Friday 17 February 2012

विनम्र निवेदन-

पिछले तीन दिनों से हमारा नेट एकदम ख़राब चल रहा है इसलिए ज़ल्दी-ज़ल्दी तीन-चार सवाल कर लेता हूँ देश के रहनुमाओं से। कल हमने समाचार-पत्र में देखा एक और घोटाला लगभग 25 करोड़ का मनरेगा मद से। आये दिन घोटालों की झड़ी सी लगी जा रही है। वाह! क्या नज़ारा है एकदम फुलझड़ी सरीखा। देश में जब पहला घोटाला हुआ होगा और उसकी जांच समिति बठाई गयी होगी तब से लेकर आज तक हुए समस्त घोटालों की जांच समितियां बैठी पर प्रश्न एक- उनका कुछ नतीज़ा आया? या केवल जांच समितियां ही बैठाकर सरकार अपने कर्त्तव्य की इति समझ लेती है। किसी भी घोटाले का अब तक सम्पूर्ण निराकरण हो पाया हो कोई बता दे? घोटालेबाजों को ज्यादा से ज्यादा निलम्बित कर दिया गया होगा या थोड़े दिन के लिए ज़ेल भेज दिया गया होगा लेकिन किसी भी घोटाले की रिकवरी आज तक हो पायी? 25-25 करोड़ का घोटाला करके अगर कोई मात्र निलम्बित हो जाय तो क्या फ़र्क पड़ता है उसकी सेहत पर इतना तो वह अपने सम्पूर्ण सेवा-काल में तनख़्वाह नहीं पाता वह तो हो गया राजा। हाँ यह होता है कि जांच समितियां बैठाकर घोटाला करने के नये-नये तरीक़ों से अवश्य लोगों को परिचित करा दिया जाता है। उसका न तो दण्ड दिया जाता है न रिकवरी तो इस रूप में और लोगों को घोटाला करने के लिए प्रोत्साहित ही किया जाता है। क्या भारतीय संविधान में इन घोटालों जैसे अपराधों के सम्पूर्ण और तुरन्त निराकरण का कोई कारगर प्रावधान नहीं है? बस अपराधों पर जांच समितियां बैठाकर उसे बिलम्बित करने का ही प्रावधान है? या सरकारी नुमाइन्दे नहीं चाहते कि ऐसे अपराधों को सम्यक् निराकरण हो और अपराधियों को दण्ड मिले तथा उसकी रिकवरी की जाये। अगर ऐसा प्रावधान नहीं है तो क्यों नहीं ऐसा कानून बनाया जाता कि ऐसे मामलों का निराकरण भी हो तथा लोंगों को सबक भी मिले ताकि आइन्दा ऐसे अपराध न हों। मैं तो समझता हूँ कि सक्षम लोग ही यह सुकृत्य करते हैं अतः वही नहीं चाहते कि इसका कोई स्थाई हल निकले। तो भाई! जो धन घोटाले स्वरूप हासिल किया जाता है वह देश की जनता का ही होता है किसी या कुछ लोगों की व्यक्तिगत सम्पत्ति नहीं अतः वह द्वार सबके लिये खोल दो कि उसे सब हासिल कर सकें। कुछ लोग ही क्यों? अनावश्यक जांच-समितियां बैठाकर उन घोटालों पर और धन तथा समय ख़र्च करने से तो बाज़ आओ जिनका कोई स्थाई निराकरण कम से कम भारत में तो सम्भव नहीं है। हे सियासत के महारथी! हे हमारे महाराजाधिराज! हे धनलोलुप परमभट्टारक! आपसे भारत की जनता की ओर से मैं सविनय निवेदन करता हूँ कि भारतीय जनता के श्रमपूर्वक कमाये धन, समय तथा नाज़ुक संवेदनाओं के साथ खिलवाड़ न करो नाज़ायज रूप से जांच-समितियों को बैठाकर। या तो जनता को भी ऐसा करने का सुअवसर प्रदान करो! हम जनता को भी पैसों की खनक भाती है। यह हमारी भी आवश्यक सुख-सुविधाओं का साधन हो सकता है। आपके अपराध-निवारक गतिविधि से हमारा उत्साह बढ़ा है हम भी ऐसा अपराध करने के लिए उत्साहित हैं।
                                                             -ग़ाफ़िल

5 comments:

  1. सामयिक परिस्थितियों के अनुरूप प्रविष्टि के लिए सदर आभार .....भारतीय न्याय प्रणाली विश्वसनीय तो है परन्तु काफी लचर ......देर से किया हुआ न्याय भी कही न कहीं अपराध की परिधि में आना चाहिए | देर से किया गया न्याय अपराध को प्रोत्साहित ही करता है गाफिल जी |भ्रष्टाचारियों को संपत्ति से सबसे पहले बेदखल कर देना चाहिए | अब आज देखिये एन ०आर ०एच ० एम् घोटाले में न्याय प्रक्रिया व जाँच प्रक्रिया ढीली होने की वजह से एक मौत फिर हो गयी. कहीं इस मौत की जिम्मेदार हमारी जाच व न्याय प्रणालियाँ तो नहीं .....तथ्य पर सकारात्मक चिंतन आवश्यक है |

    फ़िलहाल सार्थक लेख ....पर आपको हार्दिक बधाई .

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  2. पिछले कुछ सालों में घोटालों की जैसे बाढ़ आगे है . महंगाई बढ़ रही है रुकने का नाम नहीं और दूसरी तरफ एक मामूली से कलार्क या चपरासी करोड़ो जेब में लिए बैठा है .

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