Thursday 15 March 2012

पर क्यूँ रही बरस, जरा बरसाओ ममता-


क्षमता से बढ़कर खटे, बरगद सा तृण-मूल ।
सदा हितैषी आम की, पर देती नित हूल ।

पर देती नित हूल, भूल जाती है खुदको ।
टाटा नहीं क़ुबूल, रूल दुश्मन था, फुदको ।

  पर क्यूँ रही बरस, जरा बरसाओ ममता ।
बत्तीस रूपये पाय, बढ़ी पब्लिक की क्षमता ।।

13 comments:

  1. वाह....बहुत खूब दिनकर जी,...बधाई,...

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    1. क्षमा करे,.. रविकर जी स्थान पर भूल् बस दिनकर जी लिख गया,....

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  2. भाई रविकर जी आपने अति सामयिक बात कही! आजकल हम थोड़ा ज़्यादा व्यस्त हो गये हैं तथा देख रहे हैं कि बेसुरम् के लेखकगण भी कुछ अधिक सिथिल से हो गये हैं आप इस कमी को पूरा कर रहे हैं बहुत-बहुत आभार

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  3. 'नाटक' की है पूरी क्षमता, जैसे बरसी अब ये 'ममता'.

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  4. आप आयें --
    मेहनत सफल |

    शुक्रवारीय चर्चा मंच
    charchamanch.blogspot.com

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  5. बेहतरीन रचना .... बधाईयाँ जी /

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  6. पर क्यूँ रही बरस, जरा बरसाओ ममता ।
    बत्तीस रूपये पाय, बढ़ी पब्लिक की क्षमता ।।
    लोक तांत्रिक दर्द की सहज अभिव्यक्ति .

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