Saturday, 17 November, 2012

राणा तू इसकी रक्षा कर // यह सिंहासन अभिमानी है... सादर ललित

  1. चर्चामंच पर एक पोस्ट 'गैर-मुसलमानों के साथ संबंधों के लिए इस्लाम के अनुसार दिशानिर्देश' का लिंक देने से कुछ फ़िरकापरस्तों नें समस्त चर्चाकारों के ऊपर मूढ़मति और न जाने क्या-क्या होने का आरोप लगाकर वह लिंक हटवा दिया तथा अतिनिम्न कोटि की टिप्पणियों से आदरणीय चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ जी को नवाज़ा। हम इस पोस्ट में ऊपर उस आलेख का लिंक तथा नीचे उन तथाकथित हिन्दूवादियों की टिप्पणयों को अपनी काव्यात्मक प्रतिक्रिया के साथ पोस्ट कर रहे हैं आप सभी से अपेक्षा है कि उस लिंक को भी पढ़ें जिस पर इन्होंने विवाद पैदा किया और इनकी प्रतिक्रियायें भी पढ़ें फिर अपनी ईमानदार प्रतिक्रिया दें कि कौन क्या है?

    अथ वार्ता-

    दिलचस्प घटना क्रम

     इन टिप्पणियों में एक है
     ललित मियाँ की 
    उनका परिचय जानने की इच्छा हुई-
    कुछ नहीं मिला-
    समस्त चर्चाकारों पर दोषारोपण 

    एक नायाब शैली में किया -
    पोस्ट हटा दी गई पर सभी चर्चाकारों को गालियाँ देने के बाद दुबारा अवतरित नहीं हुवे-


    @

    सोंच-विचार?!?!?! अरे भैया जी, इन मूढ़मतियों के पास दिमाग़ है भी सोंच-विचार के लिए???

    ललित लंठई में लगा, कौवे सा हुशियार ।

    पिक के अंडे पोसता, खाय यहाँ भी मार ।

    खाय यहाँ भी मार, कहीं भी काँव काँव कर ।

    घी पे डाले आग, भगे रोटियां चुरा कर ।

      सूँघ मांस की गंध, तृप्त कर लिया  नंगई ।

    भोर खोद के पिंड, करे अब ललित लंठई ।।

    @

    जितना प्रयत्न ये अपना स्वतंत्र विचार विकसित करने में लगायेंगे, उसके दशांश में ये शर्मनिरपेक्ष लोग बुद्धिजीवी घोषित हो, हिंदू-मुस्लिम एकता और सामाजिक सदभावना के सितारे बन जाते हैं. वैसे भी 'धिम्मी' बन के जीने की हमारी आदत बहुत पुरानी है.

    बड़े नपुंसक जीव हैं- 'धिम्मी' कह कर जाँय ।

    भांजे को अपने कभी, किन्तु खिला नहीं पाँय ।

    किन्तु खिला नहीं पाँय, बाप का नाम बता दो ।

    कोयल को ले पाल, बाप इक नया अता दो ।

    छुपकर करता वार, शिखंडी जैसा हिंसक ।

    लगा लांछना भाग, वाह रे वाह नपुंसक ।।

    गाफिल बाबू अपने मरकस बाबा के अफ़ीम की पिनक में मस्त है... रहने ही दिया जाए... ये आँख खोल के सोने का बहाना करने वाले लोग हैं... जाग नही सकते...

     गाफिल खाय अफीम ले, पर विष्ठा नहीं खाय ।

    नहीं कुटिलता व्याप्त है, नहिं आलस अधिकाय।

      नहिं आलस अधिकाय, पक्ष उनका ही सुनकर ।

    गया हटाया लेख, किन्तु हे श्रेष्ठ गुनाकर ।

    कहाँ गए तुम भाग, दोष चर्चाकारों पर ।

    सबको लिया लपेट, खाय यह पिंडी आकर  ।।

  2. @अभी तो बस यही चार लाइन याद आ रहा है:

  3. यह एकलिंग का आसन है,
    इसपर न किसी का शासन है,
    .............
    ............
    राणा तू इसकी रक्षा कर
    यह सिंहासन अभिमानी है...
  4. सादर
    ललित

