Thursday 24 May 2012

ज़रा सोचिए!

ज़रा सोचिए!
     एक जमाना था कि स्वस्थ मनोरंजन के लिए सर्वाधिक पसन्द किये जाने वाले स्थान के रूप में पुस्तकालयों का प्रथम स्थान था। पढ़ा-लिखा तबका अपना ज्यादातर समय पुस्तकालयों में ही गुज़ारता था। पुस्तकालयों से न केवल उसकी ज्ञान पिपशा शान्त होती थी अपितु समाज से सम्बन्धित समस्त सरोकारों की जानकारी पुस्तकालयों से ही प्राप्त होती थी। आज देखें तो हम अपेक्षाकृत अहुत विकसित हो चुके हैं हमारे पास इलेक्ट्रानिक मीडिया है जिसके द्वारा हम संसार भर की जानकारी पलक झपकते प्राप्त कर सकते हैं ई पुस्तकें उपलब्ध हैं जब चाहें तब पढ़ सकते हैं और वह हमारे स्टडी रूम तक आसानी से इलेक्ट्रनिक मीडिया द्वारा पहुंच सकती हैं। साथ ही अन्तर्जाल, दूरदर्शन आदि के द्वारा हम अपने कमरे में ही बैठकर सबकुछ जान समझ सकते हैं। पर सोचने वाली बात तो यह है कि हमारी इस तरह की सोच हमारी मानसिकता को कितना स्वस्थ रख पा रही है। साधन तो यद्यपि उपलब्ध हैं पर उनका स्वस्थ तरीक़े से उपयोग क्या हम कर पा रहे हैं क्या यह सब इलेक्ट्रानिक साधन हमारा संस्कार कर पा रहे हैं। शायद नहीं। हमारा संस्कार कर सकती हैं तो केवल पुस्तकें और हम पुस्तकों से कटते जा रहे हैं, यह सही है किन्तु यही कारण है कि हम अधिक उच्छृंखल होते जा रहे हैं। हम अपनी अस्मिता खोते जा रहे हैं। हमें पुनः पुस्तकों से जुड़ना होगा क्योंकि वही हमारा संस्कार कर सकती हैं यह इलेक्ट्रानिक मीडिया हमें जानकारी तो उपलब्ध करा सकता है पर अव्यवस्थित असंस्कारित। यह उसकी भी जानकारी कराता चलता है जो हमें नहीं जानना चाहिए। पुस्तकों के प्रति हमारी रुचि तभी बढ़ेगी जब पुस्तकालयों का विकास एक आन्दोलन के रूप में किया जाय। यह कार्य सरकारी सहयोग से आसानी से हो सकता है पर सरकार अब इसके प्रति उदासीन ही दिख रही है। यद्यपि तमाम योजनाएं सरकार द्वारा चलाई गयीं इस बावत पर फिर सरकारी बस्ते में चली गयीं। आप सब से यह महत्वपूर्ण सवाल है कि पुस्तकालयों के विकास के प्रति सरकार की उदासीनता कहां तक उचित है और क्या हमारा दायित्व नहीं बनता कि समाप्त होते जा रहे पुस्तकालयों के अस्तित्व के प्रति हम ख़ुद सचेत हों तथा आन्दोलन चलाकर जन-जागरण करें और सरकार तथा अन्य सामाजिक और आर्थिक संगठनों को पुस्तकालयों के विकास के प्रति उत्साहित करें? जिससे हमारा समाज पुनः शिद्दत से एक ऐसी संस्था से जुड़ सके जहां हमें ज्ञान के अलावा संस्कार भी मिलता हो। 
     आप सब सोच रहे होंगे कि पुस्तकालय से सम्बन्धित होने के नाते हम यह सब कुछ हांक रहे हैं पर ऐसा नहीं है यह आज के समाज की वास्तविक आवश्यकता है जिसे वह स्वयं नहीं समझ पा रहा।


इस आलेख पर फ़ेसबुक पर आई टिप्पणियों को भी आप पढ़ें जिससे इस विमर्श को और बल मिला&


