Tuesday 31 January 2012

घुसख़ोर

जब से तुम घुसख़ोर हो गये।
कटी पतंग के डोर हो गये।।

ऊंचा ओहदा पा करके भी,
कितने तुम कमजोर हो गये।

वक्त ने तुमको शाह बनाया,
ख़ुद से ही तुम चोर हो गये।

आदम के ही बच्चे होकर,
कैसे आदमख़ोर हो गये?

सुधरोगे ही इस उमीद में,
रातें बीतीं भोर हो गये।

टूट चुका है बांध सब्र का,
दुःख के घन अब घोर हो गये।

नेता और भलाई जैसे,
नदिया के दो छोर हो गये।

जिस रस्ते पर रुपया देखा,
मुंह खोले उस ओर हो गये।



(मित्रों आप सब जानते हैं कि मैं 40 दिन के चुनावी सफर में हूं, वक्त नहीं निकाल पा रहा हूं यहां के लिए। लेकिन मैने चार लाइने आपको दे रहा हूं, चाहता हूं अब आप सब इस कविता को अंजाम तक पहूंचाएं। देखें आखिर में ये कविता कितनी स्वादिष्ट होती है।) 

Monday 30 January 2012

...कबीरा धीरे धीरे

चलती अपनी नाव, कबीरा धीरे धीरे ।
मारे जा अपने दाँव, कबीरा धीरे धीरे ।

नेता, भाषण, गुंडे, दंगे... हरे भरे सब 
राजनीति की छाँव कबीरा   धीरे धीरे ।

देहातों में भी शराब की खुली ठेकियाँ,
आगे   बढ़ते  गाँव,  कबीरा  धीरे धीरे ।

नागफनी के काँटों से सहलाते रहना,
भर  जायेंगे घाव , कबीरा  धीरे धीरे ।

Saturday 28 January 2012

अ-सरकारी यह काढ़ा --

पा-जी अन्ना राव, पिलाओ बाबा घुट्टी ।

काढ़ा गाढ़ा हो चला, बूढ़ा फिर भी त्रस्त ।
पैसठ सालों में शिथिल, बरबस परबस पस्त ।


बरबस परबस पस्त, कहीं न होवे छुट्टी ।
पा-जी अन्ना राव, पिलाओ बाबा घुट्टी ।


चोरी भ्रष्टाचार, मिलावट लालच बाढ़ा ।
सत्ता-नब्ज टटोल, अ-सरकारी यह काढ़ा ।।
                                     ----रविकर 

Friday 27 January 2012

बाप रे! फिर चुनाव!!

     बाप रे! फिर चुनाव!!...चौंकिए नहीं साहब! यह उलझन भारत की जनता की नहीं बल्कि चुनाव ड्यूटी में लगे कर्मचारियों की है। भई ड्यूटी करनी ही है तो उलझन क्यूं??... नहीं, उलझन है मैं ख़ुद भुक्तभोगी हूँ। चुनाव ड्यूटी की सबसे बड़ी उलझन होती है कि हमें वाहन स्वरूप मिलेगा क्या? कभी कभार भाग्य साथ दे दिया तो सवारी-गाड़ी मिल जाती है नहीं तो अक्सर ही भार-वाहन यानी ट्रक ही चुनाव कर्मचारियों को नसीब होता है। ऐसी हालत में क्या दुर्गति होती है कर्मचारियों की इसे बयान नहीं किया जा सकता। वैसे भी भारत में आदमी की कीमत भूसे से ज्यादा नहीं है सो सरकार और अधिकारी जो शायद आदमी नहीं भगवान हैं और भारत में जनता के भाग्य-विधाता भी (ऐसा स्वीकार कर लिया गया है) की निगाह ही आदमियों के बावत क्यों बदले? इस सन्दर्भ में मैंने एक लेख लिखा था अक्टूबर 10 के होने वाले त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव की ड्यूटी से लौटने के उपरान्त जागरण 'जंक्शन डॉट कॉम' पर। अबकी बार इलेक्शन ड्यूटी में जाने के पहले ही वह लेख आप लोगों को पढ़वाना समीचीन समझता हूँ आप अवश्य क्लिक करें और पढ़ें-
                                                                -ग़ाफ़िल 