     एक लिंग पर बैठ जा, भली करेंगे राम ।

    उलटी माला फेर ले, रोज सुबह या शाम ।

    रोज सुबह या शाम, गले का कौआ-घाँटी ।

    कौआना कर और, नहीं पड़ जाएँ गाँठी ।

    हो गुलाब में कैद, दोष नहीं लगे भृंग पर ।

    हो बलात कुछ जाय, बैठ जा एकलिंग पर ।।


    चलो साथ मिलके दिवाली मनायें (सोमवारीय चर्चामंच-1061)

    दोस्तों! चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ का नमस्कार! सोमवारीय चर्चामंच पर पेशे-ख़िदमत है आज की चर्चा का-
    लिंक 10-
    दीपावली की खिचड़ी -गिरिजेश राव
    अहम्



    1. बहुत ख़ूब! धनतेरस और दीपावली की ढेरों मंगल कामनाएं!
      आपकी यह सुन्दर प्रविष्टि कल दिनांक 12-11-2012 को सोमवारीय चर्चामंच-1061 पर लिंक की जा रही है। सादर सूचनार्थ









    1. ग़ाफिल जी,
      धन्यवाद। आप के दिये लिंक पर गया। मुझे यह समझ में नहीं आया कि दीपावली पर्व पर दो वर्ष से भी अधिक पुरानी एक निहायत ही भ्रामक, विरोधाभासी और प्रोपेगेंडा वाली पोस्ट का लिंक लगाने की क्या आवश्यकता आन पड़ी? वह पोस्ट है - गैर-मुसलमानों के साथ संबंधों के लिए इस्लाम के अनुसार दिशानिर्देश। क्या सन्देश देना चाहते हैं आप? इस देश में इस्लामी तय करेंगे कि ग़ैर मुसलमानों को कैसे रहना है और कैसे अपने पर्व मनाने हैं?
      हम हिन्दू कब अपनी ग़फलतों और बेहूदगियों से मुक्त होंगे? आप को पता भी है कि ये कौन लोग हैं और इनके छिपे एजेंडे क्या हैं? आप की समझ पर तरस आता है। सेकुलरी कंडीशनिंग से हम कब मुक्त होंगे? यही समय मिला था आप को दो साल से भी पुरानी हैवानों की पोस्ट का लिंक देने को?
      इस्लाम को जानना है तो स्वयं क़ुरआन और हदीस पढ़िये, हैवानों के प्रचार पर मत जाइये।
      इस टिप्पणी के माध्यम से आप से विनम्र अनुरोध है कि या तो उन्हें हटाइये या वहाँ से मेरी पोस्ट का लिंक। यह सन्देश आप को ई मेल के माध्यम से भी भेज रहा हूँ। चूँकि बहुत से लोगों के ई मेल पते ग़लत होते हैं और सन्देश वापस आ लुढ़कते हैं, इसलिये यह अनुरोध यहाँ भी कर रहा हूँ।
      आप आये और मुझे मान दिये उसके लिये कृतज्ञ हूँ, आभारी हूँ लेकिन व्यापक हित में कुछ कटु सा अनुरोध कर रहा हूँ। आशा है कि आप उसका भी मान रखेंगे।

      सादर,
      गिरिजेश 










    1. अभी तक तो न वो पोस्ट हटी है न आपकी, यही अनुरोध चर्चामंच पर भी कीजिये।
     







    1. अब वहाँ तो टिप्पणी करने से रहा। मेल बाउंस बैक नहीं हुई है तो इसका अर्थ यह है कि ग़ाफिल जी तक पहुँच ही गयी है। हो सकता है कुछ सोच विचार रहे हों।
















    1. सोंच-विचार?!?!?! अरे भैया जी, इन मूढ़मतियों के पास दिमाग़ है भी सोंच-विचार के लिए??? जितना प्रयत्न ये अपना स्वतंत्र विचार विकसित करने में लगायेंगे, उसके दशांश में ये शर्मनिरपेक्ष लोग बुद्धिजीवी घोषित हो, हिंदू-मुस्लिम एकता और सामाजिक सदभावना के सितारे बन जाते हैं. वैसे भी 'धिम्मी' बन के जीने की हमारी आदत बहुत पुरानी है.






    2. गाफिल बाबू अपने मरकस बाबा के अफ़ीम की पिनक में मस्त है... रहने ही दिया जाए... ये आँख खोल के सोने का बहाना करने वाले लोग हैं... जाग नही सकते...
    3. अभी तो बस यही चार लाइन याद आ रहा है:
    4. यह एकलिंग का आसन है,
      इसपर न किसी का शासन है,
      .............
      ............
      राणा तू इसकी रक्षा कर
      यह सिंहासन अभिमानी है...