  • Alka GuptaKunwar Anirudh Pratap SinghSneha Pandey और 6 अन्य को यह पसंद है.
    • Shailendra Pratap Singh 
      Chandra Bhushan Mishra Ghafil, chhatr jeevan mein meri do ichhayen thi ki bharat ka khoob bhraman karoon aur meri ek samriddh library ho. pahli ichchha apni aajeevika ke chakkar mein poori ho rahi hai aur doosri isi ke karan poori nahin hopa rahi hai. din bhar ke bad ghar pahunchane par yadi kabhi kitab kholi to patni ne kaha ki ab kitab lekar baith gaye, mere liye bhi kuchhsamay hai ya nahin to main agyakari pati turant kitab band kar deta hoon. Ghafil aap jaisi khushnasibi kahan ki kitabon ke beech poora samay guzar sakoon.
    • Chandra Bhushan Mishra Ghafil यह तो सही है शैलेन्द्र सर पर पुस्मकालय और पुस्तकें हमारे लिए आज कितनी आवश्यक हो गई हैं जब इलेक्ट्रानिक मीडिया के चलते हम अंधाधुंध दौड़ में भागे जा रहे हैं जाने कहां? हमारा पथप्रदर्शक पुस्तकें और पुस्तकालय ही हो सकते हैं आपका क्या विचार है इस बारे में
    • Sumant Bhattacharya 
      ग़ाफ़िल साहब, मेरी नज़र में पुस्तकालयों का दर्जा बहुत ऊपर है। ये वो जगह है जो गैरसियासी और गैर मजहबी है। किताबें आपको बाध्य नहीं करती हैं कि आप उन्हें उठाएं..काले हर्फों पर नजरें फेरें और फिर शब्दों से बनती तस्वीरों को अपने दिल और दिमाग में महसूस करें। और जब थक जाएं तो हौले से किताबों में बसी खुशबू को अपने नुथनों से दिल की गहराई तक उतार ले जाएं। बस इकतरफा इश्क होता था और आज भी है जब हम किताबों से अपना रिश्ता महसूस करते हैं। लेकिन क्या वजह है कि आज सूचनाओं के रेलपेल के दौर में भी हम खुद को खाली महसूस करते हैं, और एक वक्त वो था जब एक किताब से अघा जाते थे, खुद को भरा हुआ महसूस करते थे।..क्या किताबों ने अपना असर खो दिया है या फिर किताबों में बसी खुशबू को बटोर कर साथियों के साथ बहसियाने का वक्त और मौका दोनों ही गंवाते जा रहे हैं हम सब। क्या ख्याल है आपका शैलेंद्र सर..ग़ाफ़िल साहब
    • Chandra Bhushan Mishra Ghafil 
      सुमन्त सर किताबों ने अपना असर नहीं खोया है और न ही उनकी अहमियत कम हुई है बात समझने की है। हम इस दौर से गुजर रहे हैं हक शार्टकॅट तहज़ीब ही समझ सकते हैं और यही संस्कार यह जमाना हमारे बच्चों में भी कूट कूट कर भर रहा है। संक्रमण के इस दौर में हमअपनी दिशा ही नहीं निर्धारित कर पा रहे हैं। पुस्तकें दिशा दे सकती हैं पर उन्हें पढ़ने का वक्त किसके पास है। हम तो टीवी से ही काम चला रहे हैं और समझ रहे हैं कि सब कुछ जान गये। इस अधकचरे उच्दृंखल ज्ञान में पूर्णता का दम्भ हमारे मार्ग को अवरुद्ध ही कर रहा है न कि सुगम बना रहा है
    • Chandra Bhushan Mishra Ghafil शैलेन्द्र सर आप कुछ कहें
    • Sumant Bhattacharya ग़ाफ़िल भाई..आज भी दूर दराज इलाकों में किताबों की क्या अहमियत है. ये मैं अच्छी तरह से महसूस करता हूं. जब लल्ला की चौकड़ी पूरी तरह से जम जाएगी तो हम किताबों के दान की एक परंपरा शुरू कराएंगे। मेरी साजिश को समझ रहे हैं शैलेंद्र सर..गाफिल भाई
    • Chandra Bhushan Mishra Ghafil सुमन्त सर पहले पुस्तकों की महत्ता सिद्ध हो जाय यहां फिर मुद्दा तो यह है कि प्रत्योक छोटे बड़े शहरों कम से कम इस चौराहे पर एक सार्वजनिक पुस्तकालय हो इस हेतु हम कितना मानसिक समर्थन जुटा सकते हैं!!
    • Sumant Bhattacharya 
