Tuesday 3 July 2012

बाबा जी की पीढ़ी ने आजादी दी

एक फ़ेसबुकीय परिचर्चा इसमें कमेंट के द्वारा आप सब भी भाग ले सकते हैं-

बाबा जी की पीढ़ी ने आजादी दी...

पिताजी की पीढ़ी ने धर्म,जाति, भाषा के नाम पर जानलेवा मर्ज़ दिए हैं...

हमारी पीढ़ी क्या देकर जायेगी यह सोचने वाली बात है...........?

पिछली पीढ़ी पर बहुत बड़ा क़र्ज़ है जिसको चुकाने के लिए उनको हमारे प्रश्नों का जवाब देना ही होगा....!

यह कह देना कि हम अज्ञानी हैं, कायरता होगी क्योंकि जाति के नाम पर तो कभी धरम के नाम पर तो कभी भाषा के नाम पर जो खून आपने बहाया है उसकी एक-एक बूँद का हिसाब तो आपको देना ही होगा...... दुनिया भर के विद्द्वानो को पढ़-पढ़कर बौद्धिक बनने से आपके, हमारी पीढ़ी को कौन सा लाभ.....? हमारे समय की तमाम समस्याओं का बीजारोपड़ आपके समय मे हुआ है, जिसका खामियाजा हमारी पीढ़ी भुगत रही है, आपका इस तरह मुह मोड़ लेना तब भी खतरनाक था और आज भी वह जहर ही है, ताज्जुब होता है कि महान पितामहों की संताने इतनी अभागी निकलेगी की जहाँ हमारे पितामह की पीढ़ी ने कन्धा से कन्धा मिलाकर एकजुट होकर ब्रिटिश-साम्राज्य का सूर्य अस्त किया बिना किसी स्वार्थ के पूर्ण निस्वार्थ होकर.... आप पिताओं ने सिर्फ स्वार्थ और स्वार्थ की राजनीति की और आज हमारे सवालों को आप निरर्थक कहकर अपने अपराधों से मुक्त नही हों सकते हैं....अपने-अपने अहम् के मिट्टी के किलों से बाहर आकर देखिये कि आपके सार्थक स्वार्थी मौन ने कितना कुछ छीन लिया है हमारी पीढ़ी से...!!! आज हम आपस मे एक दूसरे से जुड़ाव देश नही बल्कि '' जाति,भाषा,धर्म, '' के नाम पर करते हैं, मन पीड़ा से भर उठता है कि आप लोगों ने ये कौन सी दुनिया हमको विरासत मे दी है जो हर ओर बटी है.........क्या प्रफुल्ल चन्द्र चाकी, शेर अली खान, राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान, चंद्रशेखर आज़ाद, भगत सिंह और महात्मा गांधी ने इसी विभाजित भारत के लिए अपनी जान दी...?
अनुवाद देखिए
 ·  ·  · 3 घंटे पहले

  • आपको, Dharmendra GuptaVibhas AwasthiShailendra Pratap Singh और 2 और को यह पसंद है.

    • Alok Singh Arun zara zaroori baaton par gaur pharmao ye AADARSH KI BATEN hoti rahengi
      3 घंटे पहले ·  · 1

    • Arun Jaihind 
      Alok Singh.....बड़े भैया आप जो कहना चाह रहे हैं, जहाँ तक मेरी समझ है मै उसको बहुत पहले कह चुका हूँ और कुछ तकनीकी कारणों के कारण ऐसा संभव नहीं हों पा रहा है, मैने अमिताभ सर की वापसी पर लगभग सभी से बात कर ली है, वह बहुत जल्द ही लल्ला पर उपस्थित हों जायंगे ऐसा आश्वासन मुझको विभाष सर, शैलेन्द्र सर और महामहिम द्वरा दिया गया है...आशा है आप अनुज की बात समझ चुके होंगे..

      और सर यदि ध्यानपूर्वक आप पढे तो आपकी नज़र मे आदर्श जो है वह मैने यथार्थ के धरातल पर उतरकर समकालीन संदर्भों के आलोक मे भी लिखा है..