    5. सादर
      ललित








    1. आज यह मेल श्री रूपचन्द शास्त्री जी को भेजी गई जो कि, जहाँ तक मुझे पता है, चर्चा मंच के मॉडरेटर हैं:
      __________________
      आदरणीय शास्त्री जी,

      दीप पर्व की शुभकामनायें।
      जहाँ तक मुझे पता है, आप चर्चा मंच के मॉडरेटर हैं। एक दिन पहले नीचे लिखी गई मेल आप के चर्चाकार श्री ग़ाफिल जी को भेजी गई लेकिन लगता है कि उन्हों ने देखा नहीं या देख कर भी कुछ न करने का निर्णय लिया है। मेल स्पष्ट है। अभी तक उन्हों ने न तो उस दो साल पुरानी इस्लामी पोस्ट का लिंक दीपावली के अवसर पर की गई चर्चा से हटाया है और न ही मेरी पोस्ट का लिंक।

      आप से अनुरोध है कि मेरी आपत्ति पर तदनुकूल तत्काल कार्यवाही सुनिश्चित करें। इस पावन पर्व पर आप इस मेल को मेरा अंतिम अनुरोध समझें।

      सादर,
      गिरिजेश राव







      1. शास्त्री जी ने चर्चा से उस इस्लामी पोस्ट का लिंक हटा दिया है। धन्यवाद।








  5. लिंक बदल दिये जाने से मेरी टिप्पणी अब वहाँ अप्रासंगिक दिख रही है,अपनी टिप्पणी हटानी चाही थी लेकिन टिप्पणी हटाने का विकल्प नहीं दिखा। तदापि धन्यवाद तो बनता ही है और असुविधा के लिये खेद भी।
  6. श्रीमान् मिरिजेश जी! संजय जी! और ललित भाई! आपका बहुत-बहुत आभार हमारी बुद्धि पर तरस खाने का! और चर्चामंच पर इस तरह की टिप्पणी करने का तथा उसे हमें मेल करने का! दरअसल बात यह है कि आप अपने विचार उस पोस्ट पर भी जाकर दें और चर्चामंच पर भी यही चर्चामंच का उद्देश्य है अगर आपको वह पोस्ट गाली लग रही है तो हम उसे भी चर्चा पर लगायेंगे ताकि लोग जान सकें कि पोस्टों पर ऐसी गालियां भी लिखी जाती हैं और कहीं यदि भगवान का भजन हो रहा है तो वह भी लगायेंगे कि ऐसा भी लिखा जाता है...क्या अच्छा और क्या बुरा है यह लोगों की व्यक्तिगत सोच पर निर्भर करता है और अपनी बुद्धि के अनुसार टिप्पणी कर सकते हैं यही तो चर्चामंच का मूल उद्देश्य है...अच्छा और बुरा जो कि नितांत व्यक्तिगत धारणा पर आधारित होता है हम दोनों दिखाएंगे उसपर आप अपने विचार से राय दें और उस पोस्ट पर भी जाकर दें इसी में चर्चामंच टीम की कृतार्थता है...मेरे विचार से आप हमसे नाराज़ न हों क्योंकि हमने अपनी तरफ़ से वहां कुछ नहीं लिखा है और हम आपकी प्रशंशा इसलिए करते हैं कि आपने ऐसी टिप्पणी करने का साहस किया...हम आपके स्वस्थ और प्रसन्न जीवन की कामना करते हैं...आभार आपका---यह मेल और आपकी टिप्पणी समयाभाव के कारण विलम्ब से देखा अतः विलम्ब से उत्तर देने के लिए खेद व्यक्त करता हूं आशा है आप हम से सहमत होंगे...शास्त्री जी ने जो वह पोस्ट हटा दी है यह बेहद दुःखद है क्योंकि चर्चामंच का यह मकसद कदापि नहीं होना चाहिए कि कुछ सिरफ़िरों और धर्मांधियों के धमकाने पर पोस्ट ही हटा दी जाय...गिरजेश भाई आपका ब्लॉग आलसी का ब्लॉग है...संजय भाई ख़ुदै कह रहे हैं मो सम कौन कुटिल तथा ललित भाई तो अभी तक अपनी प्रोफ़ाइल ही अपडेट नहीं किए आप सबके बारे में हम क्या कहें वैसे तो हम ग़ाफ़िल हैं ही ज़रा अपना ग़रेबान भी झांक कर देखें आपसब...