      Chandra Bhushan Mishra Ghafil साहब मेरा मानना है कि सारी दुनिया में सरकारें साजिशन पब्लिक स्पेस को खत्म कर रही हैं..ताकि मुद्दों पर विमर्श ना हो, साझा राय ना बने और जनाक्रोश को कोई दिशा ना मिल जाए। विकास की मौजूदा परिभाषा में शॉपिंग मॉल्स हैं..मल्टीप्लेक्स हैं..लेकिन पुस्तकालय नहीं हैं। इलाहाबाद के आजाद पार्क (एल्फ्रेंड पार्क) के पुस्तकालय का क्या हाल है, मुझे नहीं मालूम। लेकिन दिल्ली में ब्रिटिश काउंसिल की लाइब्रेरी आबाद है। आप बतौर हाकिम - ए - पुस्तकालय अपने अनुभवों को साझा कीजिए ना।
    • Mrittunjai Srivastava सुमंत जी कुछ बाते मुझे इस देश की बड़ी पसंद और उनमे से एक है पुस्तकालय इस देश में हर नगर में एक पुस्तकालय है चाहे वह केवल दो ही नागरिक रहते हो
    • Sumant Bhattacharya किस देश की बात कर रहे है Mrittunjai Srivastava , आप क्या यूएस की बात कर रहे हैं, जहां आप हैं इस वक्त।
    • Sumant Bhattacharya Mrittunjai Srivastava हां बोले तो..सिर्फ हुंकारी भरेंगे आप..कछू बोलेंगे नाही
    • Chandra Bhushan Mishra Ghafil सुमन्त सर दुर्भाग्य यह है कि एक तो भारतीय सरकार के एजेंडे में आधारभूत सुविधाओं के रूप में सार्वजनिक पुस्तकालय स्थापना का प्रश्न दूरदराज़ तक नज़र नहीं आता और कॉलेज तथा विश्वविद्यालयों में मज़बूरन यदि पुस्तकालय सक्रिय भी हैं तो उनकी स्थिति PMC पिया मिलन चौराहे से अधिक नहीं है। वे टीवी सीरियलो की चर्चा से उबर ही नहीं पा रहे हैं आजकल
      बीते कल 09:31 बजे मोबाइल के द्वारा ·  ·  2
    • Sumant Bhattacharya बहुत खूब..और लिखिए..इस मुद्दे पर। इससे मुझे हालात को समझने में आसानी हो रही है। बहुत साफ नजरिया है आपका
      बीते कल 09:32 बजे ·  ·  1
    • Shailendra Pratap Singh Chandra Bhushan Mishra Ghafil, main aapki baat se poorntaya sahmat hoon. kintu aajkal ke fast food culture ki tarah ham sab kisi bhi kary ko jaldi niptana chahte hain. aise mein kitabon ko log samay nahin de pate. maine bhi apni mazboori zahir kar di thi. ab main shekhar ek jeevani jaisi koi aur pustak padhne ka sahas nahin juta pata kyunki kai prathmiktayen isase prabhavit ho jayengi.
      बीते कल 09:59 बजे ·  ·  4
    • Chandra Bhushan Mishra Ghafil 
      शैलेन्द्र सर! मेरा मतलब यह है कि खाली समय में अनावश्यक अभ्वी सीरियल देखने के बजाय यदि पुस्तकें पढ़ने की आदत डज्ञली जाय तो हमारे समय का सदुपयोग भी होगा और हमारा मनोरंजन तथा ज्ञानवर्द्धन भी। आज की संस्कृति में मनोरंजन का अर्थ टीवी ही देखना हेजबकि सभी जानते हैं कि उसमें क्या परोसा जाता है केवल नग्नता और भौड़ा हास्य। आप बताइए आज के टीवी सीरियल क्या हमको क़ाइदे से हंसा पा रहे हैं या $ला पा रहे हैं आथवा हमारी संवेदनाओं को झंकृत कर पा रहे हें हम भी मशीनी होते जा रहे हैं इस उपभोगवादी व्यवस्था के चलते। एक सभ्य मानव समाज के लिए यह कुछ लोगों का कुचक्र कितना घातक है अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। माना कि नये पन में लोगों का आकर्षण ज्यादा होता है। आधुनिक उपकरणो के प्रति हमारी जिज्ञाशा अधिक ही होती है पर इन उपकरणों के माध्यम से जो विषय-वस्तु परोसी जा रही है वह हमारे लिए कितना घातक है इसपर भी विचार करना होगा। इन्हीं उपकरणों के प्रयोग क्षरा हम पुस्तकालयों को आधुनिक बनाकर अच्छी जानकारियां भी उपलब्ध करा सकते हें उपयोक्ताओं को। और उनकी जिज्ञासा भी बढ़ा सकते हैं इसके प्रति। एक संस्कारवान समाज की स्थापनाप अविभावकों का प्रथम कर्त्तव्य होना चाहिए। हब हम सब शायद एक अविभावक हैं...बच्चों के पिता अतः उनका उचित मार्गदर्शन करना हमारा प्रथम दायित्व है। आज के शार्टकट की बात करें तो आजका बच्चा नयी देवदास फ़िल्म देखकरा क्या जान पाये गा कि उस उपन्यास में कितनी संवेदनशीलता और गम्भीरता है...वार्ता को आप आगे बढ़ाएं सर!
