Sunday, 17 June, 2012

गाँव ( हाइकु )




देखना चाहो 
अगर जन्नत को
आ जाओ गाँव |



कच्ची डगर

पेड़ों की घनी छाया
है मेरा गाँव |



ठंडी बयार

चहचहाते पक्षी
गाँव की भोर |



लोग यहाँ के

मासूम बच्चों जैसे
है वही गाँव |



सुविधा कम 

प्रेम बहुतायत
यही तो गाँव |



न प्रदूषण 

न दूषित है सोच
मजे गाँव के |



रिश्तों की गर्मी

करती निर्धारित
गाँव-शहर |



याद आ रहा

बचपन का गाँव 
खो गया कहीं |



गाँव को ढूँढा

गाँव-गाँव जाकर 
कहीं न मिला |



स्वार्थ की आँधी

भाईचारा गायब
बदले गाँव |



पसर रहा

कंक्रीट का जंगल
गायब गाँव |



फ़ैल रही 

शहरी आबो-हवा
गाँव खो रहा |



है दौर नया

छूटता भोलापन
गायब गाँव |



बदली फिजा

रंग-ढंग शहरी
नाम से गाँव |

                    ------- दिलबाग विर्क 

10 comments:

  1. अच्छे हाइकु
    दिलबाग विर्क जी
    बढ़िया लगे

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  2. सबसे अच्छा यह वाला लगा....

    गाँव को ढूँढा
    गाँव-गाँव जाकर
    कहीं न मिला |

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  3. याद आ रहा
    बचपन का गाँव
    खो गया कहीं |

    बेहतरीन सुंदर हाइकू ,,,,बधाई दिलबाग जी,,,,,

    RECENT POST ,,,,,पर याद छोड़ जायेगें,,,,,

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  4. बहुत बढ़िया हाइकु |
    बधाई दिलबाग भाई ||

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  5. क्या बात है!!
    आपकी यह ख़ूबसूरत प्रविष्टि कल दिनांक 18-06-2012 को सोमवारीय चर्चामंच-914 पर लिंक की जा रही है। सादर सूचनार्थ

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  6. पसर रहा
    कंक्रीट का जंगल
    गायब गाँव |

    अब गाँव भी खत्म होते जा रहे हैं ... सटीक हाइकु

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  7. गाँव को ढूँढा
    गाँव-गाँव जाकर
    कहीं न मिला | वाह: बहुत बढि़या.और सटीक हाइकु

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  8. बेहतरीन सुंदर हाइकू ,बधाई दिलबाग जी /

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  9. अति उत्तम हाइकू...:-)

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