संजय भाई उस चर्चा का शीर्षक था ‘चलो साथ मिलकर दीवाली मनाएं’ कौन साथ मिलकर भारत में रहने वाली और क़ौमों को आप साथ नहीं रखना चाहते? आज का हिन्दुस्तान अकेले आप तथाकथित हिन्दुओं के ही बलपर चल रहा है...बुरा न मानना हिन्दूधर्म के बजाय अगर आप मात्र मानवधर्म का पाठ सीख जायें तो शायद मानव का कल्याण हो सके...इसी संकीर्ण बुद्धि के बूते ब्लॉग बनाकर चले आए लिखने और बन जाना चाहते हैं रहनुमा...मुझे तरस तो नहीं आ रहा आप लोगों की बुद्धि पर पर मुआफ़ करना दोस्त! घृणा अवश्य हो रही है
  7. गिरिजेश भाई! आपने टिप्पणी के स्वतः प्रकाशन पर रोक लगा रखी है शायद डरते होंगे कि कोई ऐसी टिप्पणी न कर दे कि आपकी स्वतन्त्र कुवाचालता पर आंच आ जाय...हिम्मत होगी तो मेरी टिप्पणी को प्रकाशित कर देना दोस्त...ईश्वर आपको सद्बुद्धि दे
  8. संजय भाई ‘मो सम कौन कुटिल’! चर्चामंच पर आपकी अप्रासंगिक हुई टिप्पणी को भी डिलीट कर दिया गया है वैसे इन सभी डिलीशन से मैं बहुत ही दुःखी हूं कि आप सभी तथाकथित ज्ञानियों की समझ में यह नहीं आया कि चर्चामंच का उद्देश्य क्या है?
  9. ग़ाफिल जी,
    ... थोड़ा टिप्पणी मॉडरेशन की तकनीक के बारे में भी जान बूझ लें तो अच्छा हो, आप 'चर्चा कर्म' जैसे गुरुगम्भीर दायित्त्व के निर्वाह में लगे हैं, इतना जानना तो बनता ही है।
    आप गफलतों से मुक्त हों, चर्चा के पहले पढ़ें, देश काल की मर्यादा समझें, मुक्तमना हो निर्णय लें एवं मानवधर्म और इस्लामी ज़िहादियों में अंतर समझ पायें; यही कामना है। इसके अतिरिक्त मुझे कुछ नहीं कहना। पहले के तीन बिन्दु उस अतिरिक्त को व्यक्त करते हैं जो मैं कह नहीं पा रहा। 'गुरु विरंचि सम' वाला अनुशासन याद आ गया है ;)
  10. गाफ़िल जी,
    हरियाणा में एक कहावत चलती है, ’बुड्ढा मरे या जवान, हत्या सेती काम’ - आपके चर्चामंच की कृतार्थता वाली बात पर याद आ गई। गाली हो या भगवत भजन, आपको तो लिंक से मतलब है। बढ़िया है, लगे रहिये। हम सिरफ़िरों, धर्मान्धों और तथाकथित हिन्दुओं की प्रशंसा करने के लिये और सुखद भविष्य की कामना करने के लिये आप जैसे मानवधर्मी का आभार कैसे व्यक्त किया जाये, अभी तो यही उलझन है फ़िर मानव कल्याण की कैसे सोचें? यूँ भी ये विभाग आप सम बुद्धि-ज्ञान विशारदों से ही शोभा पाता है। आप कल्याण-कार्य में प्रवृत्ति अवश्य रखें, हम जैसे संकीर्ण बुद्धि वाले लोगों का जो होगा सो देखी जाएगी। रहनुमाई की कोशिश हममें से किसने की, स्पष्ट करेंगे क्या? निश्चिंत रहिये, अपना तो ऐसा कोई इरादा कभी नहीं रहा।
    हाँ, कम से कम मेरे प्रति आपकी घृणा जरूर हमेशा जीवंत रहे, ऐसी घृणा मेरे लिये तो संजीवनी का काम करती है।
    चर्चामंच पर मैंने टिप्प्णी की थी और उसमें लिंक नं. का भी जिक्र किया था। उस लिंक को बदलकर कोई दूसरी पोस्ट को वहाँ लगा दिया गया, इसलिये वो टिप्पणी अप्रासंगिक हो गई थी। आपने हटाया उसके लिये मेरा धन्यवाद। यदि सभी डिलीशन्स के कारण आप दुखी महसूस कर रहे हैं तो ये मामला आपके और आपकी टीम के बीच का है।
    चलता हूँ,पापी पेट का सवाल है। आगे आपसे सुसंवाद शाम के बाद ही पढ़ कर पाऊंगा।

