Tuesday 20 March 2012

हा हा हा...रेलमंत्री पर ही चढ़ गई रेल !


एक कहानी याद आ रही है, जब लोग बेवकूफी करते हैं तो ये कहानी उन्हें सुनाई जाती है। उन्हें बताया जाता है कि एक पहलवान था, बहुत ताकत थी उसमें, इसलिए उसे अपनी ताकत पर गुमान हो गया, एक दिन वो लोगों के बहकावे में आकर शेर से लड़ गया और शेर उसे मार कर खा गया। तब से कहा जाने लगा कि ताकत ही सबकुछ नहीं है दिमाग भी होना चाहिए, जिससे ताकत का सही इस्तेमाल हो सके।
     आइये अब चर्चा करते हैं इतिहास बन चुके पूर्व रेलमंत्री दिनेश त्रिवेदी की। त्रिवेदी जी अच्छी तरह जानते थे कि ममता बनर्जी सब कुछ बर्दाश्त कर सकती हैं,पर ट्रेन का किराया बढ़े वो इस बात कत्तई बर्दाश्त नहीं कर सकतीं। वैसे भी जब दो रुपये पेट्रोल या डीजल की कीमत बढ़ती है तो वो केंद्र की सरकार से समर्थन वापस लेने पर आमादा हो जाती हैं, ऐसे में भला ट्रेन का किराया बढ़ाना वो कैसे बर्दाश्त कर सकतीं थीं। सच तो ये है कि त्रिवेदी को ये बात पता थी कि रेल बजट के बाद हंगामा होना तय है। पर उन्हें लग रहा था कि कांग्रेसी उनका साथ देगें और वो ऐसे वीर रेलमंत्री कहे जाएंगे जिसने वो काम कर दिखाया, जिसकी हिम्मत लालू यादव और ममता बनर्जी नहीं कर सकीं। यानि दोनों किराया बढ़ाने की हिम्मत नहीं जुटा सके। पर ये क्या किराया बढ़ाने का प्रस्ताव रेल बजट में सुनते ही सबसे पहले विरोध शुरू किया उन्हीं की पार्टी टीएमसी ने। दरअसल सच ये है कि इस पूरे एपीसोड की स्क्रिप्ट सप्ताह भर पहले लिखी जा चुकी थी, मुझे रेलवे के ही एक वरिष्ठ अफसर ने ये बात बताई भी थी और इसकी चर्चा मैने अपने एडीटर से बजट पेश होने के पहले की भी। पर ये नेता हैं, इनकी बातों का कोई भरोसा नहीं करना चाहिए, ऐन वक्त पर पलट जाते हैं। लिहाजा मैने इंतजार किया बजट पेश होने का। बजट पेश हुआ और सभी घटनाक्रम ठीक उसी तरह हो रहे थे, जैसा मुझे बताया गया था। हां थोड़ा सा बदलाव ये था कि मुझे बताया गया था कि मंत्री डरपोक है, ममता जी फटकार के बाद तुरंत किराया वापस करने को तैयार हो जाएगा। लेकिन ममता ने बढ़े हुए किराए को कम करने की बात दूसरे नंबर रखी, पहला तो ये था कि वो श्री त्रिवेदी की शक्ल मंत्री रहते नहीं देखना चाहतीं। अब त्रिवेदी की समझ में ही नहीं आ रहा था कि वो करे तो क्या करें। क्या बोल रहे हैं, वो शायद खुद भी नहीं समझ रहे थे कि क्या कह रहे हैं। कहने लगे कि उनके लिए पार्टी बाद में है देश पहले। त्रिवेदी जी 24 घंटे बाद ही देश कहां चला गया, पार्टी क्यों पहले हो गई। यार देश का नाम रोशन ना करो तो गिराओ भी नहीं। कह रहे थे ममता इस्तीफा मांगेगी क्यों, इशारा भी कर दें तो इस्तीफा दे दूंगा, लेकिन जब पार्टी ने कहा इस्तीफा दो तो ममता से लिखित मांगने लगे। कह रहे थे कि जो बजट उन्होंने संसद में पेश किया है, उसे लावारिश नहीं छोडूंगा,  भाई फिर क्यों त्यागपत्र दे दिया, बर्खास्त होने का इंतजार करते।
