Wednesday 15 February 2012

जिम्मेदार आख़िर कौन ??


 यूं तो आज कल है प्यार का त्यौहार मगर क्या आज सभी कि ज़िंदगी मे बचा है प्यार ? न जाने कितने साल बीत गए कश्मीर को जीत ने की लड़ाइयाँ लड़ते-लड़ते, मगर अब तक खुद कश्मीर को इन लड़ाइयों से आज़ादी नहीं मिल पाई है। कभी-कभी सोचो तो लगता है एक नारी जीवन और कश्मीर की व्यथा शायद एक सी है। जिसकी अपनी कोई मर्ज़ी नहीं होती। जब जिसका जैसा मन करता है, वो उसे अपने तरीके से चलाने की कोशिश करता रहता है। लेकिन उस कश्मीर से आज तक किसी ने नहीं पूछा कभी, कि तुम खुद क्या चाहते हो, तुम्हारी अपनी मर्ज़ी क्या है। एक है जो उसे हथियारों के माध्यम से हथियाने में लगा है। बिना उसकी मर्जी जाने उसे अपना बनाना चाहता है। तो दूजा उन्हीं हथियारों से उसकी रक्षा और सुरक्षा के नाम पर उसे बचाने में लगा है.

मगर उन दोनों ने कभी यह नहीं सोचा कि बात उस कश्मीर को अपना बनाने की हो या बचाने की हो, आखिर इस्तेमाल तो हथियारों का ही कर रहे हैं दोनों। चाहे उसे पाना हो, या बचाना चोंट तो उसे ही लग रही है ना। घायल तो वो एक कश्मीर ही हो रहा है। डर लगता है यह सोचकर कहीं ऐसा न हो,कि एक दिन इन दो चक्की के पाटों में पिस्ते-पिस्ते कश्मीर अपना दम तोड़ दे। तब क्या करेंगे यह दोनों...उससे उसकी खूबसूरती और अमन चैन तो पहले ही छीना जा चुका है। अब ज्यादा कुछ रह नहीं गया सिवाय ज़मीन के एक टुकड़े के जैसे किसी औरत से जब उसका घर परिवार सब कुछ छिन जाने के बाद उसके अस्तित्व का कोई मोल नहीं रह जाता और तब उसका जीवन एक ज़िंदा लाश के समान हो जाता है। ठीक वही हाल तो है अब कश्मीर का कुछ भी तो बाकी नहीं है अब वहाँ सिवाय एक ज़मीन के टुकड़े के, कभी यह जुमला सुना था कहीं किसी ने कहा था एक बार

"घरों को लूटते हैं
इन्सानों को उजाड़ते है
जाने क्या आज़ाद करना चाहते है" 

कश्मीर के नाम पर भाषण देने वाले की कोई कमी नहीं है। मगर ऐसे कितने लोग हैं, जिन्होंने वहाँ के लोगों के दर्द को समझा, उनसे बातें की, उनकी भावनाओं को समझने कि कोशिश की, शायद बहुत कम लोग होंगे,जिन्हों ने उनके मुंह से यह सुना होगा, कि लाखों घर उजाड़ गए मियां, हम किस गिनती में आते हैं। अब तो बस अपना घर वहाँ होगा जहां अपने होंगे बाकी सब तो ईंट पत्थर है। माना की घर-घर में रह रहे लोगों से बनता है, ना की ईंट पत्थरों से, क्यूंकि जो ईंट पत्थरों से बना होता है वो घर-घर नहीं मकान होता है। मगर इस एक जुमले के पीछे कितने मासूम बच्चों कि कुचली हुई भावनाए हैं। कितने दिलों के जज़्बातों का खून है, उसे शायद ही किसी ने महसूस किया हो, 
अरे ज़रा आप ही सोचकर और अपने दिल पर हाथ रखकर कहिये, कि क्या सिर्फ अपनों के होने से ही घर घर होता है। ? क्या उस घर में उन ईंट पत्थरों का कोई मोल नहीं होता। जहां घर के एक बुजुर्ग इंसान ने अपनी तामम उम्र गुज़री हो, जहां बच्चों ने अपना बचपन जिया हो, जिस घर से कोई बेटी कि डोली उठी हो जहां से उस घर में रह रहे हर एक व्यक्ति के जीवन की हजारों यादें जुड़ी हों, क्या ऐसे  ईंट पत्थर से बने घर की कोई कीमत नहीं?? एक हम हैं, (हम से यहाँ तात्पर्य एक आम इंसान से है) जब कभी हमारे सपनों का आशियाँ भी अगर टूट जाये तो तिलमिला जाते हैं हम।
तो ज़रा सोचकर देखो ओ बाक्षकों और रक्षकों जब वहाँ के बाशिंदों का घर उजाड़ देते हो तुम तो क्या गुजरती होगी उन मासूम दिलों पर और जब आज वही मासूम दिल यह सब सहसह कर पत्थर के हो चुके हैं और बदले की भावना में जलते हुए उन्होने भी हथियारों को चुना और औढ लिया नकाब आतंकवाद का तो क्या बुरा किया??? जब खुद हमने ही इस कदर लूटा उन्हें आज़ाद कराने के नाम पर, तो कभी सुरक्षा के नाम पर, और रही सही कसर पूरी करदी उसे छीन कर जबर्दस्ती अपना बना लेने की तमन्ना रखने वालों ने जिसका अंजाम आज यह है कि उनका इंसानियत और विशवास जैसे शब्दों पर से भरोसा ही उठ गया तो, यह गुनाह पहले किया किसने हम ने या उन्होने .??..तो फिर अब क्या हक रह जाता है किसी का की कश्मीर में हो रहे फ़सादों को कोई आतंकवाद का नाम दे। यूं तो इस विषय में सबका अपना एक अलग ही नज़रिया है और उस नज़रिये के आधार पर अपना एक निर्णय की ऐसा होना चाहिए इस समस्या का हल या वैसा होना चाहिए , मगर कहने से क्या होता है। हल तो आज तक निकाल नहीं पाया, कारण चाहे भ्रष्टाचार हो या कुछ और झेल तो वहाँ के लोग ही सबसे ज्यादा रहे हैं। ऐसे में यदि उन्होने खुद की रक्षा के लिए या बदले की भावना के चलते ही सही, जो की जायज़ है आतंकवाद का नाकाब पहन भी लिया तो क्या बुरा किया। आखिर हैं तो वो भी इंसान ही हर कोई तो महात्मा गांधी नहीं हो सकता।     
आप को क्या लगता ?.             

