Wednesday 8 February 2012

एक नज़र इधर भी ....

नारी जीवन आज कल का एक ऐसा विषय बन गया है जिस पर लोग जमकर लिख रहे हैं। इस विषय पर मैंने भी बहुत लिखा ,बहुत क्या शायद ज़रूर से ज्यादा ही लिखा है। क्यूँकि और लोगों की तरह मैं भी चाहती हूँ कि नारी जीवन में परिवर्तन आए इस  पुरुष प्रधान देश और समाज में हर वर्ग की नारी को बराबर का सम्मान मिले उसका अधिकार मिले। क्यूंकि मुझे ऐसा लगता है, कि हमारे समाज में हर वर्ग की नारी को अब तक उसका अधिकार और सम्मान वैसा नहीं मिला है जैसा मिलना चाहिए। आज भी छोटे-छोटे गाँव में नारी की दशा वैसे ही दयनीय है। जैसे पहले हुआ करती थी। हाँ मध्यम वर्ग और उससे ऊपरी वर्ग में जागरूकता जरूर आई हैं। तभी आज नारी हर एक क्षेत्र में पुरुष के कंधे से कंधा मिला कर चल पा रही है।
मगर फिर भी आज भी जब कहीं किसी बहन, बेटी या बहू की दहेज को लेकर की गई हत्या की कोई घटना सामने आती है, तो मन से जैसे एक आह! सी निकलती हैं, कि इतने सालों बाद भी हमारे समाज से यह दहेज प्रथा जैसी कुप्रथाओं का नाम नहीं मिट पाया है और ज़ेहन में हर वक्त, हर घड़ी एक ही सवाल कौंधता है। आखिर क्यूँ और कब तक चलेगा यह सब। अब तो पढ़ी लिखी अच्छे औधे पर कार्यरत लड़की जैसे कोई डॉक्टर हो, या फिर इंजीनियर या और कोई पोस्ट मगर उसके साथ भी ससुराल में वही सुलूक और वही दहेज की मांग और फिर दहेज ना मिले की सूरत में वही हत्या कांड, ऐसे हालातों में मुझ जैसे लेखकों (यहाँ मैं सभी लेखकों की बात कर रही हूँ) केवल एक यही माध्यम नज़र आता है। लिखने का, कि शायद इस विषय पर ज्यादा से ज्यादा लिखने से लोगों में जन चेतना जागउठे और एक क्रांति आसके जो इन कुप्रथाओं के खिलाफ एक आवाज बन सके।
मगर अफसोस की ऐसा कुछ होता ही नहीं, भले ही आज नारी मुक्ति मोर्चा जैसे कई संस्थायें है जो नारी के सशक्ति कारण के लिए बहुत से सराहनीय और महत्वपूर्ण कार्य कर रही हैं। मगर स्त्री की दशा आज भी वहीं के वहीं ज्यून की तियु ही बनी हुई है। जब भी मैं इस विषय में सोचने लगती हूँ, तो ऐसा लगता है कितना कुछ है कहने के लिए, लिखने के लिए, लोगों को समझाने के लिए, तो दूसरे ही पल फिर ऐसा लगता है क्या फायेदा इस गूंगे बहरे समाज को कुछ भी समझाने का क्यूंकि यदि इसमें इस पीड़ा को देखने सुने और समझने की थोड़ी सी भी शक्ति होती। तो कम से कम हमारे देश में विद्यमान हजारों कुप्रथाओं में से कम से कम इस एक दहेज प्रथा जैसी कुप्रथा का खात्मा तो अब तक हो ही गया होता। लेकिन वो कहते हैं

"जिस तन लागे वो तन जाने"

