Sunday 15 January 2012

त्यौहार एक रूप अनेक ....

     कितनी अजीब बात है ज़िंदगी और समय किसी के लिए नहीं रुकते चाहे आपके जीवन में कुछ भी क्यूँ न घटित हो जाये। इसलिए मेरा ऐसा मनना है कि ज़िंदगी और वक्त एक ही सिक्के के दो पहलुओं की तरह हैं। जीवन में हमेशा आने वाला पल जाने वाला होता है क्यूँकि वक्त किसी के लिए नहीं ठहरता जैसे हवा उसका भी कोई आशियाँना नहीं होता। खैर बात जब ज़िंदगी को हो और उसमें यादों का जिक्र ना हो, ऐसा तो हो ही नहीं सकता। यादें जो सभी के पास होती है। कुछ खट्टी ,तो कभी कुछ मीठी भी, जो अक्सर समय-समय पर आकर हमारे मन की कुलबुलाहटों का कारण बन जाती है। कुछ अच्छा जो कभी आतित में हुआ हो, अक्सर वैसा ही कुछ हम वर्तमान में भी चाह ने लगते है और उस चाहत को पाने के लिए मन कुलबुलाने सा लगता है कभी-कभी, मेरे साथ तो अक्सर ऐसा होता है और मुझे यकीन है आपके साथ भी ज़रूर होता होगा।
     मेरे साथ अक्सर ऐसा तब होता है जब कोई त्यौहार नजदीक आरहा हो, जैसे आज मकर संक्रांति है,मेरे मन में उसे जुड़ी बहुत सारी यादें हैं। मैंने बचपन से लेकर भारत में रहने तक इस एक भोपाल से पुणे तक मैंने इस तौहार के कई अलग-अलग रूप देखे हैं। भोपाल के पास एक स्थान है भोजपुर जहां बहुत बड़ी शिवजी की मूर्ति है आप सभी ने वहाँ का नाम ज़रूर सुना होगा। हर साल संक्रांति के दिन वहाँ मेला लगता है और आस पास के ग्रामीण वहाँ अपनी-अपनी चीज़ें बेचने आते है पतंग बाज़ी भी होती है। सच बहुत मज़ा है, हम लोग तो हर साल वहाँ पिकनिक मनाने के अंदाज़ से जाया करते थे। बिना वहाँ जाये पता ही नहीं चलता था कि संक्रांति का त्यौहार मानया भी है हम ने, उस दिन घर का माहौल सुबह से ही बड़ा धार्मिक महसूस हुआ करता था। सबसे पहली शर्त होती थी पानी मे तिल डालकर ही नहाना है। फिर दान-पुण्य करने के बाद ही कुछ खाने पीने को मिला और जो जितना देर से नहाये गा उसे उतनी देर तक  कुछ खाने-पीने को नहीं मिलेगा और जो आलस कर गया वो लंका का गधा बनेगा अगले जन्म मे ऐसी मान्यता है। यह भी कहा जाता है कि संक्रांति के दिन से सूर्य की दिशा बदल जाती है और दिन तिल-तिल करके बड़ा होना शुरू हो जाता है। तभी शायद वो कहावत भी बनी होगी-
"महा तिला तिलवाड़े फगुना गौड़ पसारे" 
     अर्थात तिल-तिल करके दिन बढ़ता चला जाता है फागुन आने तक, हो सकता है यहाँ मुझ से कोई भूल हो रही हो मुझे ठीक से याद नहीं है यदि आप लोगों को याद हो तो कृपया टिप्पणी के माध्यम से मुझे याद दिलाये। हाँ तो हम बात कर रहे थे संक्रांति महोत्सव की तो भई लंका का गधा बनने से तो अच्छा है नाहा लिया जाये फिर पूजा पाठ और दान-पुण्य के बाद तयारी होती थी मेले में जाने की यह सब भोपाल का चलन हैं मगर पुणे में मैंने बहुत अलग माहौल देखा इस त्योर का वहाँ सुबह से सारी महिलायें नहा धोकर साज श्रिंगार कर मंदिर जाती है प्रसाद  में तिल गुड से बनी कोई मिठाई का भोग लगाया जाता है घर पर तरह -तरह के पकवान बनाये जाते हैं जैसे श्रीखंड ,तिल गुड के लड्डू ,चीवड़ा इत्यादि हल्दी कुमकुम का भी चलन है आज के दिन महाराष्ट्र में जिसमें सुहागन स्त्रियॉं को घर पर बुलाकर खिलाया पिलाया जाता है हल्दी और कुमकुम का तिलक लगा कर उनका सम्मान किया जाता है कुछ लोग इत्र भी लगाते हैं और उपहार में भी कुछ न कुछ दिया जाता है। सच कितना अच्छा देश है अपना जहां हर संस्कृति और सभ्यता को पूरा-पूरा मान और सम्मान दिया जाता है बिना किसी भेद भाव के आज हजारों मत-भेद होने के बावजूद भी त्यौहारों पर अनेकता में एकता को बड़ी ही सहजता से आज भी देखा जा सकता है। इन सभी त्यौहारों के मानये जाने का एक मात्र कारण है नई फसल का आना इस ही त्योहार का एक और रूप है लौहड़ी इसमें भी मक्के ,मूँगफली,और तिल से बनी रेवड़ी ही बांटी जाती है यह पंजाब के मुख्य त्यौहारों में से एक है और संक्रांति के एक दिन पहले मनाया जाता है। कहने का मतलब त्यौहार का एकमात्र कारण एक नई फसल का आना मगर उसके मनाये जाने के रूप अनेक इसलिए तो मैं कहती हूँ सारे जहां में कहीं नहीं है दूसरा हिंदुस्तान क्यूंकि मेरा भारत महान॥ जय हिन्द                       

15 comments:

  1. पल्लवी जी आपने मकर संक्रान्ति पर बहुत सुन्दर लिखा है बधाई और धन्यवाद

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  2. मकर संक्रांति की शुभकामनायें..
    हमारे देश की यही विविधता है ..त्यौहार एक रूप अनेक..
    kalamdaan.blogspot.com

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  3. पल्लवी जी आपके इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल दिनांक 16-01-1912 को सोमवारीय चर्चामंच पर भी होगी। सूचनार्थ

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  4. MAKAR SANKRANTI PR HARDIK BADHAI KE SATH HI ES SUNDAR PRAVISHTI KE LIYE BAHUT BAHUT ABHAR PALLAVI JI

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  5. आप सभी पाठकों का तहे दिल से शुक्रिया एवं आप सभी को भी मकर संक्रांति की हार्दिक शुभकामनायें...कृपया यूं हीं संपर्क बनाये रखें।

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  6. बहुत अच्‍छी पोसट .. आपके इस पोस्‍ट से हमारी वार्ता समृद्ध हुई है .. आभार !!

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  7. in tyohaaron aur paramparaaon se hi to apna desh sarvopari hai.ek misaal hai ekta aur bhaaichaare ki.bahut hi sarahniye lekh likha hai.shubhkamnayen.

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  8. हर त्यौहार का अलग आंनंद है चाहे उसके मनाने का तरीका फर्क हो या एक जैसा.

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  9. हर त्‍यौहार उत्‍साह और उमंग का संदेश लेकर आता है।
    मकर संक्रांति की बधाई....

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  10. आनंद मनाने के लिये ही तो त्यौहार हैं.सुंदर आलेख...

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  11. बहुत सुन्दर और सामयिक प्रस्तुति

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