    • Yogesh Pratap Singh 
      Haajiri kabool ho.....
      Sir, samay ke sath sab badal gaya. Hum log Champak se padhna shuru huye to Galib chhuti shsraab tak padhte rahe. Mere vigyan visay ke itar thi ye pustakein. Jab Botany se thak jaata tha to Meer...Faij....Ghalib...Shivani.... Premchand sab se rubru hota tha. Aaj saikadan tho tv channel hain... Lekin man ooba sa rehta hai. Padhna to gayab hi hota ja raha hai... Ab to tv ... Mobile haavi ho gaya hai.... Lekin books ka replacement asambhav hai sir...
      Saadar.
      बीते कल 12:52 बजे मोबाइल के द्वारा ·  ·  3
    • Shailendra Pratap Singh 
      Chandra Bhushan Mishra Ghafil, babooji ke bone scan se ab fursat mil gayi hai. maine chaha ki mere bachche pustakon mein ruchi le kintu unki ruchi chetan bhagat aadi ko padhne mein hai. mujhe bhi chetan bhagat ki books pasand hain kintu joanand tarunavastha mein gunahon ka devta, suraj ka satwan ghoda-Late Dr. Bharati, Shekhar ek jeevani, godan, nachyo bahut gupal etc ko padh kar mila wah to chetan bhagat nahin de paye. kintu bahuton ko ye pustaken na ras ayen. pustaken ab bhi padhi jati hain kintu kadachit ab sanskar banane wali pustakon ki sankhya mein kuchh kami aa gayi hai. samaj jise upyogi samajhata hai use angikar karta hai. bachchon ki duniyan apne upyog ki vastuon me magan hai. aur bachche behtar soch wale hain ise sweekar kariye.
      21 घंटे पहले ·  ·  3
    • Chandra Bhushan Mishra Ghafil 
      सर प्रथमतः तो बाबू जी के स्वास्थ्य के लिए बधाई स्वीकार कीजिए! रह गई बात बच्चों की प्रतिभा के संबन्ध में तो उसमें हमें ज़रा भी संदेह नहीं है पर वह प्रतिभा शॉर्टकट तहज़ीब के चलते भटक न जाय इस पर हमें ध्यान देना होगा। यह सही है कि पुस्तकें भी अब वैसी ही लिखी जाने लगी हें जैसा कि उपयोक्ताओं की मांग होती हे पर बच्चों को अपने इतिहास और वर्तमान समाज का इाईना भी दिखाना आवश्यक है तभी वे उसके आधार पर आगामी नीतियों का निर्धारण कर सकते हैं और यह आईना हैं वे पुस्तकें जिन्हें आज का समाज दरकिनार किए है...मेरे विचार से आप इससे सहमत होंगे
      21 घंटे पहले ·  ·  1
    • Chandra Bhushan Mishra Ghafil 
      आज की तहज़ीब की ही देन है कि लोग संवेदनाहीन होते जा रहे है यही हमारे बच्चे देख और समझ रहे हैं। पुराने तहज़ीब की साफ़ झलक हम उन्हे बताकर नहीं दिखा सकते...यह कार्य करने में अगर सक्षम है तो पुस्तकों की वह विरासत जो उस समय की आईना हैं...वे केवल उस समय को दिखाती ही नहीं अपितु जब हम उसे पढ़ रहे होते हैं तो उस समाज को जी भी रहे होते हैं...अतः यही एक उपाय है कि हम उन पुस्तकों को पढ़ें और पढ़ायें अपने बच्चों को ताकि आधुनिक सभ्यता की विकृतियों से उन्हें बचाया जा सके...आपका क्या ख़याल है शैलेन्द्र सर!
