Saturday, 21 January, 2012

जन-जेब्रा की दु-लत्ती में बड़ा जोर है -

सत्ता-सर  के  घडियालों  यह  गाँठ बाँध लो,
जन-जेब्रा   की   दु-लत्ती   में   बड़ा  जोर है |

 


बदन  पे  उसके  हैं  तेरे  जुल्मों  की  पट्टी -
घास-फूस  पर  जीता  वो,  तू  मांसखोर है || 



तानाशाही    से    तेरे     है     तंग  " तीसरा"
जीव-जंतु-जग-जंगल-जल पर चले जोर है |



सोच-समझ कर फैलाना अब  अपना जबड़ा
तेरे  दर   पर    हुई   भयंकर  बड़-बटोर  है |

File:NileCrocodile.jpg
पद-प्रहार से    सुधरेगा   या   सिधरेगा   तू
प्राणान्तक  जुल्मों  से  व्याकुल  पोर-पोर है |

10 comments:

  1. अच्छा व्यंग है,पदप्रहार करते रहिये.

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  2. सुन्दर प्रस्तुति और चित्र |
    आशा

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  3. बहुत संवेदनशील सृजन , उद्वेलित करता हुआ / बधाईयाँ जी

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  4. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    --
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी लगाई है!
    सूचनार्थ!

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  5. बहुत सार्थक प्रस्तुति, सुंदर रचना,बेहतरीन पोस्ट....
    new post...वाह रे मंहगाई...

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  6. अच्छा है ..:)
    kalamdaan.blogspot.com

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  7. तानाशाही से तेरे है तंग " तीसरा"
    जीव-जंतु-जग-जंगल-जल पर चले जोर है |
    वाह भाई साहब रविकर आपका लिखा लाखों में मिलादो पहचाना जाता है .आनुप्रासिक छटा बिखेरी है आपने भाषिक सौन्दर्य और व्यंग्य सब एक जगा(जगह ) आनंद ही आनंद .

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  8. सार्थक चित्रमय प्रस्तुति ....

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