Saturday 28 April 2012

झारखण्ड की दुर्दशा, बढ़े साल दर साल-

 (१)
खनिज सम्पदा लूट के,  होते मालामाल ।
झारखण्ड की दुर्दशा,  बढ़े साल दर साल ।

बढ़े साल दर साल, स्वार्थी अफसर नेता ।
नक्सल पुलिस दलाल, आम-जनता को रेता ।

हुई व्यवस्था ध्वस्त, सहे जनता दुःख-विपदा ।
बर-बंडी सब मस्त,  लूटते  खनिज संपदा ।।
(२)
परिजन को बरगला के, तस्कर दुष्ट दलाल ।
महानगर में बेंच दें, लाखों बाला-बाल ।

लाखों बाला-बाल,  सड़ें बंगले में जाकर ।
करते सारे काम,  पेट भर झापड़ खाकर ।

पप्पी से कर द्वेष, जलाये पप्पू मन को ।
सहता रहे कलेश,  कोस के घर परिजन को ।।
 
(३)
महानगर में खट रहे, लाखों औरत मर्द ।
तारकोल सीमेंट से, लिखते जाते दर्द । 

लिखते जाते दर्द, व्यथा बढती ही जाए ।
सरपट दौड़े सड़क, नगर पुल भवन बनाए । 

किन्तु श्रमिक परिवार, भटकता रहा डगर में ।
शिक्षा-स्वास्थ्य बगैर, गुजरता महानगर में ।।

4 comments:

  1. आपकी कविता पढ़कर याद आया की"मैं मजदूर मुझे देवों की बस्ती से क्या"| शानदार ,बधाई|

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  2. सार्थक प्रविष्टि आपका बहुत-बहुत आभार

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  3. वाह...बहुत सुन्दर, सार्थक और सटीक!
    आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  4. बहुत से संकटों से घिरा है समाज...

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