      20 घंटे पहले ·  ·  3
    • Shailendra Pratap Singh 
      Pustakalayon ki upadeyata to hai lekin uske liye tark dete samay aise nirashavadi kathan "log samvedanheen hote ja rahe hain" ko generalised na karen mishraji. AAJ KI tahzeeb hi hai mishraji ki ek sadhanheen vyakti ki beti ki chikitsa ke liye mumbai ke ek engineering inst. ke bachchon ne na kewal uski aarthik sahayata ki apitu use khoon bhi diya. har aane wali peedhi ko pichhali peedhi vikritiyon ki or badhata dekhti hai. yaad kijiye ham bhi apne badon ko kahte the "wo hamko naseehat karte hain jo apna zamana dekh chuke, ham par bhi jawani aayi hai ham apna zamana kyun chhode, duniyan to hamare samne hai zannat ka pata kya ho ki na ho, zannat mein chhupi daulat ke liye duniyan ka khazana kyun chhode" haan hame bachchon ko naitik aur sadguni banane wali pustakon ki or prerit avashya karna chahiye
      19 घंटे पहले ·  ·  4
    • Ravi Shankar Pandey आदरणीय अग्रज एवं अनुज --स्वस्थ्य मनोरंजन से आशय साहित्य,संगीत और कला हुआ करती थी!आज हमारे पास संसाधन बहुत हैं पर उसे पढने वालों की कमी हो गयी है। या यूँ कहें हम ऐसे वातावरण का निर्माण नहीं कर पा रहें है जो मूल्यों पर आधारित हो,पहले से हमारा जीवन भौतिक स्तर पर ऊँचा हुआ है लेकिन सम्वेंदना में ह्रास आया है...............सादर
      19 घंटे पहले ·  ·  4
    • Akhilesh Rai रवि जी आपकी बातों से मैं सहमत हूं....आज स्कूलों में बस्ते तो भारी होते जा रहे हैं....लेकिन ज्ञान घटता जा रहा है.....
      19 घंटे पहले ·  ·  3
    • Chandra Bhushan Mishra Ghafil 
      शैलेन्द्र सर हम विकास के ख़िलाफ़ नहीं हैं पर बहकाव हमें कहां ले जाएगा पता नहीं?? बहकती सभ्यता का ही नतीज़ा है कि आप देख सकते हें कि पश्चिम के देशों में कितने वृद्धाश्रम हैं और अब भारत में भी इसकी संख्या लगातार बढ़ रही है। यह संवेदन हीनता नहीं तो और क्या है। और जो उदाहरण आप दे रहे हैं उसमें कहीं न कहीं चाहे आत्म-प्रशंसा का ही उद्देश्य निहित हो निश्चित रूप से उद्देश्यपूर्ण है। इस बात को सार्वजनिक तौर पर आप माने या न माने पर यही सही है कि निरुद्देश्यीय सेवाभव का उपजना स्वस्थ और जागरूक वातावरण में ही सम्भव है। हम निरन्तर पाश्चात्य की नकल करते जा रहे हैं और हमारे बच्चे भी अतः जो विकृतियां वहां स्थाई हो चुकी हैं और जिनसे लोग ऊब चुके हैं वह यहां भी जल्द ही आ जाएंगी। हमें अपने अतीत को पढ़ना होगा और उसे पुनः पुनः जीते रहना होगा जिससे हमारा परिमार्जन होता रहे और हम स्वस्थ रूप से विकासपथ पर बढ़ सकें। इन सब का एक मात्र स्रोत हैं पुस्तकें
      18 घंटे पहले ·  ·  3
    • Sumant Bhattacharya 
      डबल नुक्ता वाले गाफिल साहब..कुछ अर्ज करूं क्या। जिसे आप नकल कहते हैं, मुझे लगता है कि सोच की दिशा वहीं से गलत दिशा पकड़ लेती है। हम विकास के जिस मॉडल को अख्तियार कर चुके हैं वो भी वही है जिस पर पश्चिम की दुनिया अर्सा पहले चल चुकी है। यही हाल हमारे लोकतंत्र का है। जो मेरी नजर में आरोपित लोकतंत्र है और जो औपनिवेशिक व्यवस्था के गर्भ से निकला है। विकास और सोच की इस दोहरी पाट के बीच भारतीय मानस छटपटा रहा है अपनी मौलिक सोच के लिए। लेकिन उसके लिए आधार नहीं तलाश पा रहा है। आपको नहीं लगता है कि अब एक विमर्श आधारों की शिनाख्त पर भी होने की जरूरत है। लेकिन विडंबना तो ये है कि हमारा बौद्धक नेतृत्व भी हमारे समाज की बेचैनी की उपज नहीं है। वो भी आयातित बौद्धिक क्षमताओं पर दंभी और वाचाल है। आमीन
