Sunday 11 March 2012

कलयुग की है मार


बुराई  रही जीत है , अच्छाई की हार | 
सब पासे उलटे पड़े , कलयुग की है मार ||
कलयुग की है मार, राम पे रावण भारी |
हार रहा है धर्म , जीतती दुनियादारी ||
काम बुरे सब छोड़ , सीखना तुम अच्छाई |
कहे विर्क कविराय , जगत से मिटे बुराई ||

* * * * *

13 comments:

  1. सार्थक प्रस्तुति |
    बधाई भाई ||

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  2. सार्थक सीख देती रचना,वाह!!!बहुत खूब दिलबाग जी,..

    MY RESENT POST ...काव्यान्जलि ...:बसंती रंग छा गया,...

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  3. वाह सुन्दर ...
    अच्छी बात !!

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  4. गाफिल जी हैं व्यस्त, चलो चलें चर्चा करें,
    शुरू रात की गश्त, हस्त लगें शम-दस्यु कुछ ।

    आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति
    सोमवारीय चर्चा-मंच पर है |

    charchamanch.blogspot.com

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  5. राम पर रावण भारी ...
    धर्म पर भारी दुनियादारी ...
    हो तो यही रहा है , मगर सूरत बदलनी चाहिए ...
    सार्थक सन्देश !

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  6. सुन्दर कुंडलिया विर्क जी...
    सादर बधाई.

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  7. woh samay kabhi to aayega......

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  8. सब उलटा-पुल्टा हो रहा है!...चुनाव के मैदान में अगर सभी रावण की उतरेंगे..तो कोइ न कोई रावण ही जीतेगा....राम तो हार ने के लिए भी मैदान में नहीं है!...बहुत सुन्दर प्रस्तुति!

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  9. sahi kah rahi hai ap.....sab kuchh ulta pulta....achchhi rachana

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  10. लाजवाब ... कमाल का लिखा है आपने ... सत्य कडुवा सत्य ... यही तो कलयुग है ...

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  11. सुंदर भाव संयोजन के साथ सार्थक रचना...

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  12. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि-
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (30-06-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ...!

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