Friday 6 April 2012

पता नहीं क्यों?

आजकल पता नहीं क्यों लिखने से
मन कतराता है...घबराता है
फिर उलझ-उलझ कर रह जाता है
समझ नहीं आता कि
क्या लिखूँ!
कहां से शुरू करूँ और कहां ख़त्म...
इसलिए आज इस लिंक से ही काम चला लीजिए-
                       'घर का न घाट का' 

7 comments:

  1. fir bhee bahut kuchh kah diyaa,saadar

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  2. तो अब हम सब खेलते हैं यह खेल

    केवल दो पंक्तियाँ ही लिखनी है अगले पाठक को --



    अब इश्क से कतराता है मन ।

    जाने क्यूँ घबराता है मन ।



    ------करिए पूरा ---

    बे-वजह गम खाता है मन ।



    --------दीजिये लाइन ------

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    Replies
    1. समझे न इशारे आँखें -
      बेवजह गम खाता है मन

      चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’Apr 6, 2012 02:25 AM

      हुस्न से लबरेज है
      फिर भी न इतराता है मन।

      रविकर फैजाबादीApr 5, 2012 10:18 PM

      अब इश्क से कतराता है मन ।
      जाने क्यूँ घबराता है मन ।

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    2. हुस्न से लबरेज है
      फिर भी न इतराता है मन।

      सुन ही लेता है ख़ुदी,
      और अपनी ही गाता है मन।

      एक हंगामा बरपता,
      जब कहीं जाता है मन।

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    3. इक झलक जो पाता
      ललक हरसाता है मन |

      ओट में वो क्या गईं --
      विवश मुरझाता है मन ||
      On Fri, Apr 6, 2012 at 11:38 AM, चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ wrote:
      चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ has left a new comment on your post "पता नहीं क्यों?":

      हुस्न से लबरेज है
      फिर भी न इतराता है मन।

      सुन ही लेता है ख़ुदी,
      और अपनी ही गाता है मन।

      Delete
  3. कल 07/04/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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