Wednesday 22 February 2012

परीक्षा का मौसम

     लो जी! आ गया फिर परीक्षा का मौसम, अभी तो साल शुरू हुआ था और इतनी जल्दी परीक्षा भी आ गई ऐसा ही लगता है न हर किसी को परीक्षा के वक्त, वो लंबे-लंबे दिन वो सुनी दुपहरी उस दुपहर के सन्नाटे में आइसक्रीम वाले के डमरू की आवाज़ तो कहीं कुल्फी वाले की घंटी की टन-टन वो गरम हवायें चारों ओर एक अजीब सा पसरा हुआ सन्नाटा सिर्फ ओर सिर्फ पंखे और कुलर की आती हुई आवाज ऐसे में घर को बाहरी गर्मी से बचाने और ठंडा रखने के लिए हरे पर्दों के बंद किया गया कमरा जहां पसरी हुई होती थी एक आजीब सी खामोशी। चारों और बस पढ़ाई के लिए बनाया गया माहौल न टीवी की आवाज न किसी और मनोरंजक चीज़ की बस शाम  होते ही थोड़ी लोगों की चहल-पहल और नल में पानी का आना और यदि थोड़ी देर के लिए मन बहलाना भी है। तो गर्मी से तपते पेड़ों में पानी देना और सूखे बरान्दे को गीला करना ही आपका एक मात्र मनोरंजन, तय किया जाता था फिर चाहे आपको उन तपते हुए पत्थरों से उठी हुई भाप देखकर अपना वर्तमान ही क्यूँ ना दिखाई दे इसे किसी को कोई सरोकार नहीं....  ज़रा ध्यान भटका नहीं की कहीं से आवाज आई "यहाँ वहाँ ध्यान देने की जरूरत नहीं पढ़ाई करो-पढ़ाई जिस से भले दिन हो, जो पढ़ा होता सारे साल तो आज यूं इतनी मेहनत न करनी पड़ती अब भुगतो और पढ़ो चुप-चाप खबरदार जो यहाँ से हिले हम से बुरा कोई न होगा समझ लेना हाँ!!!" ...  यही माहौल हुआ करता था अपने जमाने में परीक्षा के समय. उम्मीद है आप सभी को भी अपने-अपने परीक्षा के दिन ज़रूर याद आ गये होंगे  और आप सभी एक होंटों पर एक यादों भरी प्यारी सी मुस्कुराहट भी ज़रूर आ रही होगी है न...
अरे यह देखो आ भी गई 
     बड़ा ही खतरनाक महिना होता है भई यह मार्च का महिना सारे साल की कसर एक ही महीने में निकल जाती है और आपकी ज़िंदगी में आगे क्या होने वाला है का निर्णय भी केवल एक ही महीने में होने वाली परीक्षा पर निर्भर करता है। एक अपना ज़माना था जब ज्यादा से ज्यादा हर महीने यूनिट टेस्ट या बहुत हुआ तो छ:माही परीक्षा और उसके बाद सीधा फ़ाइनल। मगर अब तो बच्चों को जैसे आदत लग गई है परीक्षाएं देने की अब शायद बच्चों को उतना डर नहीं लगता होगा इस परीक्षा नामक भूत से क्यूँकि बेचारे आज कल के बच्चे सरकार की मेहरबानी से पहले ही सारे साल इस परीक्षा नुमा बला से जूझते रहते हैं। तो भला ऐसे हालातों में साल की आखिरी परीक्षा से काहे का डर  रही बात परीक्षा फल के बाद क्या मिलेगा ? सो आज कल बच्चों को शायद उसका भी कोई खास चस्का बाकी नहीं रह गया है। क्यूंकि बेचारे बच्चों को गर्मियों की छुट्टी के नाम पर मिलती ही कितनी छुट्टियाँ हैं। अभी बेचारे परीक्षा सामाप्त होने बाद ठीक से अंगड़ाई भी नहीं ले पाते की स्कूल खुलने के दिन आ जाते है और एक महीने में ही इतना पढ़ा दिया जाता है, कि आने वाले अगले महीने की छुट्टियाँ भी गए महीने का गृह कार्य समाप्त करने में ही गुज़र जाती हैं।
     यही कहर कम नहीं होता, कि होली जैसे त्यौहार को भी मन जलाने के लिए मार्च में ही आना होता है। जब ना पढ़ाई में ही मन लगता है किसी का और न होली खेलने में ही मज़ा आता है। क्यूंकि दिमाग जो शांत नहीं होता रह रहकर परीक्षा वाले भूत का डर सताया करता है। बेचारे बच्चों कि तो ऐसी हालत होती जाती है जैसे वो कहावत है न-
"धोबी का कुत्ता न घर का घाट का"
     अरे रे यह क्या कह दिया मैंने कहीं विद्यार्थी वर्ग बुरा न मान जाये भई, माफ करना विद्यार्थियों आपके मन की व्यथा यूं सरे आम कह गई मैं  बुरा न माओ होली है यार ...इस कहवात वाली बात को मैंने केवल होली के दिन के लिए इस्तेमाल किया है और किसी दिन के लिए नहीं, यदि मेरी इस बात से किसी को बुरा लगा हो तो क्षमा प्रार्थी हूँ भाई लोग,...
मेरी ओर से सभी विद्यार्थियों को उनकी परीक्षा हेतु बहुत-बहुत शुभकामनायें

5 comments:

  1. वाह! क्या चित्रण किया है परीक्षा के दिनों का

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  2. किरकेट में किरकिरी से, लागे किरकेट चाट ।

    अभी परीक्षा में लिखें, पाछे होली घाट ।।


    दिनेश की टिप्पणी - आपका लिंक

    dineshkidillagi.blogspot.com

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  3. परीक्षाओं के त्योहार में मन छुट्टियों के भावी दिनों में भटकता रहता है:)

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  4. परीक्षा का मौसम वाकई परीक्षा का मौसम...बहुत सुन्दर प्रस्तुति

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  5. आपकी पोस्ट चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
    कृपया पधारें
    http://charchamanch.blogspot.com
    चर्चा मंच-798:चर्चाकार-दिलबाग विर्क>

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