10 comments:

  1. सच कहा..
    kalamdaan.blogspot.in

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  2. (१) कभी-कभी सोचो तो लगता है एक नारी जीवन और कश्मीर की व्यथा शायद एक सी है।एक हम हैं, (हम से यहाँ तात्पर्य एक आम इंसान से है) जब कभी हमारे सपनों का आशियाँ भी अगर टूट जाये तो तिलमिला जाते हैं हम.... जो स्वाभाविक है..... !!
    "और"
    (2) ऐसे में यदि उन्होने खुद की रक्षा के लिए या बदले की भावना के चलते ही सही, जो की जायज़ है आतंकवाद का नाकाब पहन भी लिया तो
    आपने अलग-अलग चित्रण किया है.... ! "आतंकवाद" किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता.... !!

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    1. जी हाँ आपने भी बिलकुल ठीक कहा कि "आतंकवाद किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता" मगर मैं भी इस बात को समाधान नहीं बताया है। सिर्फ यह कहने कि कोशिश की है,कि यदि इस समस्या का हम कोई समाधान नहीं कर सकते तो हमको जो हो रहा है उसे भी गलत ठहराने का कोई हक नहीं...क्यूंकि बाते करना और भाषण देना बहुत आसान होता है मगर जिस पर गुजरती है वही उस पीढ़ा को समझ सकता है।

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  3. सार्थक और सुन्दर प्रस्तुति

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  4. आपकी पोस्ट चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
    कृपया पधारें
    http://charchamanch.blogspot.com
    चर्चा मंच-791:चर्चाकार-दिलबाग विर्क