14 comments:

  1. उत्कृष्ट प्रस्तुति रविवार के चर्चा मंच पर ।।

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  2. आभार रविकर जी आपको इस प्रविष्टि के लिए! इन कट्टरपंथी रूढ़िवादी हिन्दुओं को इस पोस्ट 'गैर-मुसलमानों के साथ संबंधों के लिए इस्लाम के अनुसार दिशानिर्देश' में ऐसी कौन सी गाली दिख गयी जो कि भड़क उठे चर्चामंच पर लगाने से यह मेरी समझ में नहीं आ रहा और इनको क्या समझ आये कि हिन्दुस्तान में सारे पर्वों में चाहे वह हिन्दुओं के हों या अन्य धर्मावलम्बियों के कैसे हम समभाव से सहभागिता करते हैं! इन्हें भारत के गांवों में आकर देखना चाहिए कि हम किस तरह होली, दीवाली, और ईद एक साथ मनाते हैं! कितने आदर से हम अपने गांव के बुज़ुर्ग जुम्मन को जुम्मन चाचा कहते हैं ये कुटिल, आलसी और छद्मरूपधारी छुद्रमना धर्मांधी क्या जाने?...रविकर भाई! हम चाहते हैं कि तथाकथित विवादित पोस्ट जो इन सभी को गाली लगी उसका लिंक आप अपनी चर्चामंच पर देकर लोगों की राय लें कि इसमें कौन सी गाली है जिसके नाते सभी चर्चाकारों पर मूढ़मति होने का आरोप ये विद्वान लोग लगा रहे हैं...ब्लॉग जगत में ऐसे भड़काऊ तथा कट्टरपंथियों की खुलकर भर्त्सना होनी ही चाहिए...उस पोस्ट का लिंक हमने अपनी टिप्पणी में ऊपर दे दिया है

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  3. मुझे तो मंच के इस लिंक में ऐसा कुछ नहीं लगा, जिससे इतना बड़ा विवाद खड़ा किया जाए। वैसे भी ब्लाग पर जो कुछ भी है, वो सब यहां देने में हर्ज क्या है, लोग खुद पढ़कर तय करेंगे कि इस लेख से कैसा संदेश जा रहा है।

    गाफिल साहब आपने कोई गलत नहीं किया है, आपने बड़े ही ईमानदारी और जिम्मेदारी से मंच को सजाया है और सजाते रहेंगे।

    भाई रविकर जी आपका शुक्रिया, पूरे मसले को अच्छी तरह से हम सबके सामने रखा।

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  4. क्या कहूँ उनके बारे में जो जन्म की जीववैज्ञानिक दुर्घटना की अस्मिता से ऊपर उठ ही नहीं पाते. जिनका वर्तमान दरिद्र हो वे भविष्य-निर्माण की बजाय किसी अमूर्त गौरवशाली अतीत की तलाश करते हैं.

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  5. चर्चामंच भी यदि जातिवाद धर्मवाद से ग्रसित हो जाएगा तो उसका क्या औचित्य रह जाएगा हम लेखक हैं लिखते हैं अपने अपने विचारों पढ़ाने और पढने के लिए, एक दूसरे का गला काटने के लिए बैठे हैं क्या?? साहित्य को तो कम से कम बख्श दो यहाँ सभी की खुली किताबों का लिंक दिया जाता है जिसको जो पढना है वो पढ़े कोई बाध्यता तो नहीं जिस पोस्ट पर आपत्ति है तो उस पोस्ट पर ही टिपण्णी करें तो ज्यादा बेहतर होगा जिसका आपने लिंक दिया वो पोस्ट भी मैंने पढ़ी मुझे वहां कोई अभद्रता दिखाई नहीं दी हिन्दू धर्म के लिए कोई गाली दिखाई नहीं दी फिर क्यूँ आपत्ति है यहाँ कोई नेतागिरी भी नहीं हो रही है की वोट की खातिर ये सब किया जा रहा है हैरानी हुई जानकर अब चर्चा मंच लगाने वालों को पोस्ट का लिंक देते हुए धर्म जाती का भी ध्यान रखना पड़ेगा !!!!!