      जय हिंद

      2 घंटे पहले ·  · 2

    • Chandra Bhushan Mishra Ghafil 
      Arun भाई छोटे से राज्य, छोटे से समाज चाहे वह धर्म के आधार पर हो या जाति के आधार पर में रहने की आदत कई पीढ़ियों से चली आ रही थी व्यापकता के प्रति हमने सोचना ही छोड़ दिया था विश्वबन्धुत्व की कामना केवल सिद्धान्त बनकर रह गयी थी शायद इसीलिए जब आजादी मिली तो राष्ट्र तो एक हो गया पर हम आदतन फिर जातीय या धार्मिक सीमा खींच लिए अपने चतुर्दिक तथा उस रेखा को और मजबूत करने के लिए आमादा हो गये जैसे कि हम उसी में सुरक्षित रह सकते हैं...अब की पीढ़ी में व्यापक दृष्टिकोण का सूत्रपात हो चुका है इसे और सबल बनाने की आवश्यकता है वह हमारी हज़म्मेदारी है...हम किसी से जवाब मांगकर क्या हासिल कर सकते हैं हमें तो अपने आज के वसूलों पर जीना है...आज पूरे विश्व की सीमारेखा कितनी धूमिल हो चुकी है 40 साल पहले इसका अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता था...वास्तिवक उदारवादी दृष्टिकोण का प्रतिफलन तो अब हो रहा है उसे हमें और मजबूत बनाना है जाति और धर्म की वास्तविक परिभाषा करके उसे स्वीकार कर...जयहिन्द

      2 घंटे पहले ·  · 2

    • Vibhas Awasthi Arun Jaihind....subject bahut achcha hai.....bahut kuchh kaha gaya hai...kaha ja raha hai aur kaha ja sakta hai...lekin..asal me prashn yahi aata hai ki....jab hum swayam (Micro level) ko nahi sudharenge tab tak samaj (Macro Level) nahi theek hoga..isliye

      "hai andheri raat per diya jalaana kab mana hai
      ghar bante au bigadte srishti ke niyam se, per
      bigde huyon ko fir se basaana kab mana hai"

      2 घंटे पहले ·  · 2

    • Arun Jaihind 
      Chandra Bhushan Mishra Ghafil.......बड़े भैया आपने उचित कहा है कि धर्म-जाति-भाषा को आज के संदर्भों मे लेकर चलना होगा, और यह कार्य नई पीढ़ी कर भी रही है किन्तु पिछली पीढ़ी लगातार शल्य की तरह वर्तमान पीढ़ी को बौद्धिक आतंक के द्वारा हतोत्साहित कर रही है....बाबा कहेन वाली तर्ज़ पर फलां-फलां दोष-विवेचन कर डालते हैं जबकी हकीकत यह है कि अपने कार्यशील समय मे ये क्रान्ति-चेतना की हवाई मानसिकता वाले गुमराह युआ से ज्यादा कभी कुछ रहे नही हैं, मुझको तो लगता है कि यही कारण था कि सलीम-जावेद के गढ़े क्रुद्ध-युआ ने इनकी फर्जी क्रांती की असफलता के दाग को छुपा लिया और परिणामतः एक नया सिनेमाई सुपरस्टार अमिताभ बच्चन नामक चरित्र जन-जन मे व्याप्त हों गया...

      आज ये अपनी असफलता को नए संदर्भों मे सफल बनाने की साजिश रच रहे हैं, जिस तरह से महाराज शल्य अपनी अति-बौद्धिकता के कारण जब दुर्योधन की ओर से लडने लगे युद्ध मे तो कर्ण जैसे महान पराक्रमी योद्धा तक के मानसिक धरातल को हिला दिया था वैसे ही आजकल हमेशा और हर जगह करते पायें जाते हैं....अपने समय मे सिवाय बौद्धिक जुगाली के और कुछ नहीं कर पाए आजकल फेसबुक मिल गया सिद्धांत बताने को...कुछ पूछों तो उलटी बात पढ़ने को कहेंगे.....अरे कुछ अपना अनुभव भी तो बताओ हर देश की पिछली पीढ़ी अगली पीढ़ी को अपने अनुभव से लैश करती है और हमारे देश मे सिर्फ बौद्धिक डर पैदा करती है...

      2 घंटे पहले ·  · 1

    • Arun Jaihind 
      Vibhas Awasthi..............जी सर आप मेरी पोस्ट पर आये ढेर सारा आभार आपका...


