Friday, 30 March, 2012

बेचारा मत्ला!!!

समस्या पूर्ति-


वक़्त है लिक्खूँ मगर लिक्खूँ भी क्या?
वक़्ते-गर्दिश के जुनूँ का ख़ामिजा??

इसके बाद गुजारिश है कि यह मत्ला आप दानिशमंदों की कारस्तानी से मुक़म्मिल ग़ज़ल की शक्ल इख़्तियार करे। इस नेक और ज़रूरी काम को, इस पोस्ट पर टिप्पणी के माध्यम से अंजाम तक पहुँचाने के लिए आप सादर आमन्त्रित हैं! आपके पेश किए हुए चुनिन्दा अश्आरों से ही एक बेहतरीन ग़ज़ल मुक़म्मिल हो इसी तमन्ना के साथ आपका
                                                   -ग़ाफ़िल
कमेंट बाई फ़ेसबुक आई.डी.

15 comments:

  1. वक़्त है लिक्खूँ मगर लिक्खूँ भी क्या?
    वक़्ते-गर्दिश के जुनूँ का ख़ामिजा?



    हो गई जब देर वक्त पर पहुंची नहीं ।

    आशिक अपनी जान से तब था खिजा ।


    सर रखे थे गोद में अपने हुजूर ।

    मस्त बहके खिल गई बहकी फिजा ।


    सैकड़ों घोड़े बिकते थे काबुली

    पसंद उनको आ गया इक किरमिजा ।



    आज कल रहने लगे हैं वे खफा

    ठुकरा रहे हैं मार लातें इल्तिजा ।

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    1. वाह भाई रविकर जी! हर दौड़ में प्रथम...शुक्रिया

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    2. बम फटे दो सुबह ही इस पार्क में,

      माहौल सारा है अभी तक गिजगिजा ।

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  2. matla bahut unche darje ka hai aur ravikar ji ka jod bhi bejod hai....vaah

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  3. बड़ा जटिल काम दे दिया सर....
    अपने बस के बाहर का है....
    :-)
    सादर
    अनु

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  4. काश हमें भी पता होता काफिया क्या है और क्या है रदीफ़ ,

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  5. बहुत बढ़िया प्रस्तुति!
    घूम-घूमकर देखिए, अपना चर्चा मंच
    लिंक आपका है यहीं, कोई नहीं प्रपंच।।
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  6. वाह ! ! ! ! ! बहुत खूब गाफिल साहब,
    सुंदर मत्ला,कोशिश कर रहा हूँ इसके आगे लिखने की,.....

    MY RECENT POST...काव्यान्जलि ...: तुम्हारा चेहरा,

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  7. वाह ! बहुत खूब गाफिल साहब,

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  8. kya baat hai ghafil sir aur ravikar jee kee...sone jaise sher suhage jaisi ghazal..sadar badhayee ke sath

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  9. अब आप ही संयोजन कर इन मोतियों की एक ग़ज़ल माला बनादें .,बस यही है इल्तिज़ा.

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  10. वक़्त है लिक्खूँ मगर लिक्खूँ भी क्या?
    वक़्ते-गर्दिश के जुनूँ का ख़ामिजा?

    ...वह, वाह!...क्या खूब कहा है!

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  11. thodi der se pahunchi ... warna koshish zaroor karti .. :)

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  12. sir aapke matle ka ek hi jawaab ban paaya mujhse..ghazal poori karne ki koshish jaari rakkhe hun... tab tak ek sher padhiye meri taraf se..

    एक तो मुश्किल है ख़ुद में ही ख़याल,
    उसपे बैठाना रदीफ़-ओ-क़ाफ़िया..

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  13. 2 ashaar aur ban paaye hain sir..

    आपसे कोई भी तो शिक़वा नहीं,
    जो ख़ता है, वो हमारी है ख़ता..

    हैं ग़ज़ल के जो नियम जो कायदे,
    मेहनतों के बाद देते हैं मज़ा..

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