      18 घंटे पहले ·  ·  4
    • Chandra Bhushan Mishra Ghafil शलेन्द्र सर! अपने जमाने को जीना बच्चों का अधिकार है पर उन्हें सुव्यवस्थित और संतुलित रूप से जीने की कला सिखाना हम अविभावकों का कर्त्तव्य
      18 घंटे पहले ·  ·  1
    • Sumant Bhattacharya पुस्तकें हमारी कल्पनाओं को उकसाते थे और जेहन में बनती तस्वीरों से नए का सृजन करते थे। ये प्रक्रिया ठहरी हुई सी लगती है अब। क्यों..
      18 घंटे पहले ·  ·  3
    • Chandra Bhushan Mishra Ghafil 
      अब तो यह कहकर पल्ला झाड़ देना आसान है कि समय नहीं है पुस्तक पढ़ने का सुमन्त सर! जो प्रक्रिया आप ठहरी हुई बता रहे हैं उसका भी शायद यही कारण है कि लोगों के पास समय नहीं है पढ़ने का उतना ही चटाखेदार सृजन होता है जितना पढ़ने का लोगों के पास वक़्त है। और जो विक सके...टीवी देखने का समय है। उन सीरियलों पर बहस करने का समय है पर पुस्तकें पढ़ने का नहीं। आज का एक ताज़ा वाक़या बताता हूं सर! हमारे यहां प्रायोगिक परीक्षा चल रही थी सैन्यविज्ञान की...छात्र और छात्राएं एक भी जवाब नहीं दे पाए परीक्षक ने जो पूछा...परीक्षक होशियार था उसने टीवी सीरियलों के बारे में पूछना शुरू किया सारे बच्चे और बच्चियां बढ़ चढ़ कर बताने लगे यही कि आनन्दी का क्या हुआ..कलेक्टर से उसका विवाह होगा कि नहीं आदि आदि...अब आप बताइए सर कि श्रेष्ठतम सृजन क्यों और कैसे हो??
      18 घंटे पहले ·  ·  3
    • Ravi Shankar Pandey सुमंत सर -आपने बहुत ही सटीक कहा हम आयातित बौधिकी पर भी दम्भ नहीं भर सकते ----सादर
      18 घंटे पहले ·  ·  3
    • Sumant Bhattacharya 
      डबल नुक्ता वाले गाफिल साहब, मुझे इसके लिए फैकल्टी जिम्मेदार नजर आती है। मैं कितनी ही यूनिवर्सिटीजी में, प्राइवेट इंस्टीट्यूशन में गया हूं, उन्हीं बच्चों से जब एक आध घंटा संवाद किया तो पाया कि वो मुझे छोड़ने को तैयार ही नहीं है। जबकि शुरुआत में जब मुद्दों पर बात की तो नीरस और उदासीन पाया। और जब मैं निपटता था तो यकीन मानिए, उत्साह से लबरेज चेहरों को देख अपने किए पर सुकून होता था और आभार जताता था अपने विश्वविद्यालय को। जिसने मुझे पढ़ने से ज्यादा गुनने के लिए प्रोत्साहित किया था।
      18 घंटे पहले ·  ·  3
    • Chandra Bhushan Mishra Ghafil विभास सर आप यहां उपस्थित हैं आप भी कुछ कहें आज के परिप्रेक्ष्य में पुस्तकों और पुस्तकालयों की उपादेयता के बारे में
      18 घंटे पहले ·  ·  2
    • Chandra Bhushan Mishra Ghafil आप सही कह रहे हैं सुमन्त सर! गार्जियन से हमारा तात्पर्य केवल अविभावक ही नहीं वल्कि वे सब हें जो बच्चों को कुछ भी बता सकें और जिनका जिम्मा बनता हो हमें ऐसा परिवेश रचना होगा जहां एक स्वस्थ मानस का विकास हो सके
      18 घंटे पहले ·  ·  3
    • Vibhas Awasthi 
      हमने अपना बचपन उस युग में गुजारा जहां पुस्तकों के जरिये...दुनिया को देखा जाता था.....समझा जाता था....लेकिन हमारे बच्चों की पीढ़ी...उस दुनिया को दृशय-श्रव्य (टीवी) के माधयम से जान रही है....अपनी जगह वो गलत नहीं है...उनके होमवर्क में बताया जाता है कि अमुक जानकारी के लिए अमुक वेबसाइट की सहायता लें......आज के बच्चों को हम इन साधनों से विमुख भी नहीं कर सकते है....ये उनके आज की सच्चाई है....पुस्तकें अपना रूप बदल रही हैं...ये बदलाव प्रतिगामी है या.....?????? ये सोंच पाने में मैं अभी असमर्थ हूं...