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  6. मेरी समझ में नहीं आया कि आखिर मेरी इस पोस्ट पर किसी को आपत्ति कैसे हो सकती है? मैंने तो आज तक कभी भी किसी भी धर्म के खिलाफ कोई पोस्ट नहीं लिखी, यहाँ तक कि कोई टिप्पणी भी नहीं की... क्योंकि यह मेरे स्वाभाव और मेरे माता-पिता के द्वारा दिए गए संस्कार यहाँ तक कि मेरे धर्म के भी खिलाफ है...

    वैसे भी मैंने यह पोस्ट खासतौर पर मुस्लिम कट्टरपंथियों को मुखातिब हो कर लिखी थी और कुछ दिन पहले अपनी फेसबुक टाइमलाइन पर इस कमेन्ट के साथ इस पोस्ट को शेयर किया था कि-

    "मुसलमान गैर-मुसलमानों की शिकायत करने से पहले ज़रा अपने भी गिरेबान में झांक लें कि उन्हें क्या करना चाहिए और क्या कर रहे हैं."

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  7. विमर्श हो यह ज़रूरी है .रेस्पोंस कैसी भी हो ,होनी चाहिए .सवांद बना रहे ,विवाद गिर जाएगा संवाद से .

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  8. Comment's Garden http://commentsgarden.blogspot.com/2012/11/blog-post.html
    पर हमने कहा है :
    @ चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ जी ! सब एक परमेश्वर की रचना और एक मनु/आदम की संतान हैं. सब एक गृह के वासी हैं और मरकर सबको यहाँ से जाना है. इसलिए अच्छा यह है सब एक दुसरे को प्रेम और सहयोग दें. इस से सबको शान्ति मिलेगी और सबके बच्चे एक सुरक्षित वातावरण में पल सकेंगे.
    हिन्दुओं को उनका धर्म और गुरु यही बताता है और मुसलामानों को उनका इस्लाम यही सिखाता है.
    ऐतराज़ करने वाले भी यह बात जानते हैं लेकिन उनके अपने राजनीतिक स्वार्थ हैं. वे भी हमारे अपने भाई हैं. जल्दी ही वह दिन आएगा जब वे भी ठीक बात कहेंगे. नफरतों की उम्र ज़्यादा नहीं होती.
    इसीलिए हमने मुसलामानों से कहा है कि
    ऐ मुसलमानो ! हक़ अदा करो

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  9. ढोटा ढलमल ढीठ ढक, ढर्रा ढचर ढलैत ।

