Saturday, 14 July, 2012

उपादान-पुरुष : एक फ़ेसबुकीय परिचर्चा

रूपरेखा चित्र
Balendu Dwivedi
     समाज का एक तबका ऐसा है जो केवल मनुष्य-योनि में जन्म भर लेता है.अगर वह पत्थर-बिरादरी में भी पैदा होता तो भी मौज़ूद मनुष्यों की उर्जा-अंश में तनिक भी गिरावट नहीं आती.ऐसे लोगों को उपादान-पुरुष कहने में कोई खास बुराई नहीं है.आप चाहें तो देशी भाषा में इन्हें 'लोढ़ा' भी कह सकते है.पर उनके लिए इससे छोटी उपाधि मुझे स्वयं भी बर्दाश्त नहीं होगी.देखा जाये तो इन उपादानरूपी अवतारी पुरुषों की महिमा भी अकथनीय है.समाज के कई अज्ञानी लोग ऐसे महापुरुषों को 'परजीवी' कहकर उनके महत्व को कम करने की कोशिश ज़रूर करते हैं;पर इन उपादानरूपी पुरुषों के योगदान को नकारा नहीं जा सकता.जैसे यदि आप गलती से भी,कभी उन्हें अपनी एक ऊँगली पकड़ा कर देखिये!!अगर उन्होंने कसकर आपका 'पहुँचा'(कंधे से जुड़ा हुआ बांह का ऊपरी शिरा) न पकड़ लिया तो कहियेगा !!..आप कभी भूल से भी एक बार,उन्हें अपने साथ किसी कार्यक्रम में लेकर चले जाइए.अगर अगली बार से वे आपकी कार की अगली सीट पर बैठे न मिलें तो कहियेगा !!...भाई साहब! मैं तो कहता हूँ कि धीरे-धीरे वे अपने व्यक्तित्व को,आपके व्यक्तित्व के साथ इस कदर विलीन कर लेंगे कि आप जब हँसना,रोना या खाँसना चाहेंगे तो उसके पहले ही,वे आपके साँसों की गति भांपकर ऐसा ही करने लगेंगे.आप जब उन्हें अपने से दूर करना चाहेंगे,पर वे आपकी मंशा भांपकर,आपसे जोंक की तरह चिपक जायेंगे.यही नहीं,आप जब अपनी अलग पहचान बनाने की कोशिश करेंगे तो वे आपकी पहचान के साथ साए की तरह खड़े मिलेंगे.जब आप बहुत कोशिश करके उन्हें अलग कर ही लेंगे तो वे आपके किसी धुर प्रतिद्वंद्वी के साथ खड़े हो जायेंगे.अंतत: आपको उनके समक्ष नतमस्तक होना ही पड़ेगा.ऐसे उपादानरूपी महात्माओं को दूर ही से प्रणाम!!
अनुवाद देखिए
 ·  ·  · बुधवार को 20:37 बजे

  • You, Sumant BhattacharyaHeramb Chaturvedi और Balendu Dwivedi इसे पसंद करते हैं.

    • Heramb Chaturvedi door se hi pranaam karna hi padega, Qki in guno k chaltey wo maananinya ho chukey honge!! is vyavasth me ye hi panaptey hain!!

    • Balendu Dwivedi sahi kahaa sir aapne !!

    • Sumant Bhattacharya 
      श्रीलाल शुक्ल जी ने एक बार मुझे बताया था कि उनके पिता ने एक कविता लिखी थी। श्रीलाल जी के पिता जी वज्र किसान थे..शायद ही कभी गांव से शहर की ओर रुख करते थे..उन्होंने एक कविता लिखी थी.. कविता का शीर्षक यहां देना थोड़ा मुश्किल है लेकिन वो चुटि...



    • Balendu Dwivedi ज़रूर सर! मैं आपको बता दूँ कि समाज के ऐसे धरोहरों पर मेरी पैनी नज़र रहती है.उनके हाव-भाव,व्यवहार और अभिव्यक्ति-सब कुछ पर.और इसे मैं बाक़ायदा लिपिबद्ध भी करता हूँ.इस प्रक्रिया में,मैं एक ऐसे कथा-संसार की रचना की ओर अग्रसर हूँ,जहां का पूरा परिवेश और पूरी व्यवस्था- सब कुछ इनके हुनर से आक्रान्त है.
      3 घंटे पहले ·  · 2

    • Vinay Mishra 
      ‎@Balendu Dwivedi: isme koi sak nahi ki tumhari bhasa pe kadak kafi achhi hai. jis hisab se tumne chitran kiya padh kar maja aaya kintu hansi bhi aa rahi thi soch ke us tarah ke bayakti ke bare me.jaha tak mujhe pata hai kisi bhi organisati...