आज हमारी कल तुम्हारी देखो लोगों बारी-बारी-
     ‘आइए आपका इन्तजार था!’ मैं इस वाक्य के माध्यम से इसमें निहित उन भावों को उकेरना चाहती हूँ जो वर्तमान चुनावी परिप्रेक्ष्य में परिलक्षित हो रहे हैं। मेरा आशय चुनाव के इस माहौल से है जिसने शहर से लेकर गावों तक हाय! तोबा! मचा रखी है। ए.सी. कोठियों में रहने वाले, हमेशा स्वच्छ परिधानों से लिपटे नेताओं ने अब अपना रुख गावों और कस्बों की तरफ़ कर लिया है। जहां पूरा का पूरा साल बीत जाता था इनके दर्शन किए अब सर्वत्र ये अति सुलभ हैं आम भोली-भाली जनता को। इस ठंड में भी इनके पेशानी पर पसीने की बूदें आसानी से देखी जा सकती हैं और इनका गावों की मिट्टी से धूल-धूसरित होकर घर-घर जाना और वोट के लिए ग़रीबों के पैरों पर गिर पड़ने की मनोरम छटा फिर पाँच सालों के लिए सपने सा हो जाएगा मैं तो यही सोच कर उलझन में हूँ। आज किए जा रहे इनके वादे और कस्में तथा आम जनता के लिए इनका सम्मानजनक सम्बोधन यथा काका, दादा, भइया, बाबू, दादी, काकी, बहिनी आदि-आदि फिर पाँच सालों के लिए स्वप्न में सुना हुआ मधुगुंजार सरीखे हो जाएगा। फिर तो इनके कटुबचन और गालियां ही निरीह जनता के हिस्से आएंगी। मैं सोचती हूँ कि काश! चुनावी माहौल सर्वथा क़ायम रहे और हम देख पाते रहें इन तथाकथित ग़रीबों के मसीहाओं की ऐसी दयनीय दशा। इनके चुनाव जीत जाने के बाद इन्हें तो मिल जायेंगी ज़न्नत की खुशीयां और हम ग़रीब हो जायेंगे ढाक के दो पात। अभी तो हमारी क़ीमत चुनाव होने के पहले तक दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ रही है। हमारी तो बोली पर बोली लग रही है। फिर शेयर मार्केट की तरह हमारा भी भाव गिरते देरी नहीं लगेगी।
     आज तो गावं भी शहर से कम नहीं हैं किसी भी दशा में। चाहे वादे में ही गावों में बिजली, सड़कों और अन्य आवश्यक सुविधाओं का ही बोल-बाला है। सड़कें भी (जैसी भी हैं) शहरों की सड़कों से कम व्यस्त नहीं हैं और उनपर सवारियां भी कम ठाट-बाट वाली नहीं हैं। यहां की गलियों और सड़कों पर रैलियों का हुज़ूम सा रहता है। यहां सवारियों की बात ही मत पूछिए! कहीं हाथी चिग्घाड़ रही है तो कहीं साइकिल दौड़ रही है। सर्वत्र कमल के फूलों से जनता का स्वागत हो रहा है तो कहीं हाथ उठा कर आशीर्वाद की मुद्रा में लोगों को आश्वस्त किया जा रहा है। सब अपना-अपना गुणगान करते हुए जनता को रिझाने की कोशिश में जी-जान से लगे हैं अर्थ, दण्ड साम, भेद किसी भी साधन से। जनता की इस तरह उच्च-स्थिति चुनावोपरान्त निम्न-स्थिति में परिवर्तित होनी ही है, चूंकि परिवर्तन शास्वत है विधि का यही विधान हमारी सशंकित चित्त-वृत्ति का मुख्य कारण है। सफ़ेद नील लगाये झकाझक परिधानों को पहन, मुख पर बनावटी मुस्कान लिए, हाथ जोड़े और झोली फैलाए सर्वत्र शोभायमान हो रहे हैं नेतागण। आह! उनका यह मनोरम रूप ‘श्वेत पंख सुशील हैं लीलें गपाक-गपाक’।
     ऐसे माहौल में जनता का भ्रमित हो जाना स्वाभाविक है पर मेरा विचार है कि जनता भी अब शिक्षित और होशियार हो गयी है, अच्छे और बुरे की पहचान करने में सक्षम है (नेताओं की सद् इच्छा के विपरीत)। अब यह जनता मूर्ख बनने को तैयार नहीं है जितनी भी कोशिश कर लें नेतागण। कपडों, कम्बलों, और लक्ष्मी-जल की असलियत अब सभी जानने लगे हैं। जनता भी सुनहरा अवसर भला कहां छोड़ने वाली, घर आयी लक्ष्मी का अपमान भी तो नहीं करना। बहती गंगा में हाथ धो लेना कोई बुरी बात थोड़ी है? सो सबका स्वागत। जनता भी जानती है कि यह सुख चन्द दिनों का है। पांच साल तो मूर्ख बनना ही है थोड़ा वक्त मूर्ख बना ही क्यों न लिया जाय। आज हमारी कल तुम्हारी देखो लोगों बारी-बारी।
                                                              -शालिनी पाण्डेय

