Saturday 18 February 2012

मनमे अतीत की याद लिए फिरते है

 (1)
निज अंतर में उन्माद लिए फिरते हैं,
उन्मादों में अवसाद लिए फिरते हैं,
अंदर ही अन्दर झुलस रही है चाहें,
मनमे अतीत की याद लिए फिरते है।
(2)
बेकस का कोमल हृदय जला करता है,
निशदिन उनका कृश-गात धुला करता है,
दुखों की नाव बनाये नाविक,
दुर्दिन सागर पर किया करता है।
(3)
औसत से दुगुना भार लिए फिरते हैं,
संग में कितनों का प्यार लिए फिरते हैं,
यदि किसी भिखारी ने उनसे कुछ माँगा,
भाषण का शिष्ट-आचार लिए फिरते हैं।
(4)
जो सुरा-सुंदरी पान किया करते हैं,
'कल्याण' 'सोमरस' नाम दिया करते हैं,
चाहे कितना भी चीखे-चिल्लाये जनता,
वे कुर्सी-कृष्ण का ध्यान किया करते हैं

5 comments:

  1. समसामयिक व्यंगात्मक सराहनीय रचना.....
    कृपया इसे भी पढ़े-
    नेता- कुत्ता और वेश्या(भाग-2)

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  2. औसत से दुगुना भार लिए फिरते हैं,
    संग में कितनों का प्यार लिए फिरते हैं,
    यदि किसी भिखारी ने उनसे कुछ माँगा,
    भाषण का शिष्ट-आचार लिए फिरते हैं।

    Bahut Khoob. Bahut Sundar Vyangya kavita.

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  3. आपकी पोस्ट आज की ब्लोगर्स मीट वीकली (३१) में शामिल की गई है/आप आइये और अपने विचारों से हमें अवगत करिए /आप इसी तरह लगन और मेहनत से हिंदी भाषा की सेवा करते रहें यही कामना है /आभार /

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