    धिम्मी कहकर जा छुपा, अजगर ललित करैत ।

    अजगर ललित करैत, करे बेनामी टिप्पण ।

    लेजा अपनी आय, गालियाँ बेजा ढक्कन ।

    क्या दरिया में बाढ़, समंदर या फट जाता ।

    अभिमन्यु को मार, कहाँ मुंह रहा छुपाता ।

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  10. हाँ, तो बेसुरम पर आने वाले ‘असुर’ लोगों, (यहाँ पर ‘असुर’ शब्द का प्रयोग मैने बिना सुर में गाने पढ़ने और बोलने वालों के लिए किया है और उनके लिए भी किया है जो "हंसुआ के बियाह में खुरपी का गीत गाते हैं". यह साफ करना मुझे इसलिए भी अत्यावश्यक लगा क्योंकि मैं इन सभ्य, सुसंस्कृत, सेक्युलर लोगों की सुरुचिपूर्ण गालियाँ और नही सुनना चाहता हूँ)
    धृष्टता के लिए क्या कहूँ? लेकिन असूरों, मुझे एक बात समझ में नही आई, इतना हंगामा क्यों बरपा है? “धिम्मी” शब्द के प्रयोग पर? या “हल्दी घाटी” का उद्धरण देने पर? और लोगों की तरह 'शर्मनिरपेक्ष' नही होने पर? याकि शक्ति सिंहों और मानसिंहों के बीच 'महाराणा' का नाम लेने पर???
    अब आते हैं मुद्दे की बात पर. शुरू करूँगा 'शाह नवाज़' से और अंत करूँगा 'रविकर' से. बीच में जितने भी कुमार, कुमारी, मिश्रा आदित्यादि है, सबसे निपटते चलेंगे.
    शाह नवाज़ ---- मेरी समझ में नहीं आया कि आखिर मेरी इस पोस्ट पर किसी को आपत्ति कैसे हो सकती है? मैंने तो आज तक कभी भी किसी भी धर्म के खिलाफ कोई पोस्ट नहीं लिखी, यहाँ तक कि कोई टिप्पणी भी नहीं की... क्योंकि यह मेरे स्वाभाव और मेरे माता-पिता के द्वारा दिए गए संस्कार यहाँ तक कि मेरे धर्म के भी खिलाफ है...
    --- जैसे ही मैं अपने धर्म की अच्छाइयों से परदा उठाना शुरू करता हूँ, यह साबित करने की ज़रूरत हीं नही बचती हैकि दूसरे धर्म बुरे हैं.... आपके स्वभाव और संस्कार से मैं अपरिचित हूँ लेकिन यह बात डंके की चोट पे कही जा सकती हैकि यह कम से कम आप के धर्म के खिलाफ नही ही है.
    मुझे आपत्ति इस बात को लेकर भी है कि हम दुनिया को मुस्लिम और गैर मुस्लिम के चश्मे से क्यों देखते हैं? मुझे तो किसी ने भी दुनिया को 'हिंदू' और 'गैर हिंदू' में बाँट कर नही दिखाया... शाह नवाज़, मुद्दा यह नही हैकि आप ने किसी धर्म को बुरा कहा या नही, मुद्दा यह हैकि हम दुनिया को बाँटे क्यों धर्म के आधार पर?
    राजेश कुमारी --- समस्या यही हैकि आप जैसे लोग लेखक है जो सतह के नीचे उतर के नही देख सकते हैं. इससे ज़्यादा अगर मैं कुछ और कहने की कोशिश करूँ शायद व्यक्तिगत आक्षेप की श्रेणी में आ जाएगा अतः ....
    ईश मिश्रा -- और कुछ हो या ना हो, आप जैसे लोगों से हिन्दी का भविष्य उज्ज्वल है. अस्मिता और वो भी दुर्घटना की!!! वाह!!! आज एक नया शब्द प्रयोग सीखा मैने. और मैने ये भी जाना की 'या तो अतीत अमूर्त होता है या हमारा, विशेषतः हिंदुओं का अतीत अमूर्त है, गौरवशाली तो कत्तई नही!!! आप 'धिम्मी' मानसिकता के मूर्त रूप हैं मिश्रा जी
    गाफिल --- आपके बारे में कुछ भी कहना छोटा मुँह बड़ी बात होगी. आपलोग ब्लॉग जगत के चमकते सितारे हैं. बस यही पूछना है आपसे कि यह कहाँ और ब्लॉग्गिंग के किस 'रूल बुक' में लिखा हुआ हैकि टिप्पणी करने वाले को भी अपना प्रोफाइल बनाना हीं होगा, अथवा वही टिप्पणी कर सकता है, जो अपना ब्लॉग लिखता है?
    दिक्कत यह नही हैकि आप बड़े हीं आदर से बूजुर्गवार जुम्मन को जुम्मन चाचा कहते हैं. दिक्कत यह हैकि जब वही जुम्मन अपनी खाला पे अन्याय करते है तो आप जैसे लोग "बिगाड़ के डर से ईमान की बात नही कहते हैं"
    व्यक्तिगत रूप से मुझे इस नाम, 'छद्मरूपधारी छुद्रमना' पर सख़्त आपत्ति है क्योंकि आज तक मैने जो भी किया डंके की चोट पे किया... आरा जिला घर बा ना कहु से डर बा. वो भी स्वीकार्य हो गया मुझे लेकिन ये 'छुद्र' क्या होता है?आप जैसे लोगों से, जिनसे कि पूरा का पूरा हिन्दी ब्लॉग जगत चमचमायमान है, उनसे हिन्दी में ऐसी ग़लती!!!??? आगे से आप मेरे लिए 'क्षुद्र' शब्द का प्रयोग कीजिएगा कृपा कर के. थोड़ा सा शुचितावादी हूँ मैं शब्दों की वर्तनी और उनके प्रयोगों को लेकर... बर्दाश्त कर लीजिए.