Thursday 26 January 2012

अबोध बालक के हाथों जूता पहनना अपराध नहीं

     आज के लोगों की सबसे बड़ी कमजोरी उनमें सहिष्णुता का अभाव होना है। आज के लोगों में धैर्य एकदम नहीं रह गया है। बात-बात में लोग तैश में आ जाते है। बात का बतंगड़ बना देते हैं। तिल का ताड़ बना देते हैं। कहानी को उपन्यास बना देते हैं। महत्वहीन घटना को भी ब्रेकिंग न्यूज बना देते हैं। न्यूज वाले बनाए तो बात समझ में आती है कि क्योंकि उन्हें टीआरपी बढ़ानी होती है। लेकिन भाई लोग को क्या बढ़ानी होती है। मै भाई लोग से एक प्रश्न पूछता हूं कि क्या इस देश में कोई नेता या संभ्रांत व्यक्ति किसी अबोध बालक से अपने जूते का फीता भी नहीं बंधवा सकता। इतनी राहजनी कब से इस देश में आ गई है? क्या इस देश मे लोगों को इतनी भी स्वतंत्रता प्राप्त नहीं होगी। आखिर इस देश में कैसा लोकतंत्र है जहां माननीय सदस्यों के अधिकार भी सुरक्षित नहीं हैं। विशेषाधिकार यानी घोटाले करने के अधिकार की बात ही क्या? अन्ना एवं रामदेव की वक्र दृष्टि तो पहले से हीं उन पर है। वे लोग अपने तो राजधर्म के प्रति कर्तव्य से च्युत हो ही रहे हैं। लोगों की भी ऐसा करने को कह रहे हैं। अब तो लोग भी उनके बहकावे में आने लगे हैं। और तरह-तरह से बातें बनाने लगे हैं। मेरा तो मानना है कि इस देश का लोकतंत्र खतरे में है क्योंकि यहां नेताओं के विशेषाधिकार खतरे में हैं। जहां बड़े लोगों के अधिकार सुरक्षित नहीं होगें। वहां छोटे लोगों की हालत कैसी होगी इसकी आप सहज कल्पना कर सकते हैं। किसी नेता द्वारा बच्चे से जूते का फीता बंधवाना भी कोई न्यूज है। यह भी कोई अपराध है मुझे तो नहीं मालूम। भला यह कोई हो हल्ला करने का विषय है। इसके लिए नेताजी की तारीफ़ होनी चाहिए कि नेताजी किसी को रोजगार दे रहे हैं। किसी पर दयादृष्टि कर रहे हैं। । आजकल बेरोजगारी की समस्या कितनी भयानक है। यह तो आप जानते ही होंगे। सरकार हाथ खड़े कर चुकी है। ऐसे में काम प्राइवेट सेक्टर में ही मिलेगा न! सरकारी नौकरी तो सबको मिलने से रही।
     आलोचना करने वाले आखिर यह क्यों नहीं जानते कि बड़ों की सेवा करने से आयु, विद्या, यश और बल  ये चार चीजें बढ़ती हैं। क्या लोग इन चार चीजों से उस बालक को वंचित करना चाहते हैं। आलोचक बच्चे के शुभचिन्तक हैं कि दुश्मन। सरकार को अब इस बात पर ध्यान रखना होगा कि कुछ लोग सरकार के हर काम में मीन-मेख निकालने में लगे हुए हैं। सरकार को स्थिति की गंभीरता को देखते हुए डैमेज कंट्रोल एक्सरसाइज शुरू कर देना चाहिए। ऐसे लोगों  के व्रेनवाश की समुचित व्यवस्था की जानी चाहिए। नहीं तो ये लोग राजधर्म के लिए खतरा पैदा कर देंगे। सरकार एक ट्रेनिंग स्कूल खोले जिसमें लोकपाल के नुकसान एवं भ्रष्टाचार के फायदे बताया जाये।
     जूता पहनाने का तो स्वागत होना चाहिए कि बच्चा अच्छा संस्कार सीख रहा है। बच्चा संस्कारी है। वह बड़ों का सम्मान करना जानता है। कितने दु:ख की बात है कि इस देश में बच्चों की आकांक्षाओं का भी ध्यान नहीं रखा जा रहा है। बड़ों का सम्मान करना कब से इस देश में अपराध हो गया? वह नेताजी के चरणों में शालीनता का पाठ सीख रहा है। यह भी हो सकता है कि उसके माता-पिता उसे बड़ा नेता बनाना चाह रहे हों। और चाहते हों कि बच्चा बचपन से उनके सानिध्य में रहकर नेतागिरी का गुर सीखे।  अच्छे काम की आलोचना करके इस देश में संभावनाओं का गला घोंट दिया जाता है।
     मुझे आलोचकों की आलोचना में साजिश की भी बू आती है। मतलब कि इस देश में एक ऐसा वर्ग भी है जो यह नहीं चाहता कि ज्ञान पर से उसका एकाधिकार समाप्त हो। किसी से कुछ सीखने के लिए शालीनता रखनी पड़ती है, बच्चा वही कर रहा है जी!

