Thursday 9 February 2012

किसानों को अपमानित न करो यारों।

     इस देश में किसानो के प्रति जैसा असम्मान है वैसा विश्व के किसी भी देश में नहीं है। जिस देश को कृषि प्रधान कहा जाता हो। जिस देश के विकास में कृषि का योगदान महत्वपूर्ण हो, जिस देश में कृषि उत्पाद कम या अधिक होने पर देश की अर्थव्यवस्था प्रभावित होती हो, जिस देश की आत्मा गांवों में बसती हो, उस देश में किसानों की दुर्दशा पर आंसू बहाना बर्दास्त के बाहर है। कम से कम देश के प्रधानमंत्री या वित्तमंत्री ने किसानों की इज्जत का ख्याल किया और अपने बजट पूर्व विमर्श में उद्योगपतियों को शामिल किया, अन्य वर्गो से बात की लेकिन किसानों की समस्याओं को सुना तक नहीं। दरअसल किसानों की कोई समस्या है ही नहीं जिस पर प्रधानमंत्री एवं वित्तमंत्री उनसे बात करते। मेरी नजर में भी किसान खुशहाल है। लेकिन लोगों को कौन समझाए। वे प्रधानमंत्री की नीयत में खोट का रिसर्च कर रहे हैं। उन्हें करने दीजिए रिसर्च, क्योंकि कम से कम वे अपनी रचनात्मकता का उपयोग तो कर रहे हैं न वरना अन्ना एवं रामदेव के साथ वे अपना समय जाया करेंगे। 
     यह विचार करने का प्रश्न है कि जिस देश का किसान अपनी फसलों को सड़कों पर फेंक देता हो वह गरीब कैसे हो सकता है। वह तो इतना संपन्न है कि उसे अपने उत्पादित माल को सड़कों पर फेंकना पड रहा है। जिस देश में किसान इतना संपन्न होंगे वहां क्या कोई विश्वास कर सकता है कि वे आत्महत्या करने तक को उतारू हो जाएंगे।  
     जब 25-30 रूपये आमदनी वाले को सरकार ने गरीब मानने से इनकार कर दिया था तो मुझे पहली बार यह लगा कि वर्तमान सरकार लोक कल्याणकारी सरकार है। और यह मानकर चल रही है कि भला किसी का कर न सको तो बुरा किसी का मत सोचो। लेकिन जल्द ही यह मेरे मन का वहम निकला और सरकार ने 25-30 रूपये प्रतिदिन कमाने वाले को अमीर मानने से इनकार कर दिया। कुछ देश द्रोही तत्वों ने सरकार के इस कदम की जमकर आलोचना की थी लेकिन मेरा सीना तन कर 11 फुट चौड़ा हो गया था क्योंकि जब मैं सुबह जगा तो अमीर हो गया था।
     सरकार के रूख में विरोधाभास भी नजर आता है। एक ओर किसानों अमीर मानकर उनसे बजट पूर्व विमर्श नहीं किया जाता तो दूसरी ओर मंचों से माननीयों द्वारा उनकी दशा पर खूब आंसू बहाया जाता है। देश का शायद ही कोई मंत्री हो जो कृषि एवं किसानों की दुर्दशा पर आंसू न बहाता हो। किसानों के सारे तर्क कि उनकी स्थिति इस देश में दीन-हीन नहीं। माननीय सदस्यगण इतने दयालु न बने, क्योंकि ये उन्हें रिएक्शन कर जा रहा है।  किसानों को मजबूरी में यह भी बताना पड़ रहा है कि वे गरीब नहीं बल्कि इतना अमीर हैं कि वे अपनी फसलों को मुफ्त में दे दे रहे हैं यानी सड़को पर फेंक रहे हैं। 
     आइए! थोड़ा हम किसानों के घावों पर मरहम लगाते हुए थोड़ी उनकी स्तुति गाएं। इस क्रम में हम उनकी तुलता नारियों से करेंगे। किसानों की भी इस देश में वैसी ही महिमा गाई जाती है जैसा कि नारियों की गाई जाती है। नारी को इस देश में देवी कहकर सम्मानित किया जाता है। घर-घर में इस देवी की कैसी पूजा होती है, इसे पूरा इंडिया जानता है। नारी और किसान एक और मामले में समान है। दोनों का त्याग देश और समाज के लिए बेजोड़ है। ये दोनों दूसरे के लिए जीते हैं। दोनों हंसते हंसते अपना तन-मन-धन देश एवं समाज के लिए उत्सर्ग कर देते हैं। किसान खेतों में दिन भर खटता है और नारियों को घरों में खटना पड़ता है। दोनों का लोग आदर करते हैं, लेकिन तब तक जब तक वे अपने अधिकारों की बात नहीं करते। अधिकारों की मांग करने पर किसानों पर गोलियां चलाई जाती है और बहु-बेटियों की होलियां जलायी जाती है। दोनों अपने दुखदर्द को दबा जाते हैं। मुख से उफ्‌ तक नहीं कहते। और चुपचाप अपनी इहलीला समाप्त कर लेते हैं।

5 comments:

  1. शुक्रवारीय चर्चामंच पर है यह उत्कृष्ट प्रस्तुति |

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  2. बहुत ही बढ़िया सार्थक एवं सशक्त आलेख....

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