बस वैसा ही कुछ रवैया है, हमारे समाज में रह रहे लोगों का इस कुप्रथा के प्रति भी है, जिसकी बहू या बेटी पर यह बीतता है वहीं जानता है और समझ सकता है इस पीढ़ा को, बाकियों का क्या है आए थोड़ी देर इस विषय पर भाषण झाड़ा, दो आंसु बाहये और निकल लिए बस हो गया। मगर जिन लोगों की ज़िंदगी में उनके अपनों के साथ ऐसा भायानक वाकया हुआ है कभी उनके दिलों से पूछकर देखा है ? किसी ने बचपन से जिस नन्ही सी फूल सी गुड़िया, जैसी बेटी को पाला-पौसा उसे अच्छे संस्कार के साथ उच्च शिक्षा भी दिलवाई और उसके बाद शादी के समय पढ़ी लिखी काबिल बेटी देने के साथ-साथ दहेज भी दिया। उसके बावजूद भी माता-पिता को क्या मिला। ? बेटी पहले घर से गई और फिर दहेज के लोभियों ने उसे दुनिया से भी विदा कर दिया। यह सब सोचकर, पढ़कर, जानकर ऐसा लगता है छी..... एक ऐसे सड़े हुए विचार और इतनी छोटी सोच रखने वाले समाज का मैं भी एक हिस्सा हूँ। तब शर्म आने लगती है अपने आप पर, ऐसी सोच रखने वाले इन्सानों ने ना केवल एक इंसान बल्कि पूरी इंसानियत को बदनाम कर रखा है। समझ नहीं आता आखिर कहाँ जा रहे हैं हम?? या फिर कहाँ पहुंचे हैं हम? यदि इस विषय के दृष्टिकोण से सोचो तो लगता है कहीं गए ही कहाँ है हम, जहां कल थे वहीं तो आज भी खड़े हैं।
वैसे तो में भूर्ण हत्या के सख्त खिलाफ हूँ, मगर जब ऐसा कुछ पढ़ने में आता है कि कुछ मुट्ठी भर लोगों का दबदबा इस समाज में हजारों, लाखों लोगों के अस्तित्व से कहीं ज्यादा है तो ऐसे में यह भूर्ण हत्या भी गलत नज़र नहीं आती मुझे, भले ही उसके लिए वह माँ खुद भी कितनी बड़ी दोषी क्यूँ ना हो, भले ही लोग उसे कितना भी यह कह-कह कर क्यूँ न कोसते हों ,कि एक औरत होकर भी दूसरी बच्ची के या दूसरी औरत के प्रति उसने भूर्ण हत्या जैसा महा पापा किया, बेटी को जन्म लेने से पहले ही मार दिया वगैरह -वगैरह मगर ज़रा आप खुद को उस स्त्री,उस माँ की जगह पर रखकर देखिये और एक बार आपने दिल, अपनी आत्मा से सोचिए कि जिस माँ को यह डर हो कि उसकी संतान के साथ भी बड़े होकर वही सब किया जाएगा, जो उसके साथ हुआ जैसे दहेज के लिए दी गई यातनाएं या फिर आदिवासी समाज में महिलाओं को निर्वस्त्र करके सारे आम भगाना या नचाना आए दिन होते बलात्कार सारे समय असुरक्षा की भवाना, चाहे बच्ची कि उम्र हो या औरत की नारी जीवन को सदा ही एक अग्नि परीक्षा बनाते हैं लोग, ऐसे हालातों में भला कौन माँ चाहेगी अपनी बेटी को इस अग्निपरीक्षा से गुज़ारना। 

लेकिन ख़यालों का क्या है, वो तो बस आते-जाते हैं, पल में तोला, पल में माशा ....जब दोनों पहलुओं पर ग़ौर करके देखो तो एक बार यह ख्याल भी दिलो दिमाग पर दस्तक देता है, कि नारी के प्रति हर तरह से बढ़ रहे अत्याचार के लिए हम केवल पुरुषों को ही जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते। कहीं न कहीं इस सब के पीछे खुद नारी  भी उतनी ही जिम्मेदार है जितना कि यह पुरुष वर्ग, क्यूंकि जिस तरह से आज कल के आधुनिक दौर में जिस तेजी से नारी का पहनावा और सोच बदली है। वही सोच कहीं न कहीं जिम्मेदार है इस आए दिन घटती बलात्कार और छेड़छाड़ जैसी घटनों के लिए। क्यूंकि अंगप्रदर्शन करने वाले वस्त्र पहनकर सारे आम घूमना, खुद को आधुनिक युग का दिखाने के चक्कर में शराब और सिगरेट पीना, देर रात तक बाहर क्लबों में जाना और घूमना यही सब बढ़ावा देता है पुरुषों को इसमें उन बेचारों की भी भला क्या गलती। आग को हवा तो खुद औरतें ही देती हैं। 

मगर हाँ जितनी यह बात सच है उतना ही कड़वा सच यह भी है,कि इस सब मामलों में ज्यादा तर गरीब,लाचार और मजबूर औरतें ही पिसा करती हैं। कुछ को भूख और गरीबी के कारण जानबूझ कर इस नर्क की आग में कूदना पड़ता है, तो कुछ मासूम बच्चियाँ शिकार हो जाती है इस समाज में हवस के भूखे घूम रहे भेड़ियों का, मेरे कहने का मतलब है कि यह जरूरी नहीं कि इन सब मामलों में हमेशा पुरुष वर्ग ही गलत हो कुछ हद तक गलतियाँ औरतों कि भी हुआ करती है। पता नहीं कुछ लोग (यहाँ मेरा तात्पर्य कुछ महिलों से है) कुछ लोग यह क्यूँ भूल जाते हैं

"ज़माना चाहे कितना भी क्यूँ ना बदल जाये, 
नारी हमेशा नारी और पुरुष हमेशा पुरुष ही रहेगा" 