Wednesday 25 January 2012

ठंडी-ठंडी ठंड

     ठंडी-ठंडी ठंड आप भी कहेंगे की जब भारत में ठंड जाने को है तब मुझे याद आरही है ठंडी-ठंडी ठंड की तो मैं आपको बता दूँ की अपने भारत में भले ही ठंड कम हो गई हो मगर यहाँ अब भी ज़ोरों पर है और हम देसी होते हुए भी विदेशी कहे जाने वाले लोग ठंड के मारे गरम कपड़े लाद-लाद कर परेशान है  यह गरम कपड़े उलझनों के समान है जैसे उलझनों को जितना भी सुलझाओ जीवन सदा किसी न किसी उलझन में उलझा ही रहता है। ठीक उसी तरह यह गरम लिबास है जितने भी पहनो कम ही लगते हैं। Smile  मगर यहाँ ठंड का भी अपना एक अलग ही मज़ा है। हमारे यहाँ और यहाँ के रहन-सहन में फर्क भी एक अहम कारण है, कि यहाँ कड़ाके की ठंड होने पर भी अखरती नहीं है। अपने यहाँ बेचारे छोटे-छोटे मासूम बच्चे ठंड के मारे कांपते हुए स्कूल जाते हैं और घर वापस आने तक उनको कहीं राहत नही मिलती। मगर यहाँ केवल घर ही नहीं बल्कि कक्षा में भी हीटर लगे होते हैं जहां बाहर की कड़कती सर्दी खाने के बाद कम से कम यहाँ के बच्चों को कक्षा में राहत मिल जाती है।काश ऐसा हमारे यहाँ भी हो सकता तो कितना अच्छा होता।
     खैर हर चीज़ के आपने-अपने फायदे और नुकसान है जैसे यहाँ हीटर चलाना मजबूरी है उसके बिना रहा नहीं जा सकता है। मगर इसका नुकसान यह है, कि घर गर्म और बाहर एकदम फ्रीजी है, जिसके कारण ठंडा-गर्म होता रहता है। यहाँ सबको सर्दी जुकाम होना बहुत ही आम बात है। जिसके कारण यहाँ अधिकतर लोगों को आमतौर पर सर्दी जुकाम बना ही रहता है और जब डॉ के पास जाओ तो वो भी यही कहता है अच्छा सर्दी ज़ुकाम हुआ है आपको welcome to England  Smile खैर हर चीज़ का अपना एक अलग मज़ा होता है , मज़े से याद आया  मुझे यहाँ सबसे ज्यादा मज़ा आता है, ठंड में बच्चों को देखना बहुत ही प्यारे लगते है यहाँ के बच्चे ठंड में एक दम खिलौने की तरह... झक गोरा रंग, सुनहरी बाल, नाक और गाल दोनों ही लाल-लाल  Smile  वैसे तो बच्चे सभी बहुत मासूम और खूबसूरत होते हैं। फिर चाहे वो जानवार के ही क्यूँ ना हो, है ना !!! Smileविषय से ना भटकते हुए मैं बात कर रही थी ठंडी-ठंडी ठंड की, तो यहाँ आज कल का तापमान 0 डिग्री से थोड़ा ही ऊपर चलता है जैसे आज का तापमान ही ले लीजिये आज है अधिकतम 5 और नुन्यतम 1 अब आप खुद ही अंदाज़ा लगा लीजिये की यहाँ कितनी ठंड होगी। वैसे इसे भी ज्यादा गिरता है पारा हर बार मगर फिलहाल इतना ही गिरा है। इसलिए शायद यहाँ ठंड का अपना ही एक मज़ा है रोज़ के कार्य यूं ही ठंड में करना ठड़ भी ऐसी की यदि आप निकाल जाओ बिना मफ़लर के तो कान में दर्द होने लगता है चहरे की मासपेशियाँ भी दुखने लगती है। कई-कई दिन धूप किसी कहते हैं यह पाता ही नहीं चलता।

