Monday 2 April 2012

उल्लू गधा कहो या रविकर

विद्वानों से डर लगता है , उनकी बात समझना मुश्किल ।
आशु-कवि कह देते पहले, भटकाते फिर पंडित बे-दिल ।

 अच्छा है सतसंग मूर्ख का, बन्दर तो नकुना ही काटे -
नहीं चढ़ाता चने झाड पर, हंसकर बोझिल पल भी बांटे ।

सदा जरुरत पर सुनता है, उल्लू गधा कहो या रविकर  
मीन-मेख न कभी निकाले, आज्ञा-पालन को वह तत्पर ।

प्रकृति-प्रदत्त सभी औषधि में, हँसना सबसे बड़ी दवाई ।
अपने पर हँसना जो सीखे, रविकर देता उसे बधाई ।।

7 comments:

  1. बहुत बढ़िया रचना,क्या बात है रविकर जी,...
    सुंदर अभिव्यक्ति,बेहतरीन पोस्ट,....

    MY RECENT POST...काव्यान्जलि ...: मै तेरा घर बसाने आई हूँ...

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  2. उल्लू, गधा और रविकर का मेल कैसा भैये? हम बहुत देर से यही सोच रहे हैं

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  3. बहुत अच्छा है

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  4. एक और अच्छी प्रस्तुति |
    ध्यान दिलाती पोस्ट |
    सुन्दर प्रस्तुति...बधाई
    दिनेश पारीक
    मेरी एक नई मेरा बचपन
    http://vangaydinesh.blogspot.in/
    http://dineshpareek19.blogspot.in/

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  5. "भटकाते फिर पंडित -बेदिल" क्या बात है..वाह !.

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  6. विद्वानों से डर लगता है , उनकी बात समझना मुश्किल ।
    आशु-कवि कह देते पहले, भटकाते फिर पंडित बे-दिल ।

    किस विद्वान से आहत है कविराज?

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