Friday 3 February 2012

ये बलात्कारी डॉक्टर!!

     चौंकिए नहीं साहब! यह बलात्कार वैसा नहीं है जो आप समझ रहे हैं और डॉक्टर भी वो नहीं जिसे आप जान रहे हैं। यह शब्दों के साथ बलात्कार है और बलात्कारी हैं पी-एच.डी. उपाधिधारी डॉक्टर। आपके समक्ष कुछ वाक्य रख रहा हूँ ज़रा ध्यान दें-
     'मिशिरा जी नमस्कार! अभी-अभी पसिंजर ट्रेन आ रही है आज हम थोड़ा लेट हो गये, पहले अपनी उपस्थिती दर्ज करा लूँ। क्या कहूँ बभनान की लाइट ऐसी है, अपने प्रिंसिपल साहब की भी अज़ीब व्यवस्था है, जमरेटर भी नहीं चलवा देते। भला बताइए काम कैसे हो? अच्छा जो वह पी.जी.टी. की वांट निकली है उसकी मिनिमम अहरता देखना था आपकी लाइब्रेरी में वो वाला अकबार मिल जाएगा?' तभी एक साहब और आए और बोले कि हमारा कल फंक्शन में एलाउंसमेंट कैसा था मिशिर जी? और उनके एनाउंस पर ग़ौर करें- ‘...बस अभी चन्द्र क्षणों में मुख्य अतिथि जी मंच पर पधारने वाले हैं।’
     उपर्युक्त वाक्यों को पढ़कर क्या आप सबको यह नहीं लग रहा है कि शब्दों के साथ जाने-अंजाने बलात्कार हुआ है तथा यह बलात्कार करने वाले और कोई साधारण व्यक्ति नहीं बल्कि लब्ध प्रतिष्ठ डॉक्टर संवर्ग (पी-एच.डी. उपाधि धारक) के लोग हैं।
     महाविद्यालय के पुस्तकालय में नौकरी करने के नाते मेरा पाला ऐसे अनेक डॉक्टरों से पड़ता रहता है। एक तो अंग्रेजियत की कृपा से मिश्र-मिश्रा, गुप्त-गुप्ता का अन्तर वैसे भी समाप्त हो गया है तिस पर यह पढ़े-लिखे डॉक्टर ही शब्दों के साथ इस प्रकार का व्यवहार करेंगे तो विद्यार्थियों और आम लोगों की क्या बात की जाये। वैसे भी श को स तथा स को श कह देना आम है जिस पर ध्यान भी नहीं दिया जाता किन्तु और अनेक महत्त्वपूर्ण शब्द गलत उच्चारण की परम्परा के चलते अपना अस्तित्व ही खोते जा रहे हैं। उपस्थिति एवं परिस्थिति कब उपस्थिती और परिस्थिती में बदल गयी पता ही नहीं चला तथा वही सही लगने लगा। 95 प्रतिशत पढ़े लिखे लोग अर्हता को अहरता पढ़ते हैं और बोलते भी हैं। शब्दों के साथ इस बलात्कारी प्रवृत्ति का यदि व्यापक विरोध नहीं हुआ तो निकट भविष्य में ही शब्दकोशों को बदलना पड़ेगा और नये शिरे से गलत शब्द वाले शब्दकोशों को हमें स्वीकार कर लेना होगा। आशीर्वाद कब का आशिर्बाद हो चुका है। मेहनत मेनहत में परिवर्तित हो चुकी है। एनाउंस को एलाउंस कहना आम बात है। यह सब कोई अनपढ़ कहता तो चलता पर पी-एच.डी. उपाधि धारक यदि ऐसा अपराध करें तो इसे एक अक्षम्य बलात्कारी उद्योग माना जाना चाहिए। आप सब मेरी बात से कहां तक सहमत हैं अवश्य बताने की कृपा करें।

कमेंट बाई फ़ेसबुक आई.डी.

12 comments:

  1. मैं तो आपकी बात से पूरी तरह सहमत हूँ सर!

    सादर

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  2. लखलऊ गया था भाई--

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  3. सौ प्रतिशत सहमति है आपकी बात से ।

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  4. is baat se to main bhi sahmat hun....

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  5. मैं भी आपकी बातों से पूर्णतः सहमत हूँ...

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  6. MISHRA JI BAHUT KHOOB SOORAT VISHAY UTHANE KE LIYE ABHAR....AJ KL TO MAT POOCHHIYE KYA KYA HO RAHA HAI ....AP TO MEHNAT ...MENHAT ME BADAL CHUKA HAI ...KRIPAYA.. KRIPPYA ME ....AUR IS TARAH KE HAJARON SHABD ....PADHE LIKHE LOGON KE DWARA PRYOG KIYE JA RAHE HAI.....SACHMUCH ....YE SHBDON KE SATH DHARA 376 KA HI KESH BANATA HAI ....LANAT HAI AISE LOGON KO....AK MAJEDAR AUR GAMBHIR PRASTUTI PR SADAR ABHAR.

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  7. :) सही कहा आपने ...ऐसे लोग कई हैं ..
    kalamdaan.blogspot.in

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  8. ऐसे शब्दों का एक शब्दकोश बनाया जा सकता है.bahut सामयिक . बधाई

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  9. मिश्र जी अब लोग कृपा नहीं कृपया करते हैं तो कृपया करके हमारी भी सहमति दर्ज़ कर लीजिए अपनी बातों से

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  10. आपकी पोस्ट आज की ब्लोगर्स मीट वीकली (३१) में शामिल की गई है/आप आइये और अपने विचारों से हमें अवगत करिए /आप इसी तरह लगन और मेहनत से हिंदी भाषा की सेवा करते रहें यही कामना है /आभार /

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