     वैसे बहुत से लोगों को इस कारण यह मौसम बहुत ही उदासी भरा लगता है तो कुछ को खुशगवार भी लगता है हाँ कभी-कभी दुख दायी भी हो जाता है। जब भी बर्फ गिरा करती है, घर में बैठकर वो नज़ारा देखने में बेहद खूबसूरत नज़र आता है। मगर यदि उसके बाद बाहर निकलना हो तो वही बर्फ इतनी फिसलन वाली हो जाती है, कि चलना मुहाल होता है। मगर इस सबके बावजूद भी यही वो नज़ारा है, जिसे भारत में हर जगह देख पाना संभव नहीं होता और यहाँ (U.K) में लगभग सभी जगह सर्दियों के मौसम में आम बात है। बस यह कह लीजिये कि पिछले पाँच सालों में यह शायद पहली बार हुआ होगा कि अब तक बर्फ नहीं गिरि है। वरना यहाँ तो नवम्बर में ही कड़ाके की ठंड शुरू हो जाती है।

     सब कुछ अच्छा है यहाँ, मगर वो सब कुछ नहीं है जो अपने यहाँ इंडिया में होता है। ठंड आते ही मेथी की भाजी, तो कभी तिल के मिष्ठन, जैसे गज़क आदि तो कभी गरमा गरम मूँगफली सरसों का साग ते मक्के की रोटी वाह वाह !!! मुझे तो याद कर-कर के ही मुंह में पानी आरहा है। मगर यहाँ हर जगह ऐसा कुछ भी नहीं मिल पाता। हाँ कुछ जगह संभव हो भी सकता है जहां भारतीय लोग कि जनसंख्या ज्यादा हो जैसे लंदन में,या लंदन के पास हैरो नामक जो स्थान है वहाँ मगर बाकी जगह मौसम कब बदला गया यहाँ, खाने की चीजों से नहीं बल्कि कपड़ों से पता चलता है। वरना तो बारों महीने वही गोबी, मटर, आलू,और कुछ भी नहीं। यह सब देखकर लगता है सही में नससीब वाले हैं वो जो भारत में रहते है।  Smile  वरना कुछ नहीं रखा है विदेशों में यहाँ केवल दूर के ढ़ोल सुहावने हैं बस और कुछ नहीं असली ज़िंदगी का मज़ा केवल अपने इंडिया में ही है दोस्तों... क्यूंकि यहाँ ना सामाजिक ज़िंदगी है और ना हीं ज़िंदगी के मज़े कुछ है तो वो है भारत की तुलना में कुछ थोड़े ज्यादा पैसे और पैसा सब कुछ नहीं होता इसलिए मेरा भारत महान... जय हिंद                   

Tuesday 24 January 2012

लगता है चुनाव आ गया ...


क्या बताएं आपको, मेरे पास कुछ कहने के लिए वाकई शब्द नहीं है। मैं नेताओं  को छूत की ऐसी बीमारी मानता हूं, जिसका कोई इलाज ही नहीं है, लेकिन इस लाइलाज बीमारी को खत्म करने को लेकर कोई गंभीर नहीं है। मुझे एक कहानी याद आ रही है। आप सब जानते हैं कि भगवान शिव बिल्कुल भोले बाबा हैं, कोई भी आकर श्रद्धा से दो फूल चढ़ा गया तो उसकी बातें भगवान शिव ने ना सिर्फ सुनीं, बल्कि उसकी समस्याओं का एक झटके में समाधान भी कर दिया।
एक बार मंदिर में शिवलिंग के ऊपर लगे, सोने के घंटे को उतारने के लिए एक चोर मंदिर के भीतर  घुस आया। वो इस घंटे को उतारने की कोशिश कर रहा था, लेकिन उसका हाथ वहां तक पहुंच नहीं पा रहा था, इस पर चोर शिवलिंग के ऊपर खडा होकर घंटा उतारने लगा। क्या बात भगवान खुश हो गए और चोर के सामने प्रगट भी हो गए। भगवान ने कहा कि यहां तो तमाम भक्त आते  हैं, मेरे ऊपर महज दो फूल चढाकर चले जाते हैं, लेकिन तुमने तो खुद को ही मेरे ऊपर चढा दिया। बताओ मैं तुम्हें क्या वरदान दूं।

