Saturday 28 January 2012

अ-सरकारी यह काढ़ा --

पा-जी अन्ना राव, पिलाओ बाबा घुट्टी ।

काढ़ा गाढ़ा हो चला, बूढ़ा फिर भी त्रस्त ।
पैसठ सालों में शिथिल, बरबस परबस पस्त ।


बरबस परबस पस्त, कहीं न होवे छुट्टी ।
पा-जी अन्ना राव, पिलाओ बाबा घुट्टी ।


चोरी भ्रष्टाचार, मिलावट लालच बाढ़ा ।
सत्ता-नब्ज टटोल, अ-सरकारी यह काढ़ा ।।
                                     ----रविकर 

4 comments:

  1. बहुत ही सुंदर दोहे पल्लवी जी |

    ReplyDelete
  2. Replies
    1. शनिवार के चर्चा मंच पर
      आपकी रचना का संकेत है |

      आइये जरा ढूंढ़ निकालिए तो
      यह संकेत ||

      Delete

लिखिए अपनी भाषा में

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...