Friday, 13 January, 2012

तो दादा कांट! फिर से आज के परिप्रेक्ष्य में कोई नया नीतिशास्त्र गढ़ो ताकि हम आत्म-सम्मान की रक्षा करते हुए सम्मान पूर्वक जी सकें

     बचपन में मेरे गुरुजनों के द्वारा पता नहीं क्यों नसीहत दी गयी थी कि किसी भी जीवात्मा को कष्ट न दो यहां तक कि अपनी आत्मा को भी नहीं, आत्म-सम्मान के साथ जीओ। सो मैं मूढ़मति चल पड़ी उसी लकीर पर। किन्तु आज जब मैं जीवन और समाज से दो-चार हुई तो जाना और माना भी कि आत्म-सम्मान नहीं बल्कि सम्मान से जीना हमारा अभीष्ट होना चाहिए, यही आज की प्रवृत्ति है। पहले तो मैं यह मानती थी और जैसा कि गुरुजनों ने बताया भी था कि अगर आत्म-सम्मान है तो सम्मान स्वतः पास दौड़ा आएगा पर यथार्थ में ऐसा नहीं है। सम्मान होना आवश्यक है आत्म-सम्मान भले ही दांव पर लग जाये। सम्मान ही जीवन की मुख्य शर्त बन गया है। उसको कैसे भी प्राप्त करना ही है। यद्यपि यह सही है कि यदि हममें आत्म-सम्मान है तो सम्मान भी वहीं होना चाहिए पर यह विरोधाभास कहां से आया विचारणीय प्रश्न है लेकिन वास्तविकता यही है कि वर्त्तमान में आत्म-सम्मान और सम्मान सहचर नहीं हैं और आवश्यक बन गया है सम्मान के साथ जीना न कि आत्म-सम्मान के।
     इमैन्युअल कांट, जिसे आधुनिक दार्शनिकों में नीतिशास्त्र का पुरोधा माना जाता है और उसके प्रत्येक वाक्य को कसौटी के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है, ने कहा कि- ‘आत्मा स्वयं साध्य है इसे साधन मत बनाओ! आत्मा को साधन बनाकर किया गया सभी कृत्य अनैतिक हो जाता है’ और मैंने मान लिया कि कांट कह रहा है तो सही ही कह रहा होगा। हमारी बुद्धि ने भी यही तथ्य स्वीकार कर लिया। किन्तु आज यदि हम अपनी आत्मा को साधन के रूप में प्रयुक्त नहीं करते तो सम्मान पूर्वक जी ही नहीं सकते। सम्मान से जीने के लिए आत्मा को गिरवी रखना ही है, कुछ ऐसी व्यवस्था ही बन पड़ी है जो कि सर्वस्वीकृत भी है। आत्मा को साधन के रूप में इस्तेमाल करने का एक माक़ूल उदाहरण है चापलूसी करना। चापलूसी जैसा आवश्यक (अब) कार्य करते समय अपनी आत्मा को गिरवी रखकर निकृष्टतम सत्ता की भी वाहवाही और पूजा करनी ही है हमको यदि सम्मान पूर्वक जीना है। यह मज़बूरी भी है और अब फ़ितरत भी बनती जा रही है।
     आज प्राकृतिक शक्तियों से लेकर देवी देवताओं तथा अपने से शक्तिमान मनुष्यों तक की पूजा और चापलूसी करना हमारी आदत में शुमार हो गया है। और प्रत्यक्ष रूप से हमें लाभ भी मिल रहा है। ज्योतिषी महोदय कहते हैं कि राहु या शनि रुष्ट हैं, सूर्य का प्रकोप है कुछ टेढ़े हैं अतः उनकी आराधना और बड़ाई के मन्त्र जपो, तो बाबू जी अथवा साहब जी को ख़ुश करो, कुछ चढ़ावा चढ़ावो काम हो जाएगा। हम ऐसा करते हैं और काम हो जाता है। हम जी रहे हैं शान से। भले ही निकृष्टतम ग्रह अथवा बाबू, साहबों की पूजा-अर्चना करनी पड़े आत्मा को गिरवी रखकर। तो दादा कांट! फिर से आज के परिप्रेक्ष्य में कोई नया नीतिशास्त्र गढ़ो ताकि हम आत्म-सम्मान की रक्षा करते हुए सम्मान पूर्वक जी सकें।

(सभी चित्र गूगल से साभार)

                                           -शालिनी

10 comments:

  1. अरे वाह! बहुत सही कहा आपने...गम्भीर विचारणा

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  2. विचारणीय ..
    मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है ..
    kalamdaan.blogspot.com

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  3. बहुत बढ़िया!
    लोहड़ी पर्व की बधाई और शुभकामनाएँ!

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  4. स्वतंत्र चिंतन शैली ke लिए बहुत बहुत बधाई

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  5. सारगर्भित एवं विचारणीय आलेख लोढ़ी पर्व की हार्दिक शुभकामनायें ...

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  6. लोहडी और मकर संक्रांति की शुभकामनाएं.....


    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा आज के चर्चा मंच पर भी की गई है। चर्चा में शामिल होकर इसमें शामिल पोस्ट पर नजर डालें और इस मंच को समृद्ध बनाएं.... आपकी एक टिप्पणी मंच में शामिल पोस्ट्स को आकर्षण प्रदान करेगी......

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  7. विचारणीय आलेख हुत सही कहा आपने...शालिनी जी

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  8. बहुत ही सारगर्भित पोस्ट शालिनी जी, समाज बहुत ही गिर चूका है हर तरफ शोषक अपना वर्चस्व कायम करना चाहते हैं ...... कहावत है की गधे को भी बाप कहना पड़ता है ......ईमानदारों का ही शोषण होता है समाज की दशा जाने कब सुधरेगी ? आज हम सम्मान की रोटी भी नहीं तोड़ पाते .......रक्षक ही भक्षक है ....कहाँ जाओगे ? वृन्दावन में रहना है तो राधे राधे कहना है | शायद यही उनकी नियति बन गयी है ....हम आम आदमी हैं ना कौन सुनेगा हमारी पीड़ा शायद मीडिया भी नहीं सुनती है | अब उन्हीं लोगों की पीड़ा वह सुनती है जो आम से हट कर हैं | फिल हाल भागवान के घर देर है अंधेर नहीं है |

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