ऐसा ही कुछ दिखाई दे रहा है उत्तर प्रदेश के विधान सभा चुनाव में। नेताओं का क्या रूप दिखाई दे रहा है, बेचारे सुबह से ही हांथ जोड़े जोडे़ थक जा रहे हैं, फिर भी  हाथ  नीचे नहीं करते। उन्हें लगता है कि ना जाने कौन सा मतदाता बेवजह नाराज हो जाए। एक नेता से थोड़ी यारी दोस्ती है तो उन्होंने बताया कि भाई श्रीवास्तव जी सुबह से हाथ जोड़े जोड़े ये हालत हो जाती  है कि रात में गरम पानी से हाथ सेंकना पड़ता है। मैने कहा कि डाक्टर ने बताया है आपको नेतागिरी करने के लिए, क्यों नहीं सुकून ईमानदारी की रोटी खाने की कोशिश कर रहे हैं। कहने लगे श्रीवास्तव जी सच तो यही है कि डाक्टर ने नहीं कहा था कि नेतागिरी करें, लेकिन अब डाक्टरों का कहना है कि नेतागिरी छोड़ी तो मैं ज्यादा दिन जिंदा नहीं रह पाऊंगा।

बहरहाल इस वक्त नेताओं का हाल देखने लायक हैउनकी चोरी, मक्कारी, बेशर्मी, बेईमानी कुछ भी उनके चेहरे से नहीं पढ़ा जा सकता। सभी नेता कोशिश कर रहे हैं कि उनका कुर्ता दूसरे के कुर्ते से ज्यादा सफेद दिखाई दे। आज उत्तर प्रदेश के बाराबंकी में आकर हैरान हो गया। बेचारा राहुल अपनी  और पार्टी की साख को मजबूत करने के लिए दलितों के यहां रोटी खाने के लिए हाथ फैलाए घूम रहा है और उनकी पार्टी के ही दूसरे नेता उसके सपने को चकनाचूर करने में लगे हैं। इस पूरे इलाके में बेनी प्रसाद वर्मा का प्रभाव रहा है, लेकिन ये प्रभाव अभी भी बना हुआ है, इस बात को दावे से नहीं कहा जा सकता। लेकिन कांग्रेस ने बेनी को खुश करने के लिए उनके बेटे से लेकर उनके कई और चेले चापड़ को उम्मीदवार बना दिया। कहा तो यहां तक जा रहा है कि बेचारे पूर्व आईएएस कांग्रेस सांसद पीएल  पुनिया  भी  चाहते थे कि दो एक टिकट उनके करीबियों को भी मिल जाए, पर अपने करीबियों को टिकट दिलवा पाने में कामयाब नहीं हो पाए। यही वजह है कि उनका बाराबंकी प्रेम लगभग खत्म सा हो गया है। बातचीत में तमाम  कांग्रेसी  भले ये कहतें नजर आएं कि कांग्रेस इस बार बेहतर प्रदर्शन करेगी, पर ये शिकायत आम है कि कांग्रेस को यहां सबसे बड़ा खतरा कांग्रेसियों से ही है।

बहरहाल बाराबंकी में हमारा अनुभव बहुत खराब है। ये सीट बहुजन समाज पार्टी की है, पार्टी ने दोबारा उसी विधायक को टिकट दिया है, जो पहले विधायक रहे हैं। बिधायक की हालत ये है जमीन कब्जाने से लेकर तमाम गंभीर आरोपों से वो घिर पड़े हैं। बाराबंकी में 20 घंटे के प्रवास में लोगों की नब्ज टटोलना थोडा मुश्किल है, पर मैने महसूस किया है कि लोगों के पास विकल्प कम हैं। यहां इस गुंडे और उस गुंडे में टक्कर है, जो गुंडा मतदान के दिन बेहतर प्रदर्शन करेगा, उसे ही कामयाबी मिल जाएगी। जिले की सभी विधानसभा सीटों पर नजर डालें तो हम देखते हैं कि एक भी ऐसा उम्मीदवार नहीं है, जिसके लिए मैं कह सकूं कि ये उम्मीदवार बेहतर है, इसे आप वोट कर सकते हैं। सच कहूं  तो हालत ये है कि जितने कान्फीडेंस से सच बात नहीं   कह पाते ये नेता उससे दोगुने कान्फीडेंस से झूठ बोल रहे हैं। सच कहूं मेरा मानना रहा है कि मताधिकार का प्रयोग जरूर करना चाहिए, लेकिन जिस तरह के उम्मीदवार हैं, मैं  कह सकता हूं कि अगर आपको कोई जरूरी काम निपटाना है तो उसे  प्राथमिकता दें, ये चुनाव है, हर पांच साल पर यूं ही होता रहेगा। 