     राजनीति में दिक्कत ही ये है कि लोग मंत्री बनते ही हवा में उड़ने लगते हैं, असलियत भूल  जाते हैं कि आखिर वो क्या हैं और कोई भी लड़ाई कहां तक लड़ सकते हैं। बहरहाल कुछ ऐसे मंत्री होते हैं, जो " ही " में ना " सी " में फिर भी पांचो ऊंगली घी में होती है। त्रिवेदी भी उन्हीं में से एक हैं, क्योंकि ये ममता के सामने कोई तर्क दे ही नहीं पाएंगे, कांपने जरूर लगेंगे। बहरहाल नासमझ मंत्री होता है तो अफसरों के मजे होते हैं, पूरे साल रेल अफसरों ने खूब मजे लिेए। मंगलवाल को बदलाव के बाद भले ही मुकुल राय रेलमंत्री बन जाएं, पर यहां उनका सामना ऐसे अफसरों से होगा, जितनी मुकुल राय की उम्र है, उतनी वो नौकरी कर चुके होंगे। खैर..
    चलिए चलते-चलाते एक आंकडे़ की जानकारी आपको दे दूं। ममता बनर्जी कह रही हैं कि जनरल क्लास और स्लीपर क्लास का बढ़ा किराया वापस होना चाहिए। दोस्तों जो किराया बढ़़ाया गया है, उससे रेलवे को सालाना छह हजार करोड़ रुपये की आमदनी होगी। रेलवे में रोजाना कुल दो करोड़ 20 लाख यात्री सफर करते हैं, इसमें महज आठ फीसदी लोग ही अपर क्लास यानि एसी फर्स्ट, एसी टू और एसी थ्री के होते हैं। अगर जनरल और स्लीपर क्लास के यात्रियों से बढ़ा किराया वापस ले लिया गया तो चार हजार पांच सौ करोड़ रुपये की आमदनी बंद हो जाएगी, रह जाएगा 1500 करोड़ रुपये तो अपर क्लास पर सर्विस टैक्स का प्रावीजन आम बजट में किया गया है। अभी ये साफ नहीं है कि सर्विस टैक्स यात्रियों को देना होगा या फिर रेल मंत्रालय देगा। अगर रेल मंत्रालय को देना पड़ा तो छह सौ करोड़ रुपये और निकल जाएंगे, बचेगा सिर्फ 900 करोड़ रुपये और नौ सौ करोड़ रेलवे की नजर में कुछ नहीं होता।
     बहरहाल पूर्व रेलमंत्री दिनेश त्रिवेदी मुंगेरी लाल के हसीन सपने देखने के चक्कर में अपनी कुर्सी भी गवां बैठे और रेलवे का भी बंटाधार कर दिया। वो साल भर रेलमंत्री रहे हैं, कुछ कुछ चीजें उन्हें समझ में आ रहीं थीं, अब फिर कोई नया आदमी साल भर समझेगा, खैर रेलवे का भगवान मालिक है।

7 comments:

  1. हैं ही ना शी में भले, मंत्री कुछ हीनांग ।

    ताली दे दे घी पियें, करते हर दिन स्वांग ।

    करते हर दिन स्वांग, दोष ममता को लागे ।

    तन मन से बीमार, करे क्यूँ बच्चा आगे ?

    मारे मोहन भीष्म, लगा दर्शन का रेला ।

    ठेला रेलमपेल, शुरू फिर हुआ झमेला ।।

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  2. रची उत्कृष्ट |

    चर्चा मंच की दृष्ट --

    पलटो पृष्ट ||


    बुधवारीय चर्चामंच

    charchamanch.blogspot.com

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  3. हमारी राजनीति - स्वहित सर्वोपरि , अब यही सिस्टम बनने जा रहा है -
    सही कहा आपने... बधाई...

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  4. यह तो वक्त बताएगा किसका क्या जेंडर था ,है और रहेगा .आगे आगे देखिये , होता है क्या ,इब्तिदाए इश्क है ,रोता है क्या ?

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  5. सार्थक प्रस्तुति....

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