Sunday 8 April 2012

मेरा देश

देश मेरे में
अजूबे ही अजूबे
करें नमन
लोग पैर छूकर ।
               धरती यहाँ 
               कहलाती माता
               गुरु का दर्जा
               ईश्वर से ऊपर ।
मान देवता 
हो पूजा प्रकृति की
कर्म जीवन  
फल देता ईश्वर ।
               चाहें दिल से
               करें रिश्तों की कद्र
               छोटों से प्यार
               दें बड़ों को आदर ।
नहीं बनाते 
पत्थर के मकान
लोग यहाँ पे
बनाते सदा घर ।
               न डरें कभी 
               न कभी घबराएं 
               आफत से भी
               मिलें मुस्कराकर ।
लगते मेले
ख़ुशी में नाचें लोग
भांति-भांति के
त्यौहार यहाँ पर ।
               दुःख बटाएँ
               अक्सर दूसरों का
               रहते लोग
               मदद को आतुर ।
क्या बताऊं मैं
विशेषता इसकी
नहीं समाती
कागज के ऊपर ।
                रंग अनेक
                भाषाएँ भी अनेक
                फिर भी एक
                हैरां है विश्व भर
                इसको देखकर ।


                         --------- दिलबाग विर्क 


           ***********************   
जापानी विधा -------- चोका 
वर्ण कर्म ------ 5+7+5+7----------- +7  
           ************************  

15 comments:

  1. जय जय हिदुस्तान ।

    मेरा देश महान ।

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  2. जहाँ डाल-डाल पर सोने की चिड़िया करतीं हैं बसेरा........वो भारत देश है मेरा...........

    सुंदर रचना..

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  3. हमारी टिप्पणी स्पाम में गयी शायद!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

    सर रचना को दाद देने के साथ एक सवाल भी ...............

    तांका का वर्ण क्रम भी यही है ५+७+५+७+७
    फिर इसमें और चोका में कोई फर्क है क्या????

    सादर.

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    Replies
    1. तांका में सिर्फ पाँच पंक्तियाँ होती है , चोका में 5+7+5+7+5+7 के हिसाब से कितनी भी पंक्तियाँ हो सकती हैं ,
      आखिर में 7 वर्ण की पंक्ति लगाकर इसे समाप्त किया जाता है

      Delete
  4. सार्थक पोस्ट, सादर.
    कृपया मेरे ब्लॉग"meri kavitayen" की नयी पोस्ट पर भी पधारें.

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  5. सार्थक सुन्दर पोस्ट, ...

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  6. रंग अनेक
    भाषाएँ भी अनेक
    फिर भी एक
    हैरां है विश्व भर
    इसको देखकर
    वाह!!!!!!बहुत सुंदर रचना,अच्छी प्रस्तुति........

    MY RECENT POST...काव्यान्जलि ...: यदि मै तुमसे कहूँ.....

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  7. बहुत ही बेहतरीन और प्रशंसनीय प्रस्तुति....


    इंडिया दर्पण
    की ओर से शुभकामनाएँ।

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  8. मास्टर जी ! इसी विविधता के संवरण में अक्षय घोड़ों को सारथी की तलाश है ...शिक्षकनाम सदैव.... ....मोक्षकारणं ..../

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  9. भाई मुझे तांका या चोका की एकदम समझ नहीं है पर आपकी रचना है बहुत सुन्दर भावभीनी
    आपकी यह ख़ूबसूरत प्रविष्टि कल दिनांक 09-04-2012 को सोमवारीय चर्चामंच पर लिंक की जा रही है। सादर सूचनार्थ

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  10. सुन्दर एवं सराहनीय रचना....

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  11. सुंदर है!!!!
    ़़़़
    वाकई क्या
    गुरू का दर्जा
    अभी भी
    ईश्वर से ऊपर
    ही बना हुवा है?

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  12. देश तो महान है ... पर रहने वालों को क्या हित जा रहा है समझ से बाहर है ...

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