Monday 23 January 2012

चुनावी चौके

दलदल में यह देश क्यूँ, भला न धँसता जाय ।
हर दल  खड़ा  धकेलता, अब हो  कौन उपाय ।
अब  हो  कौन  उपाय,  सभी  बाहर  से  चंगे ।
मगर यहाँ हम्माम में, हैं  सब  के  सब  नंगे ।

सभ्य - वेश  में  बड़े-बड़े  मुस्टंडे   आये हैं ।
झूठ  और  मक्कारी  के  हथकंडे   लाये हैं ।
जनता की आँखों को,चुँधियाने की खातिर,
साथ  में  अपने  रंग-रंग के  झण्डे लाये हैं ।

अच्छी नज़र हो और न हो कान का कच्चा ।
जीतकर पब्लिक को कभी दे न जो  गच्चा ।
भ्रष्टाचरण  से  दूर हो , छवि पाक-साफ़ हो ,
नेता वही चुनिए  जो हो  ईमान का सच्चा ।

Sunday 22 January 2012

मौसमे -चुनाव

इस मौसमे -चुनाव में , चलें हैं दाव-पेंच |
एक दूसरे की सभी , टांग रहे हैं खेंच ||
टांग रहे हैं खेंच , शरीफ खुद को बताते |
विरोधी की सदैव , हैं बुराइयां दिखाते ||
पाना चाहें वोट , रहें द्वारों पर सिर घिस |
नेता सारे आज , पूजने बैठे उस - इस ||

* * * * *

Saturday 21 January 2012

जन-जेब्रा की दु-लत्ती में बड़ा जोर है -

सत्ता-सर  के  घडियालों  यह  गाँठ बाँध लो,
जन-जेब्रा   की   दु-लत्ती   में   बड़ा  जोर है |

 


बदन  पे  उसके  हैं  तेरे  जुल्मों  की  पट्टी -
घास-फूस  पर  जीता  वो,  तू  मांसखोर है || 



तानाशाही    से    तेरे     है     तंग  " तीसरा"
जीव-जंतु-जग-जंगल-जल पर चले जोर है |



सोच-समझ कर फैलाना अब  अपना जबड़ा
तेरे  दर   पर    हुई   भयंकर  बड़-बटोर  है |

File:NileCrocodile.jpg
पद-प्रहार से    सुधरेगा   या   सिधरेगा   तू
प्राणान्तक  जुल्मों  से  व्याकुल  पोर-पोर है |

Friday 20 January 2012

उफ्!! ये चैनलिया बाबा!!!

