Friday 15 June 2012

भैंस भली नाखुश चली-

छोटी एक दुकान से, नहीं चलेगा काम ।
चलिए बिग-बाजार सब, करिए  काम-तमाम ।।


ईंटा-गारा की करें, खड़ी एक दीवार ।
सरकारी यह योजना, छत की क्या दरकार ??

 भैंस भली नाखुश चली, वापस घर की ओर ।
सर-सरिता सब सूखते,  मरते जाते ढोर ।।

 पहला बालक 
ट्रेन ट्रैक्टर ट्राम बस,  हॉफ टिकट का दाम ।
जल थल में इक सा सफ़र,  नहीं टिकट का काम ।।
दूसरा बालक 
माया के हाथी फ्री, ट्रेंड बड़े हुशियार ।
खा पीकर हैं वे पड़े, छोड़ भैंस का प्यार ।।

5 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि-
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (16-06-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ...!

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  2.  भैंस भली नाखुश चली, वापस घर की ओर ।
    सर-सरिता सब सूखते,  मरते जाते ढोर ।।

     ati sundar....

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  3. वाह जी! क्या बात है आपकी कविता और आप पर्याय बनते जा रहे हैं रविकर जी! बहुत-बहुत बधाई...आजकल मैं इतना व्यस्त हूँ कि ख़ुद यहां नहीं आ पा रहा आप ही इस ब्लॉग को ज़िन्दा रखे हैं आभार आपका

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