      18 घंटे पहले ·  ·  3
    • Ravi Shankar Pandey 
      चन्द्र भूषण सर -आज भी पुस्तकें उतनी ही प्रसंगिक है जितनी की पहले हुआ करतीं थी,तब सिर्फ पुस्तकें ही मनोरंजन या ज्ञानार्जन का साधन हुआ करतीं थीं। आज मनोरंजन के लिए टी.बी है नेट है.और बच्चों के अवचेतन मन को दिग्भ्रमित करने के संसाधनों की कमी भ...और आगे देखें
      17 घंटे पहले ·  ·  3
    • Chandra Bhushan Mishra Ghafil 
      साधनों और संसाधनों में गुणात्मक और परिमाणात्मक दोनों रूप से इज़ाफा सुखद है परन्तु उसका उपयोग और उपभोग दोनों संतुलित होने चाहिए आज हम खुद अपने परिवेश और वातावरण से पुर्णतः संतुष्ट और निश्चिन्त नहीं हैं...ज़रा सोचिए सभी सर और बेसर लोगों! अपने बच्चे को प्रथम बार मल्टीमीडिया मोबाइल देते समय हम क्या अशंकित नहीं रहते कि कहीं वह इसका दुरुपयोग तो नहीं करेगा...ब्लू फ़िल्म तो लोड करके नहीं देखेगा...चलो अगर इसी प्रकार के वातावरण में पला है तो निश्चित करेगा और इतना करेगा कि उसके प्रति उसकी सारी संवेदनाएं मर जाएंगी और वह समय से पहले ही जवान कोकर बूढ़ा हो जाएगा मानसिक रूप से...इन सबके पीछे जिम्मेदार कौन है...हमारा परिवेश जिसका निर्माण हमी ने किया है आधुनिकता के नाम पर...कहने का मतलब यह कि संसाधनों के उपयोग की कला हमीं सिखा सकते हैं बच्चों को...किताबें इसमें ज्यादा सहायक हो सकती हैं...फिर चाहे वह ई-पुस्तक ही क्यों न हो। वेब साइट से जानकारी प्राप्त करना और बात है...पुस्तकों का अलग महत्त्व है
      17 घंटे पहले ·  ·  2
    • Chandra Bhushan Mishra Ghafil Sumant Bhattacharya सर यहि कितबिया के बारे मां हम केतना लिखी अकेलै आप तो मामिला उठवाय कै चुप्पियै साधि लिह्ये
      17 घंटे पहले ·  ·  1
    • Vibhas Awasthi ghafil bhai kal baat hoyee....
      17 घंटे पहले ·  ·  1
    • Shailendra Pratap Singh 
      achchhe aur bure sansadhan bhi hamesha rahe hain. ham logon ke samay mein dono prakar ke sansadhan apekshakrit kam the, aaj jyada hain. ham logon ne bhi dono ka sadupyog-durupayog kiya hai. mool prashn disha-nirdeshan ka hai. hamko bachpan mein geetapress ki chhoti-chhoti gyanvardhak pustaken ghar mein padhne ko mileen, aaj hamme se kitane log ye pustaken rakhate hain. ham unke sthan par doosare gyanvarddhak sansadhan rakhte hain. tab kisi baat par bahas chalne par verification university road par jaakar kitab dekh kar kiya jata tha ab wah verification turant net ke madhyam se ho jata hai. sochiye ham log addha, pavanna, dyodha adhaiya ratate the. aaj ham ko hi lagta hai ki jo oorja inko ratne mein bachcha lagata wah wo doosre gyanopyogi karyon mein laga raha hai. साधनों और संसाधनों में गुणात्मक और परिमाणात्मक दोनों रूप से इज़ाफा सुखद है परन्तु उसका उपयोग और उपभोग दोनों संतुलित होने चाहिए . yah sarvkalik saty hai. is santulan ko sadhane mein asafal hone wale us samay bhi kuchh log the aur aaj ke bachchon mein bhi hain. hame apne anubhavon se yahi santulan banaye rakhna sikhana hai.
      11 घंटे पहले ·  ·  3

