Friday 27 January 2012

बाप रे! फिर चुनाव!!

     बाप रे! फिर चुनाव!!...चौंकिए नहीं साहब! यह उलझन भारत की जनता की नहीं बल्कि चुनाव ड्यूटी में लगे कर्मचारियों की है। भई ड्यूटी करनी ही है तो उलझन क्यूं??... नहीं, उलझन है मैं ख़ुद भुक्तभोगी हूँ। चुनाव ड्यूटी की सबसे बड़ी उलझन होती है कि हमें वाहन स्वरूप मिलेगा क्या? कभी कभार भाग्य साथ दे दिया तो सवारी-गाड़ी मिल जाती है नहीं तो अक्सर ही भार-वाहन यानी ट्रक ही चुनाव कर्मचारियों को नसीब होता है। ऐसी हालत में क्या दुर्गति होती है कर्मचारियों की इसे बयान नहीं किया जा सकता। वैसे भी भारत में आदमी की कीमत भूसे से ज्यादा नहीं है सो सरकार और अधिकारी जो शायद आदमी नहीं भगवान हैं और भारत में जनता के भाग्य-विधाता भी (ऐसा स्वीकार कर लिया गया है) की निगाह ही आदमियों के बावत क्यों बदले? इस सन्दर्भ में मैंने एक लेख लिखा था अक्टूबर 10 के होने वाले त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव की ड्यूटी से लौटने के उपरान्त जागरण 'जंक्शन डॉट कॉम' पर। अबकी बार इलेक्शन ड्यूटी में जाने के पहले ही वह लेख आप लोगों को पढ़वाना समीचीन समझता हूँ आप अवश्य क्लिक करें और पढ़ें-
                                                                -ग़ाफ़िल 

आज हमारी कल तुम्हारी देखो लोगों बारी-बारी-
     ‘आइए आपका इन्तजार था!’ मैं इस वाक्य के माध्यम से इसमें निहित उन भावों को उकेरना चाहती हूँ जो वर्तमान चुनावी परिप्रेक्ष्य में परिलक्षित हो रहे हैं। मेरा आशय चुनाव के इस माहौल से है जिसने शहर से लेकर गावों तक हाय! तोबा! मचा रखी है। ए.सी. कोठियों में रहने वाले, हमेशा स्वच्छ परिधानों से लिपटे नेताओं ने अब अपना रुख गावों और कस्बों की तरफ़ कर लिया है। जहां पूरा का पूरा साल बीत जाता था इनके दर्शन किए अब सर्वत्र ये अति सुलभ हैं आम भोली-भाली जनता को। इस ठंड में भी इनके पेशानी पर पसीने की बूदें आसानी से देखी जा सकती हैं और इनका गावों की मिट्टी से धूल-धूसरित होकर घर-घर जाना और वोट के लिए ग़रीबों के पैरों पर गिर पड़ने की मनोरम छटा फिर पाँच सालों के लिए सपने सा हो जाएगा मैं तो यही सोच कर उलझन में हूँ। आज किए जा रहे इनके वादे और कस्में तथा आम जनता के लिए इनका सम्मानजनक सम्बोधन यथा काका, दादा, भइया, बाबू, दादी, काकी, बहिनी आदि-आदि फिर पाँच सालों के लिए स्वप्न में सुना हुआ मधुगुंजार सरीखे हो जाएगा। फिर तो इनके कटुबचन और गालियां ही निरीह जनता के हिस्से आएंगी। मैं सोचती हूँ कि काश! चुनावी माहौल सर्वथा क़ायम रहे और हम देख पाते रहें इन तथाकथित ग़रीबों के मसीहाओं की ऐसी दयनीय दशा। इनके चुनाव जीत जाने के बाद इन्हें तो मिल जायेंगी ज़न्नत की खुशीयां और हम ग़रीब हो जायेंगे ढाक के दो पात। अभी तो हमारी क़ीमत चुनाव होने के पहले तक दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ रही है। हमारी तो बोली पर बोली लग रही है। फिर शेयर मार्केट की तरह हमारा भी भाव गिरते देरी नहीं लगेगी।
     आज तो गावं भी शहर से कम नहीं हैं किसी भी दशा में। चाहे वादे में ही गावों में बिजली, सड़कों और अन्य आवश्यक सुविधाओं का ही बोल-बाला है। सड़कें भी (जैसी भी हैं) शहरों की सड़कों से कम व्यस्त नहीं हैं और उनपर सवारियां भी कम ठाट-बाट वाली नहीं हैं। यहां की गलियों और सड़कों पर रैलियों का हुज़ूम सा रहता है। यहां सवारियों की बात ही मत पूछिए! कहीं हाथी चिग्घाड़ रही है तो कहीं साइकिल दौड़ रही है। सर्वत्र कमल के फूलों से जनता का स्वागत हो रहा है तो कहीं हाथ उठा कर आशीर्वाद की मुद्रा में लोगों को आश्वस्त किया जा रहा है। सब अपना-अपना गुणगान करते हुए जनता को रिझाने की कोशिश में जी-जान से लगे हैं अर्थ, दण्ड साम, भेद किसी भी साधन से। जनता की इस तरह उच्च-स्थिति चुनावोपरान्त निम्न-स्थिति में परिवर्तित होनी ही है, चूंकि परिवर्तन शास्वत है विधि का यही विधान हमारी सशंकित चित्त-वृत्ति का मुख्य कारण है। सफ़ेद नील लगाये झकाझक परिधानों को पहन, मुख पर बनावटी मुस्कान लिए, हाथ जोड़े और झोली फैलाए सर्वत्र शोभायमान हो रहे हैं नेतागण। आह! उनका यह मनोरम रूप ‘श्वेत पंख सुशील हैं लीलें गपाक-गपाक’।
     ऐसे माहौल में जनता का भ्रमित हो जाना स्वाभाविक है पर मेरा विचार है कि जनता भी अब शिक्षित और होशियार हो गयी है, अच्छे और बुरे की पहचान करने में सक्षम है (नेताओं की सद् इच्छा के विपरीत)। अब यह जनता मूर्ख बनने को तैयार नहीं है जितनी भी कोशिश कर लें नेतागण। कपडों, कम्बलों, और लक्ष्मी-जल की असलियत अब सभी जानने लगे हैं। जनता भी सुनहरा अवसर भला कहां छोड़ने वाली, घर आयी लक्ष्मी का अपमान भी तो नहीं करना। बहती गंगा में हाथ धो लेना कोई बुरी बात थोड़ी है? सो सबका स्वागत। जनता भी जानती है कि यह सुख चन्द दिनों का है। पांच साल तो मूर्ख बनना ही है थोड़ा वक्त मूर्ख बना ही क्यों न लिया जाय। आज हमारी कल तुम्हारी देखो लोगों बारी-बारी।
                                                              -शालिनी पाण्डेय

