Monday 14 May 2012


वेदना   का घर     हूँ    मैं |
वज्र से   बढ़कर    हूँ   मैं |
ठोकरें खाना नियति में ,
राह का पत्थर    हूँ    मैं |

9 comments:

  1. बढियां भाव |
    शुभकामनायें ||

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  2. राह का पत्थर भी कभी कभी भगवान बन जाता है....

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    Replies
    1. भाई साहब बहुत बढ़िया रचना है गागर में सागर भर दिया है .सटीक .
      आज ही आपको याद किया और दीदार भी हो गया आपकी रचना से .बहुत खूब लिखा है .

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    2. भाई साहब बहुत बढ़िया रचना है गागर में सागर भर दिया है .सटीक .
      आज ही आपको याद किया और दीदार भी हो गया आपकी रचना से .बहुत खूब लिखा है .

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  3. सुंदर प्रस्तुति...बहुत बहुत बधाई...

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  4. शुक्रिया हर बार आपका ,
    शुक्रिया मोहताज़ आपका .
    परिवार दिवस की शुभकामनाएं गाफ़िल साहब सुरेन्द्र झंझट जी .

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  5. ठोकर तो मील का पत्थर भी खाता है कभी कभी ... पर जीवन है ...
    अच्छा लिखा है ...

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