एक नारी के लिए उसके जीवन के कुछ नैतिक मूल्य है और ऐसा नहीं है, कि यह नैतिक मूल्य केवल नारी के लिए ही बनाए गए हैं पुरुष वर्ग के लिए भी हैं। आखिर कुछ तो सोचा होगा और अनुभव किया होगा न हमारे बुज़ुर्गों ने भी...जिसके चलते उन्होने दोनों वर्गों के लिए कुछ नियम, कायदे, कानून बनाये। जिनका पालन यदि दोनों ही वर्ग सही ढंग से करने तो शायद संतुलन बना रहेगा लेकिन ऐसा हो नहीं पाता है। अंधी आधुनिकता की दौड़ में नारी खुद अपनी मान-मर्यादा सब कुछ दांव पर लगाने को तयार है, केवल खुद को आत्मनिर्भर बनाने और पुरुष से बराबरी दिखाने के लिए आज कल लड़कियां क्या कुछ नहीं करती। हाँ यहाँ इतना ज़रूर कहना चाहूंगी, कि हर क्षेत्र में ऐसा नहीं है। मगर कुछ एक ऐसे क्षेत्र हैं, जहां महिलायें खुद पूरी तरह से अपनी मर्यादा भूलाने के लिए सहजता से तयार हैं। मैं भी आज के जामने कि ही एक महिला हूँ। मगर तब भी मुझे बहुत आश्चर्य होता है महिलाओं की  ऐसी सोच पर सब कुछ गवा कर मर्यादा और आत्मसम्मान को खोकर यदि आपने कुछ पा भी लिया जीवन में तो क्या आप खुश रह सकते हैं और अपने साथ-साथ अपने से जुड़े लोगों को खुशी दे सकते है??? जहां तक मेरी सोच कहती है नहीं क्यूंकि मेरा ऐसा मानना है कि जब तक 

"कोई भी इंसान यदि स्वयं अंदर से खुश नहीं होगा, 
वो औरों को भी कभी खुश नहीं रख पाएगा" 

यह सब मैं इस लिए कह रही हूँ क्यूंकि जिस तरीके से आजकल रुपहले पर्दे पर औरतों के पहनावे के द्वारा आश्रलीलता लोगों के सामने परौसी जा रही है। उससे तो यही सब बातें सामने आती है जो मैंने ऊपर लिखा पहनावे के नाम पर तो जैसे आजकल केवल अंतर वस्त्र ही रह गए है औरतों के लिए.....यह सब विदेशी संस्कृति हैं। जिसने आज की युवा पीढ़ी की सोच पर पूरी तरह काबू पा लिया है। इसलिए हम लोग यह भूल गए हैं कि एक औरत के लिए ज़माना कभी नहीं बदलता। उसके लिए उसके जो आदर्श और उसूल कल थे। वही आज भी हैं और जिन्होने यह आदर्श और उसूल आज भी बचा कर रखें हैं वह आज भी सुरक्षित हैं तभी दुनिया उन्हें सम्मान की दृष्टि से देखती है और जिन्होने इन्हें खो दिया है उन्हे तो बड़ी आसानी से आप अपने आस-पास देख ही सकते है।

ज़रा सोचिए यदि ऐसा ना होता तो क्यूँ पुरुष वर्ग बाहर चाहे जितनी भी आइयाशी क्यूँ ना करते हों, मगर खुद के घर कि बहू बेटियों को एक आदर्श भारतीय नारी के रूप में ही देखना चाहते है। आज भी जब कोई लड़का शादी के लिए लड़की देखने जाता है तब भले ही आज कल के महंगाई के दौर में उसकी पहली शर्त नौकरी वाली महिला हो मगर तब भी उसकी इच्छा यही होती है, कि जब भी वो घर पर लौटे उसकी बीवी उसे घर में बच्चों के साथ मिले अगर मैं गलत हूँ तो कह दीजिये ऐसी मंशा नहीं होती पुरुषों में, आप सब ही बताइये की इन सब समस्याओं का कारण आखिर है क्या ? सामाजिक सोच या बदलती संस्कृति के चलते तेजी से बदलती मानसिकता ? क्यूंकि बदलाव प्रकृति का नियम हैं और किसी भी संस्कृति को अपनाना कोई गलत बात भी नहीं है। मगर हाँ जिस तरह हर चीज़ के दो पहलू होते हैं, एक अच्छा एक बुरा वैसा ही कुछ संस्कृति में भी होता होगा ना!!! तो हमको जरूरत है उस दूसरी संस्कृति के वो अच्छे पहलू को अपनाने की जिनसे हमारे जीवन और हमारे समाज का कुछ भला हो सके। हमें कुछ अच्छी और नई सोच मिल सके, न कि उस नकारात्म पहलू को अपनाने की जिसके चलेते हम खुद अपनी संस्कृति ,सभ्यता ,और संस्कारों को स्वयम ही भूल जाये .....आपको क्या लगता है ...???      

7 comments:

  1. "ज़माना चाहे कितना भी क्यूँ ना बदल जाये,
    नारी हमेशा नारी और पुरुष हमेशा पुरुष ही रहेगा" ... यही सत्य रहेगा , और अन्याय भी यही रहेगा

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  2. आपकी पोस्ट चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
    कृपया पधारें
    http://charchamanch.blogspot.com
    चर्चा मंच-784:चर्चाकार-दिलबाग विर्क

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  3. बहुत अद्भुत अहसास.सुन्दर प्रस्तुति.

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