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  11. राणा तू इसकी रक्षा कर // यह सिंहासन अभिमानी है... सादर ललित
    रविकर
    बेसुरम्‌

    ललित ललित जैसे प्राणियों को समझना होगा जब आपने कुछ लिखके पोस्ट कर दिया तब वह ब्लॉग की संपत्ति बन जाता है .आपको लिख के अपने पास रख लेना चाहिए था .पोस्ट को /सेतु को

    हटवाने का फतवा आप कैसे ज़ारी कर सकतें हैं आप ?क्या आप ब्लॉग जगत के स्वयम घोषित खलीफा हैं ?फतवा खोरी यहाँ नहीं चलेगी .चर्चा मंच पे तो बिलकुल भी नहीं शुक्र मनाइए आपको इतनी

    तवज्जो

    मिल गई जितनी की आपकी ब्योंत नहीं है .

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  12. @ Lalit
    शाह नवाज़ ---- मेरी समझ में नहीं आया कि आखिर मेरी इस पोस्ट पर किसी को आपत्ति कैसे हो सकती है? मैंने तो आज तक कभी भी किसी भी धर्म के खिलाफ कोई पोस्ट नहीं लिखी, यहाँ तक कि कोई टिप्पणी भी नहीं की... क्योंकि यह मेरे स्वाभाव और मेरे माता-पिता के द्वारा दिए गए संस्कार यहाँ तक कि मेरे धर्म के भी खिलाफ है...
    --- जैसे ही मैं अपने धर्म की अच्छाइयों से परदा उठाना शुरू करता हूँ, यह साबित करने की ज़रूरत हीं नही बचती हैकि दूसरे धर्म बुरे हैं....


    मैं जब यह बताता हूँ कि मेरे धर्म में क्या अच्छाईयाँ हैं तो यह कैसे हो सकता है कि इसका मतलब दुसरे धर्म में बुराइयाँ हैं??? फिर तो हर एक को धार्मिक बात कहना बंद कर देना चाहिए, क्योंकि हर कोई अच्छी बातों को सामने लाना चाहता है। मैं ऐसा नहीं मानता, दुनिया में अगर कुछ लोग बुराइयों का प्रचार करने में लगे हैं तो सही बात सामने आना आवश्यक है।



    आपके स्वभाव और संस्कार से मैं अपरिचित हूँ लेकिन यह बात डंके की चोट पे कही जा सकती हैकि यह कम से कम आप के धर्म के खिलाफ नही ही है.


    धन्यवाद आपका!



    मुझे आपत्ति इस बात को लेकर भी है कि हम दुनिया को मुस्लिम और गैर मुस्लिम के चश्मे से क्यों देखते हैं? मुझे तो किसी ने भी दुनिया को 'हिंदू' और 'गैर हिंदू' में बाँट कर नही दिखाया... शाह नवाज़, मुद्दा यह नही हैकि आप ने किसी धर्म को बुरा कहा या नही, मुद्दा यह हैकि हम दुनिया को बाँटे क्यों धर्म के आधार पर?

    भाई मैं मुस्लिम हूँ और तुम हिन्दू हो, कोई अन्य किसी और धर्म को मानने वाला होगा, यह तो हमारी आस्था भर है। इसमें बांटना क्या हुआ है? बांटना तो तब होता जबकि बीच में दीवारें खड़ी की जाती और मेरी कोशिशें तो दीवारें मिटाने की है। यह दीवारे एक-दूसरे के बारे सही जानकारी नहीं होने के कारण ही खड़ी हुई हैं।

    मेरा मानना है कि विभिन्न आस्थाओं के लोग अपनी-अपनी आस्थाओं का अनुसरण करते हुए भी एक-दूसरे के साथ पूरे प्रेमभाव के साथ रह सकते हैं, क्योंकि सभी इंसान हैं और सबको एक ही प्रभु ने बनाया है। इसके बीच में किसी का भी धर्म नहीं आता है, जो लोग ऐसा सोचते हैं कि धर्म तोड़ता है तो उन तक सही बात पहुंचाने की आवश्यकता है और यही कोशिश मैंने की, करता आया हूँ और करता रहूँगा। चाहे किसी को पसंद आए या ना आए!

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  13. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    अन्याय का विरोध होना भी जरूरी है!

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