10 comments:

  1. अच्छी पोस्ट.
    हरेक चीज़ का अपना महत्व है.

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  2. विचारणीय बात कही है..

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  3. बढ़िया प्रस्तुति ।

    आभार ।।

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  4. सराहनीय आलेख ,आज भी हमारा परिवेश ,इ-पुस्तकों व आधुनिक ज्ञानार्जन ,सुविधाओं से आंशिक रूप से ही जुड़ पाए हैं ,पुस्तकालयों की आज भी उतनी ही मांग है ,जितना पूर्व में थी , चाहे जिस रूप में हो पुस्तकों -पुस्तकालयों की जीवन्तता है हमारी बौद्धिक जीवन्तता है ....समीचीन सामायिक आलेख ........

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  5. समयनुसार सबका अपना२ महत्व,...

    MY RECENT POST,,,,,काव्यान्जलि,,,,,सुनहरा कल,,,,,

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  6. कल 25/05/2012 को आपकी यह पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  7. पढ़ने के प्रति रुचि बढ़ेगी तो पुस्तकालयों के प्रति भी जरूर बढ़ेगी!

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  8. मित्रों चर्चा मंच के, देखो पन्ने खोल |

    आओ धक्का मार के, महंगा है पेट्रोल ||

    --

    शुक्रवारीय चर्चा मंच

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  9. पुस्तकालयों का हासिए पर जाना बड़ा ही दुखद है...
    बचपन से ही विवेकानंद पुस्तकालय का सदस्य हूँ और वहाँ पाठकों की संख्या घटते देख रहा हूँ....
    एकदम सच्ची बात करती/बताती पोस्ट....
    सादर आभार।

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