      आपने सही कहा है कि सुधार स्वयं से आरम्भ होना चाहिए, ऐसा आप बड़ो के आधार पर हम सभी करते आये हैं, और कर रहे हैं लेकिन सर बर्षों पहले का एक गाना याद आ गया कि '' एक अकेला थक जाये तो मिलकर बोझ उठाना ''

      हम सुधरेंगे तो जग सुधरेगा यह एकदम सच है सर किन्तु इसका निर्धारण कौन करेगा कि जो राह मैने चुनी वह ही सही है, सही क्या है और इस युग की समस्या का उचित समाधान क्या होगा इसका निर्धारण करने अंतत सामूहिक ही तो करना होगा, ऐसी ही समस्या का ध्यान मे रखकर तो आप बड़ों ने इस लल्ला-चौराहा कि सजीव किया...


    • Chandra Bhushan Mishra Ghafil 
      देखिए Arun साहब सिद्धान्त की प्रकृति नहीं बदलती पर समयानुकूल ही उसपर अमल करना लाजिमी है और यही बुद्धिमत्ता है...‘दादा कहे रहे सरसइयै लाद्यो’ यह सिद्धान्त ग़लत नहीं है उसकी प्रकृति सही है उसके भाव सही हैं पर जब यह कहा गया था तब सरसो ही मंहगासौदा था थोड़ा व्यापार कर लेने पर भी अच्छी आय हो जाती थी इसलिए तब वह सही था आशय यह कि मंहगे सौदे का ही व्यापार करना चाहिए हम यह मान कर चलें न कि सरसइयै लाद्यो काहे कि दादा कहिन रहा...और यदि हम इतना सचेत और सतर्क नहीं होंगे तो हमारी अस्मिता ही ख़तरे में पड़ सकती है इसलिए उन सिद्धान्तों को आधार तो बनाया जा सकता है पर उसकी मूल धारणा तक ही न कि हू-ब-हू वैसे ही स्वीकार्य हो...समयानुकूल परिवर्तन हमें ही करना है अपनी उस पुरानी मानसिकता को लेकर कोई भले ही कितना चिल्लाता रहे...जयहिन्द


    • Vibhas Awasthi sahi kah rahe ho arun bhai...lekin is yug ki samasya ki hi baat nahi hai..... kisi bhi yug ki samsya ka koi samadhaan nahi hai.... samasya se lagaataar ladte rahna hi uska samadhaan hai....ek k baad doosri samasyan to aati hi rahengi...hum sahi hai ki nahi iska nirdharan hamara vivek karega....

    • Vibhas Awasthi aur jaisa abhi Chandra Bhushan Mishra Ghafil bhai ne kaha ki.... siddhant me samayanukul badlaav......ya....siddhant ko samay ke saath prasangik bana lena....hai

    • Arun Jaihind Chandra Bhushan Mishra Ghafil...........आपकी बात सही है सर कि सिद्धांत की प्रकृति नहीं परिवर्तित होती है, हा कुछ-कुछ नवीन संदर्भों को स्वयं मे समाहित करके नए संधान को साधा जा सकता है किन्तु बूढे गिद्धों ( सम्पाती जैसे अहमवादी ) की विचारधाराएँ हर पल बैतलवा की तरह अपने शुष्क और नीरस सिद्धांतों की प्रश्नावली लिए करमवीर विक्रमादित्य का सर तोड़ने का संकल्प दोहराती रहती जो है उनका क्या किया जाये...

      जय हिंद


    • Arun Jaihind Vibhas Awasthi............आकी बातों से पूर्णतः सहमत हूँ सर जी की युग के अनुरूप समस्याओं के समाधान भी अलग-अलग होते हैं और सही-गलत का संघर्ष हर युग मे होता चला जाता है किन्तु फला देश मे इस जैसी समस्यां का समाधान फला ईश्वरतुल्य विद्वान ने दिया था अतः हिन्दुस्तान मे भी उसी हल के रास्ते समस्या से निपटा जायेगा वाले उधारी-बौद्धिकों के जाल से कैसे निपटा जाये सर यह एक यक्ष-प्रश्न है हमारी पीढ़ी के सम्मुख...

