Friday 24 February 2012

बौद्ध धर्म-दर्शन का मूलाधार-


     संसार के प्रत्येक प्राणी का परम् श्रेय सुख प्राप्त करना तथा दुःख से निवृत्ति ही होता है। प्रायः दुनिया के सभी धर्म सांसारिक कष्टों से निवृत्ति के मार्ग का ही अनुसंधान करते हुए दिखाई पड़ते हैं। बौद्ध धर्म भी परम् श्रेय सुख की प्राप्ति और दुःख निवृत्ति का उपाय बताता है, लेकिन और धर्मों के तरीकों तथा बौद्ध धर्म के तरीके में आमूल-चूल अन्तर होने के नाते यह सभी धर्मों से विशिष्ट और आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना बुद्ध के समय में रहा होगा।
     दुनिया के प्रत्येक धर्मों का आधार विश्वास और श्रद्धा है जबकि बौद्ध धर्म की नीव बुद्धि है। सभी धर्म पहले परम श्रेयस् में विश्वास करने की शिक्षा देते हैं जबकि बौद्ध धर्म का आधार वाक्य है ‘सोचो, विचारो, अनुभव करो जब परम श्रेयस् तुम्हारे अनुभव में आ जाये तो श्रद्धा या विश्वास करना नहीं होगा स्वतः हो जाएगा।’ उनके मत में इसे जबरन करने की आवश्यकता नहीं है। और यदि किसी के कहने पर विश्वास कर ही लिया जाय, आस्था थोप ही ली जाय अपने मन पर तो यह जबरदस्ती की आस्था हमारे साथ कितनी दूर चलेगी। इसीलिए बुद्ध कहते हैं कि तुम हम पर भी विश्वास मत करो। अपना दीपक स्वयं बनो ‘अप्प दीपो भव’। बुद्ध के विचार से आस्था करने की चीज़ नहीं है आस्था होने की चीज़ है। इस तरह बौद्ध धर्म पूर्णतः बुद्धि पर आधारित है न कि अन्धश्रद्धा पर। और आज 21वीं सदी के युग की प्रवृत्ति नितान्त बुद्धिवादी होती जा रही है। वैसे भी मानव का विकास बुद्धि के ही तरफ़ हो रहा है और हम जितना विकसित होते जा रहे हैं बौद्ध धर्म से अधिक नज़दीक होते जा रहे हैं।
     जहाँ दुनिया के दूसरे धर्म परम श्रेयस् के स्वरूप के निर्धारण में उलझकर रह जाते हैं वहीं बुद्ध का विचार है कि हम परम श्रेयस् के स्वरूप का निर्धारण कर ही नहीं सकते। अगर परम श्रेयस् का अनुभव हमें हो भी जाये तो हम उसे दूसरे को बता नहीं सकते ठीक वैसे ही जैसे यदि लाल रंग किसी के अनुभव में कभी भी न आया हो तो भला उसको हम कैसे समझा सकते हैं कि लाल रंग कैसा होता है? फिर इस उद्योग का निरर्थक प्रयास क्यों?
     इसलिए बुद्ध कभी सुख की बात नहीं करते, कभी ईश्वर की बात नहीं करते, कभी स्वास्थ्य की बात नहीं करते। उनके मत से इन श्रेयष्कर तत्त्वों की व्याख्या करके इन्हें किसी सीमा में बांधा नहीं जा सकता। हम नहीं कह सकते कि सुख क्या है और उसकी सीमा क्या है? वहीं दूसरी तरफ़ हम इसके विपरीत तत्त्वों, दुःख, व्यथा, रोग आदि की व्याख्या भी कर सकते हैं, सीमांकित भी कर सकते हैं और उसका अनुभव भी कर सकते हैं। हम दुःख की परिभाषा कर सकते हैं, उसका कारण जान सकते हैं, उसका निवारण भी सम्भव है, उसके निवारण के उपाय भी खोजे जा सकते हैं। और जब हम रोग, दुःख से पूर्णतः निवृत्त हो जायें तो जो कुछ बचेगा वह सब स्वास्थ्य और सुख होगा। दुःख की अनुभूति तो हमें सहज होती ही रहती है पर दुःख निवृत्ति के बाद ही सुखानुभूति सम्भव है।
     इस प्रकार महात्मा बुद्ध अपना दर्शन दुःख की खोज से आरम्भ तो करते हैं पर परिणति सुख पर ही होती है। अतः बौद्ध धर्म-दर्शन पर दुःखवादी होने का मिथ्यारोप जो कभी-कभी लगाया जाता है सर्वथा अनुचित है। प्रायः और सभी धर्म अपना दर्शन सुख से आरम्भ करते हैं जो कि सर्वसाधारण की समझ से कोसों दूर होता है। परम श्रेयस् से नितान्त अनभिज्ञ होने के कारण लोग उसकी कल्पना में ही उलझ कर रह जाते हैं। जबकि बौद्ध धर्म दुःखी प्राणी को श्रेयस् में उलझाता नहीं वल्कि उसके दुःखों की व्याख्या करके उससे निवृत्ति का मार्ग सुझाता है। दुःख से सम्यक् निवृत्ति के उपरान्त तो परम् सुख का सहज अनुभव होना ही है। महात्मा बुद्ध और उनका धर्म-दर्शन अपने इसी अनूठे दृष्टिकोण के कारण तब, अब और दूर भविष्य में भी कभी अप्रासंगिक नहीं होने वाला। क्योंकि मानव में जितनी ही बौद्धिक क्षमता बढ़ती जायेगी बौद्ध-दर्शन मानव-वृत्तियों के उतना ही अनुकूल और सामयिक होता जायेगा।
                                                        -शालिनी

9 comments:

  1. बौद्ध दर्शन पर सुचिंतित जानकारी

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  2. बहुत ही अच्छी जानकारी मिली आपके आलेख से।


    सादर

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  3. bahut accha likha hai aapne saarthak aalekh....best wishes

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  4. बहुत सुन्दर और चिन्तनीय आलेख
    आपकी इस अनमोल प्रविष्टि को जागरण जंक्शन ब्लॉग पर लिंक किया जा रहा है। सूचनार्थ

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  5. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    घूम-घूमकर देखिए, अपना चर्चा मंच
    लिंक आपका है यहीं, कोई नहीं प्रपंच।।
    --
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार के चर्चा मंच पर लगाई गई है!

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  6. चिंतन शील " अप्प डिपो भव" समृद्ध भाव विवेक प्रवीण आलेख बहुत -२ मुबारक जी /

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  7. अप्प दीपो भव, गहन चिंतन कर सरलता से समझाया है.आपके चिंतन को नमन.

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  8. सुन्दर और सार्थक रचना , बधाई ,
    सादर

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