      3 घंटे पहले ·  · 1

    • Balendu Dwivedi विनय सर! आपकी तारीफ़ के लिए धन्यवाद.पर मेरा धन्यवाद तो सदैव उन लोगों को ज्ञापित है,जिनकी 'अखंड प्रतिभा' के कारण ही,मेरी लेखनी कुछ लिखने के लिए व्यग्र,बेचैन और बाध्य हुई-उसे एक दिशा मिली.और हमारा समाज जिस दिन ऐसे लोगों के योगदान को भुला देगा,उस दिन उसका महत्व जाता रहेगा!!
      2 घंटे पहले ·  · 1

    • Sumita Kamthan ACHCHA LAGA JANKAR BALENDU, ISHWER AAPKO IS KATHA-SANSAR KI RACHNA ME POORN SEHYOG DEIN AUR AAP SAMAJ KO EK ACHCHI RACHNA PRADAT KAR SAKEN. AMEEN....
      2 घंटे पहले ·  · 1

    • Chandra Bhushan Mishra Ghafil Balendu Dwivedi जी आज का भारत इन्हीं पर निर्भर है...यही प्रमुख कर्ता-धर्ता हैं...इनकी शान में कसीदे पढ़ना हमारा फ़र्ज़ है क्योंकि हमारे व्यवस्थापक और आका इन्हीं के बूते पूरी व्यवस्था चला रहे हैं या यूं कहें तो इन्हीं से पूरी व्यवस्था चल रही है...इनकी शान में व्यतिरेक न आने पाये मेरे भाई!
      2 घंटे पहले · 

    • Chandra Bhushan Mishra Ghafil Balendu Dwivedi जी आपका भाव और भाषा हमें बहुत भा गया है आपकी यह पोस्ट मय टिप्पणी क्या कहीं और शेयर की जा सकती है अगर आप इजाजत दें तो! जैसे ब्लॉगस्पॉट पर हमारा बहुत मन कर रहा है इसे शेयर करें

    • Sumant Bhattacharya इस छिपे रुस्तम की शिनाख्त के लिए मुझे भी काफी मात्रा में बधाई वगैरहा मिलनी चाहिए..
      59 मिनट पहले ·  · 1

    • Chandra Bhushan Mishra Ghafil badhaai Sumant Bhattacharyasir aapko! is shinakht ke liye
      56 मिनट पहले ·  · 1

    • Chandra Bhushan Mishra Ghafil Sumant Bhattacharya sir! आपसे बिना इजाजत लिए आपकी मैकाले वाली स्पीच हमने ब्लॉगस्पाट पर शेयर कर दिया है क्या आप उसे देखना चाहेंगे?
      54 मिनट पहले ·  · 1

    • Sumant Bhattacharya चार किलो आम भिजवा दीजिए अपनी बगिया से बदले में..मैकाले आपके हवाले..
      53 मिनट पहले ·  · 1

    • Chandra Bhushan Mishra Ghafil बस चार किलो??????? अरे पूरी बगिया का ज़िक्र होता तो कुछ बात भी बनती सर!

    • Sumant Bhattacharya 
      एक बार एक इलाहाबादी लालबहादुर शास्त्री के पास गया गाफिल भैया। तब शास्त्री जी रेल मंत्री थी..बोला कि मेरा टिकट कनफर्म करवा दो..तुरैंते ही इलाहाबाद जाना है। शास्त्री ने पीएस को बोला कि भाई इसका काम करवा दो। बाद में पीएस ने कहा, सर आप रेलमंत्...


      48 मिनट पहले ·  · 2

    • Balendu Dwivedi सुमिता मैम,ताहिरा मैम और गाफ़िल सर को प्रणाम और हृदय से धन्यवाद!और सुमंत सर को विशेष रूप से क्योंकि उन्होंने मुझे अपनी खोई और धूमिल पहचान को पुन:स्थापित करने का एक अवसर दिया....गाफ़िल सर!मैं आपकी विनम्रता का,अरसे से कायल हूँ.आप मेरे इस पोस्ट को बेख़ौफ़ शेयर कर सकते हैं.यह मेरे लिए सम्मान की बात होगी.हाँ!सुमंत सर ने वही 'अमवा' का लालच धरा दिया है.दुई-चार किलो का प्रबंध हमारे लिए भी कर देते तो ठीक रहता!!
      9 मिनट पहले · 

6 comments:

  1. क्या बात है वाह! बालेन्दु जी!
    आपकी यह ख़ूबसूरत प्रविष्टि दिनांक 16-07-2012 को सोमवारीय चर्चामंच-942 पर लिंक की जा रही है। सादर सूचनार्थ

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  2. बहुत बढ़िया पोस्ट और संलग्न विमर्श .हाँ ज़िंदा हैं ऐसे पात्र हमारे आसपास ,कई एक .

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  3. acchhi prastuti..ghafiuchl jee aap tak pahne ke madhy bane unhe bhee dhnywad..mere blog per bhee aapka swagat hai

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  4. उपादान के मर्म को, समझ गये हम आज।
    इनके चंगुल में फँसा, अब तो सर्वसमाज।।

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  5. बहुत सुकून हुआ आज ये सुनकर कि ऎसा मेरे साथ ही नहीं कहीं और भी होता है । आभार द्विवेदी जी का !!!!

    आप जब अपनी अलग पहचान बनाने की कोशिश करेंगे तो वे आपकी पहचान के साथ साए की तरह खड़े मिलेंगे

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  6. उपादान पुरुषों की है, लीला अपरम्पार
    ये परिजीवी जाति है, चिपके बारम्बार,,,,,,

    बहुत सुंदर प्रस्तुति,,,,

    RECENT POST...: राजनीति,तेरे रूप अनेक,...

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