Tuesday 31 January 2012

घुसख़ोर

जब से तुम घुसख़ोर हो गये।
कटी पतंग के डोर हो गये।।

ऊंचा ओहदा पा करके भी,
कितने तुम कमजोर हो गये।

वक्त ने तुमको शाह बनाया,
ख़ुद से ही तुम चोर हो गये।

आदम के ही बच्चे होकर,
कैसे आदमख़ोर हो गये?

सुधरोगे ही इस उमीद में,
रातें बीतीं भोर हो गये।

टूट चुका है बांध सब्र का,
दुःख के घन अब घोर हो गये।

नेता और भलाई जैसे,
नदिया के दो छोर हो गये।

जिस रस्ते पर रुपया देखा,
मुंह खोले उस ओर हो गये।



(मित्रों आप सब जानते हैं कि मैं 40 दिन के चुनावी सफर में हूं, वक्त नहीं निकाल पा रहा हूं यहां के लिए। लेकिन मैने चार लाइने आपको दे रहा हूं, चाहता हूं अब आप सब इस कविता को अंजाम तक पहूंचाएं। देखें आखिर में ये कविता कितनी स्वादिष्ट होती है।) 

9 comments:

  1. सचमुच ..
    kalamdaan.blogspot.com

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  2. भाईजान आपकी नायाब चार लाइनों को थोड़ा आगे बढ़ाने की कोशिश की है देखिए शायद जायका...

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  3. घूसखोरी पर बहुत बढ़िया कटाश

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  4. बहतरीन कटाक्ष सर जी..
    गुस्ताखी माफ़ कीजिएगा.. कुछ पंक्तियाँ जोड़ रहा हूँ

    "नेता और भलाई जैसे,
    नदिया के दो छोर हो गए..

    जिस रस्ते पे रुपया देखा,
    मुंह खोले उस ओर हो गए.."

    palchhin-aditya.blogspot.in

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    Replies
    1. बहुत सही आदित्य जी आभार... आपकी लाइनें भी इस कविता में जोड़ दी जा रही हैं आखिर महेन्द्र जी ने चार लाइनें दिया ही इसी लिए था कि इसे हम सब बढ़ाएं

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    2. बहुत बहुत शुक्रिया सर.. मेरी खुशकिस्मती है..

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  5. बढ़िया कविता | बधाई

    कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
    Tamasha-E-Zindagi
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