Tuesday 28 February 2012

कोऊ काहू में मगन है

माया के अपार मोहजाल में भुलान कोऊ ,
कोऊ राम नाम में लगाय रह्यो मन है ।
कामिनी कमान-नैन बीन्धि गयो काहू उर ,
कोऊ भाव-भगति भुलाय दियो तन है ।
कोऊ दोऊ हाथन सों बांटि रह्यो भुक्ति-मुक्ति,
कोऊ दोऊ हाथन बटोरि रह्यो धन है ।
साधो ! ऐसा जग है बेढंगा बहुरंगा कोऊ-
काहू में मगन कोऊ काहू में मगन है । 

6 comments:

  1. कोऊ काहू में मगन है वाह! बहुत ख़ूब

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  2. जाल में जवाल में, भेड़िये भी खाल में ।

    जाल-साज साज के, फांस लेते जाल में ।।


    दिनेश की टिप्पणी - आपका लिंक

    http://dineshkidillagi.blogspot.in

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  3. साधो ! ऐसा जग है बेढंगा बहुरंगा कोऊ-
    काहू में मगन कोऊ काहू में मगन है ।
    दुनिया रंग रंगीली बाबा ,दुनिया रंग रंगीली .....

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  4. पसंद अपनी अपनी,ख्याल अपना अपना,....
    बहुत बढ़िया प्रसंसनीय प्रस्तुति,सुंदर रचना के लिए बधाई .

    NEW POST काव्यान्जलि ...: चिंगारी...

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  5. सब अपने-अपने में मगन है यही जीवन का सच है।

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