    • Chandra Bhushan Mishra Ghafil 
      Arun भाई साहब देखिए देश-काल-परिस्थिति के अनुसार ही उस समस्या से निबटा जा सकता है कोई अमेरिका के विद्वान ने इस समस्या का समाधान यह बताया और वहां उसी के अनुसार फलां समस्या का निराकरण हो गया हो सकता है कि भारत में वे परिस्थितियां उस समय न हों जो अमेरिका की थीं इसलिए उस सिद्धान्त को आधार तो बनाया जा सकता है पर निपटना पड़ेगा भारत की परिस्थितियों के अनुरूप एकदम वैसे नहीं ऐसे में हमें परिवर्तन तो करना ही पड़ेगा उस सिद्धान्त में यहां के अनुरूप...यहां कोई तर्क-वितर्क की बात तो है नहीं अब किसी को बहुत तेज़ बुखार हो गया तो उसे हाई एंटीबायोटिक दे दी गयी पर उसका पेट भी ख़राब है तब सोचना पड़ेगा कि क्या दिया जाय कि बुखार भी उतर जाय और पेट भी जादा न झरे...हर जगह समस्याओं की प्रकृति अलग होती है अथवा वहां की परिस्थितियां अलग होती हैं तदनुरूप ही समाधान सम्भव है यहां तो भाई उधारी विद्या से काम नहीं चलने वाला...हां नहीं तो!


    • Chandra Bhushan Mishra Ghafil 
      देखिए Arun भाई आपकी बातों से सहमति जताते हुए एक सवाल करना चाहता हूं शायद आपकी बातों को पुष्टि मिले- गायें हमारे लिए माता होती थीं उन्हें हम मां का दर्जा दिये क्यों इस सिद्धान्त की तह में जाएंगे तो देखेंगे कि गाय का कोई भी उत्पाद हमारे लिएअत्यन्त उपयोगी होता था, गाय हमें दूध देती थीं, उनका मल-मूत्र भी हमारे लिए औषधि और ईंधन के काम में आता था बछड़े हमारा खेत जोतते थे या भार-वाहक के रूप में इस्तेमाल होते थे मक़सद गाय हमारे लिए अत्यन्त उपयोगी होती थीं अतः वे अवध्या थीं उन्हें माता मानकर धर्म से जोड़ दिया गया हमारे हिन्दुस्तान में यह यहां की परिस्थिति थी...और आज भारत में गाय के बछड़ों के बारे में आपका क्या विचार है...जबकि वे हमारे किसी काम के नहीं हैं न वे खेत जोत सकते हैं, न भार वाहन का कार्य कर सकते हैं और न ही उनसे प्रजनन ही कराया जाता है अब तो सीमन इंजेक्शन से डलवाया जाता है...हां करते वे क्या हैं शहरों में वे सड़क जाम करते हैं...गांवों में...खेत चरते हैं कुछ भी पैदा नहीं होने देते...राह चलते लोगों को मारते हैं जितना उपद्रव अब सांड़ कर रहे हैं उतना शायद कोई और जानवर नहीं कर रहा है इनकी संख्या में भी दिन दूना इजाफ़ा हो रहा है...ग्रामीण जनता त्रस्त है...इनका कोई समाधान फिलहाल इस समय सम्भव नहीं दिखता क्योंकि गाय तथा उसकी संताने यहां धार्मिक रूप से अवध्य हैं...गांवों में आकर देखिए कि बस्ती के पास का खेत जो सबसे उपजाऊ माना जाता है की फसल अनायास इनका ग्रास हो जा रही है किसान त्रस्त...वह सिद्धान्त और आज की परिस्थिति के बारे में आप क्या कहेंगे...जो केवल उपद्रव का कारण बन चुके हैं वे अब भी अवध्य हैं?...यह एक जटिल सवाल है आगे हम कुछ नहीं कहेंगे क्योंकि धार्मिक उन्माद का कारण हो सकता है...पर विचारणीय है...यह सिद्धान्त तब बहुत अच्छा था पर आज????? यहां मैं केवल सांड़ों की बात कर रहा हूं...गायों की नहीं और बहुत ही प्रैक्टिकल होकर ग्रामीण अनुभव के आधार पर

      28 मिनट पहले ·  · 1

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