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  5. पल्लवी जी आपकी पोस्ट से अवगत हुआ ........पढ़ने के बाद प्रशांत भूषन जी का विवादस्पद बयान स्मृति पटल पर बार बार आया ...बहुत कुछ लिखने की इच्छा है परन्तु समयाभाव के कारन संक्षेप में कहना चाहूँगा कश्मीर का बहुत बड़ा सामरिक महत्व है , कश्मीर सदैव भारत का अभिन्न अंग बन कर ही रहेगा .....रहा सवाल कश्मीरवासियों का तो वे स्वेच्छा से भारत में विलय हुए थे और उन्हें कभी भी भारत ने अपने अनन्य राज्यों से अधिक ही तरजीह दी है .....
    आप ने आतंक वाद को अपनाना उनकी विवशता बताया है मै इस से कदापि सहमत नहीं हूँ ......बिलकुल गलत बात आतंकवाद उनका धार्मिक जिहाद है जो पाकिस्तान से कश्मीर के कट्टर पंथी आयात करते हैं .....भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है वह इसे कदापि बर्दास्त नहीं करेगा | ये आतंकवादी कश्मीर ही नहीं भारत को हजार टुकड़ों के रूप में देखना चाहते हैं .....क्या आप भारत को एक तालिबानी व्यवस्था के रूप में स्वीकार कर सकेंगी ...शायद नहीं ...फिर ऐसे लोगो के लिए सहनुभूति क्यों ? कश्मीर के पंडितों को मार मार कर कश्मीर से भगाया गया क्या वे कश्मीर के नागरिक नहीं थे ......इस करुण व्यथा पर आपकी कलम क्यों नहीं चल पाती .....? आज भी भारत के अन्य राज्य के लोग धारा ३७० के कारण कश्मीर में नहीं बस पा रहे हैं .... अरबों खरबों रुपये कश्मीर के कट्टर पंथीयों और राजनेताओं ने भारत सरकार को ब्लैक मेल किये हैं भारत सरकार ने कश्मीर के लिए बहुत कुछ गवाया है ......किसी अन्य राज्य को इतने पैसे मिले होते तो वह राज्य अमेरिका जैसी सुविधाओं से लैस रहता परन्तु पाकिस्तान ने हमेशा कट्टर पंथियों का पोषण किया ......और उन्हें आतंकवाद के लिए प्रेरित किया .....भारतीय संसद भवन पर हमले करवाए गए ....बम्बई बम कांड हुए ......होटल ताज पर हमले हुए .....ऐसे लोगों पर दया करने की बात कम से कम मेरी समझ में नहीं आयी है ......कृपया भारत के लिए लिखें ........कट्टर पंथियों से भारत ही नहीं पूरी दुनियां परेशान है | कश्मीर सदैव भारत का अंग था ,अंग है और रहेगा भी |
    भरोसा है आप मेरी बातों को अन्यथा नहीं लेगी .........देश के प्रति निष्ठां ने हमें लिखने के लिए बाध्य किया |

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    1. सबसे पहले तो आपका बहुत-बहुत शुक्रिया कि आप मेरे "बेसुरम" वाले ब्लॉग पर भी आए और उसे पूरी शिदत्त से पढ़कर आपने आपने महत्वपूर्ण विचार वहाँ प्रस्तुत किये। यह जानकर बहुत अच्छा लगा कि किसी ने तो पूरा आलेख पढ़कर कोई टिप्पणी दी, रही बात भारत के बारे में लिखने की तो जहां तक मुझे लगता है आपने मेरे कई ओर आलेख भी पढे होंगे और उसे आपको यह आभास भी हुआ हो शायद कि मैं खुद एक हिदुस्तानी हूँ और भारत के प्रति मेरे मन में भी वही प्रेम है जो हर हिन्दुस्तानी के मन में होना चाहिए। मगर मैं आपको यह बताना चाहिती हूँ, कि मैंने उस पोस्ट के जरिये आतंकवाद को बढ़ावा देने की या उससे सहमत होने की बात नहीं की है। अगर आपने विभा जी की टिप्पणी पढ़ी हो तो मैंने उनको भी यही प्रतिउत्तर दिया था। इस पोस्ट के जरिये मैं आनतकवाद या आतंकवादियों को सही नहीं ठहरा रही हूँ। मुझे भी पता है,कि यह साजिश हमेशा से ज़्यादातर पाकिस्तान रचता आया है। क्यूंकि वो कश्मीर को भारत का हिस्सा ना मानते हुए अपनी और मिलना चाहता है। इसलिए न सिर्फ वो कश्मीर बल्कि पूरे देश में बम विस्फोटों के माध्यम से आतंक फैलाता रहा है और आज भी फैला रहा है। आपकी यह बात भी सही है, कि आज तक हमारी सरकार ने जितना पैसा कश्मीर के बचाव के लिए खर्च किया यदि उतना किसी और राज्य के लिए होता तो आज बात ही कुछ और होती। मुझे आपकी बातों से इंकार नहीं है, लेकिन मेरा कहना सिर्फ इतना है कि पाकिस्तान हो या हिंदुस्तान वहाँ होने वाले हादसों ने कहर केवल वहाँ के बाशिंदों पर ही ढाया है। फिर चाहे पाकिस्तान ने वहाँ के लोगों को जबरन वहाँ से भगाने के लिए फसादात करवाएँ हो या हिंदुस्तान ने पाकिस्तानी आतंकवाद को वहाँ से हटाने के चक्कर में कोई निर्णय लिया हों नतिजन दंगे फसाद हुए और झेलना हमेशा ही पड़ा वहाँ के लोगों को चाहे सुरक्षा के नाम पर या फिर आतंकवाद के नाम पर बस वहाँ रह रहे लोगों के इसी दर्द को लिखने की कोशिश की थी मैंने बाकी तो कश्मीर हमारा है और हमारा ही रहे बस यही दुआ है मेरी ... जय हिन्द उम्मीद है आप भी मेरी बात को अन्यथा नहीं लेंगे। एक बार फिर आपका बहुत-बहुत शुक्रिया

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