहनाते हैं पान का बीड़ा खिलाते हैं .एक अपने कलाम साहब थे जूता खुद पहनते थे सहायक को ऐसा नहीं करने देते थे .परम्परा भंजक थे .

    ReplyDelete

लिखिए अपनी भाषा में

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...