8 comments:

  1. वाह भाई वाह ||
    शानदार प्रस्तुति ||
    दोनों प्रस्तुतियां शानदार |

    ReplyDelete
  2. ढोता बोझा तंत्र का, मन्त्र एक मतदान |
    सरकारी खच्चर पड़ा, इत-उत ताक उतान |

    इत-उत ताक उतान, बोझ से मन घबराया |
    हिम्मत कर पुरजोर, तंत्र का बोझ उठाया |

    बोले पर गणतंत्र, उठाकर क्यूँ तू रोता |
    प्रभू उठाये तोय, उठाये ज्यों तू ढोता ||

    ReplyDelete
    Replies
    1. वाह दिनेश भाई! आपकी यह आशु कविताई! हमेश ही रंग लाई।

      Delete
  3. आज हमारी कल तुम्हारी देखो लोगों बारी-बारी।सुन्दर सार्थक विश्लेषण .

    ReplyDelete
  4. सुन्दर सार्थक विश्लेषण .

    पीठासीन अधिकारी उसे कहा जाता है जिसकी पीठ पर भूसा लदा हो लेकिन जिसे उस रोज़ कागज़ पर फस्ट क्लास मजिस्ट्रेट का दर्ज़ा प्राप्त हो जिसकी जान इलेक्शन मटेरियल जमा होने तक सासत में रहे .तहसीलदार जिस पर रोब जमाए यही इस तन्त्र की विसंगतियां हैं जो लोक तंत्र का सबसे पावन पर्व है उसके पीठासीन अधिकारी का बेड़ा गर्क है .

    ReplyDelete
  5. Janta samjhadar to hai lekin chunegi kise? wahi chehre-mohre?0 yah to chunav ke baad hi pata chalta hai...
    badiya sarthak vishleshan padhne ko mila..

    ReplyDelete

लिखिए अपनी भाषा में

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...