Friday 4 May 2012

तीन-पांच पैंतीस, रात छत्तिस हो जाती

पाठ पढ़ाती पत्नियाँ, घरी घरी हर जाम   |
बीबी हो गर शिक्षिका,  घर कक्षा  इक्जाम | 
 
घर कक्षा इक्जाम, दृष्टि पैनी वो राखे |
गर्दन करदे जाम, जाम रविकर कस चाखे  |

तीन-पांच पैंतीस, रात *छत्तिस हो जाती |
पति तेरह ना तीन, शिक्षिका पाठ पढ़ाती ||

*३६

9 comments:

  1. पाठ पढ़ाती पत्नियाँ, घरी घरी हर जाम |
    बीबी हो गर शिक्षिका, घर कक्षा इक्जाम |

    वाह....क्या बात है,..रविकर जी

    ReplyDelete
  2. अच्छा लिखा है ..

    ReplyDelete
  3. बहुत बढ़िया प्रस्तुति!
    आपकी प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार के चर्चा मंच पर लगाई गई है!
    चर्चा मंच सजा दिया, देख लीजिए आप।
    टिप्पणियों से किसी को, देना मत सन्ताप।।
    मित्रभाव से सभी को, देना सही सुझाव।
    उद्गारों के साथ में, अंकित करना भाव।।

    ReplyDelete
  4. बड़ी-बड़ी दुश्वारियां हैं ज़िन्दगी में...ख़ुदा करे कि ख़ुशगवारियां भी मुहाल हों...आमीन

    ReplyDelete
  5. बहुत बेहतरीन रचना....
    मेरे ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है।

    ReplyDelete

लिखिए अपनी भाषा में

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...