Monday 6 February 2012

विधायकी चिंता

ये सर की करें चिंता    या    कार की करें ।
या दिल से जुड़े माफिया सरदार की करें ।
झंझट ये हैं विधायक  ,   मजबूरियाँ भी हैं ,
चिंता  करें  तुम्हारी या  घर-बार   की   करें । 

7 comments:

  1. सटीक व्यंग्य है कविता में... बढ़िया !

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  2. कम शब्दों में जीवन का सच दिखती सार्थक कविता ....

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  3. खूबसूरत प्रस्तुति पर बधाई ।

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  4. गज़ब का झंझट ...
    लाजवाब !

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  5. हा हा! सर की या कार की, क्या कहें सरकार की!

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