     दोस्तों! आजकल टीवी के लगभग सभी चैनलों पर किसी न किसी बाबा की उपस्थिति अनिवार्य सी हो गयी है। पता नहीं यह हमारी मानसिक कमजोरी के सबब है या हमारी भलमनसाहत का नतीज़ा। कोई भी चैनल खोलिए तो कोई न कोई बाबा अवश्य हमें सम्पूर्णता के प्रति अग्रसर करते दिखाई ही दे जायेंगे। टीवी चैनलों के माध्यम से ही ये बाबा विश्वव्यापी हैं अब इन्हें योग-तप आदि करने की आवश्यकता नहीं रही। टीवी चैनलों को अपनी टीआरपी बढ़ानी होती है और हमारी सहज-प्राप्ति की अपेक्षा सो लगभग सभी चैनल इस हेतु बाबाओं पर निर्भर से हो गये हैं और बाबा लोगों को भी अनायास प्रचार-प्रसार के साथ अकूत धन की प्राप्ति भी हो जा रही है।
     वैसे तो प्रभु की कृपा हमें चाहिए ही कौन नहीं चाहता कि घर बैठे-बैठे सुख, समृद्धि और ऐश्वर्य की प्राप्ति हो पर अब तो इन चैनलिया बाबाओं के माध्यम से और भी सहज सुलभ हो गया है। टीवी खोलिए और चैनल बढ़ाते जाइये, विभिन्न चैनलों पर अलग-अलग बाबाओं से मिलते जाइये, बस फिर क्या...दिल की मांगी मुराद पूरी। राहु-मंगल की दशा हो या शनि का प्रकोप, शादी नहीं हो रही हो, सन्तान की आकांक्षा हो या फिर लक्ष्मी की आवश्यकता, सब कुछ बड़ी सहजता से उपलब्ध करा देते हैं ये चैनलिया बाबा। इन बाबाओं का हृदय बड़ा विशाल होता है ये वहीं से हर समस्या के समाधान के साथ अपना आशीर्वाद भी देते हैं। कोई पत्थर पहनने को कहता है तो कोई प्लांट लगाने के लिए आदि आदि। पर ये सभी चीजें आप उनके आश्रम से लेंगे तभी वह फलदायी होंगी। क्योंकि वहां से आने पर उसमें उन बाबाओं का आशीर्वाद भी जो मुफ्त में शामिल हो जाता है। बस खर्चा केवल उन अमूल्य बस्तुओं का ही आपको चुकाना है। वही वस्तुएं आप बाहर से लिए तो वह तासीर उनमें नहीं हो सकती ऐसा कहना है बाबाओं का। उनकी अपनी निजी वेबसाइट भी होती है और उनकी शॉप भी आप वहीं से घर बैठे मगा सकते हैं वे वस्तुएं जो आपके लिए मुफ़ीद हैं। आपको बहुत मेहनत नहीं करनी है घर बैठे आर्डर करिए और पा जाइये। उनके एकाउण्ट में पैसे भेज दीजिए और हो गया आपका कल्याण।
     वैसे मैं सोचती हूँ कि जब धरती पर इतने चमत्कारी बाबा हैं ही तो भगवान की पूजा क्यों? भगवान भी इन बाबाओं के कारनामों को देखकर सोचते होंगे कि चलो अच्छा हुआ इन बाबाओं की अहेतुकी पैदाइश से हमारा काम हल्का हो गया। वरना भोली-भाली विश्वासी जनता के लिए हमें ही मरना-खपना पड़ता था रातो-दिन। इन बाबाओं की उत्पत्ति ने मीडिया का फ़ायदा कराया और मीडिया ने बाबाओं को विश्वव्यापी बनाया। बस दो चाकी के बीच में फंसी है बेचारी सीधी-सादी गंवार जनता। मज़ा यह कि उसका शारीरिक, मानसिक, आर्थिक तथा भावनात्मक दोहन किया जा रहा है इन सयानों द्वारा मूर्ख बनाकर उसी की इच्छा से और उसे पता भी नहीं। बेचारी जनता!!!
(सभी चित्र गूगल से साभार)
                                                    -शालिनी

Thursday 19 January 2012

छल- कपट की राजनीति से

छल- कपट की राजनीति से
पार्टियों का नहीं है दूर-दूर का नाता 
बस आरक्षण की राजनीति हीं इन्हें है भाता 
शुचिता की राजनीति में हो रहा था घाटा
जिसे कुछ नेताओं ने घोटाला करके पाटा 
नहीं तो राजनीति में शायद हीं कोई आता 
महामूर्ख हीं पैसा पानी की तरह बहाता
आज हर कोई  राजनेताओं पर है आरोप लगाता
जिन्ना की राजनीतिक महत्वकांक्षाओं को 
देश के बंटवारे का है कारण बताता 
नेताओं के बांटो एवं राजकरो के प्रभाव में
 नहीं आने का संकल्प दोहराता 
लेकिन चुनाव के वक्त मुस्लिम आरक्षण का जप 
जब नेता करता एवं  करवाता
भाईलोग अपने संकल्प को भूल जाता 
और  मृगमरीचिका  में आ जाता 
अपने वोट को पानी में डाल आता 
फिर नेतालोग को  पांच साल गरियाता
क्षेत्र की अनदेखी करने का है आरोप लगाता 
शायद इसी से अच्छे लोग राजनीति को  कर रहे हैं टाटा 
उन्हें राजनीति में नजर आता   है ज्वार-भाटा 
फिलहाल सभी पार्टियों ने उत्तर प्रदेश चुनाव में 
अपराधियों को है थोक में टिकट बांटा 
यानी राजनीति में अच्छे लोगों की कमी को
उन्होंने  बाहुबलियों से है पाटा   


Wednesday 18 January 2012

रिश्वतखोरी


रिश्वतखोरी की जड़ें, फैली हैं चहुँ ओर।
मौका मिलता है जिसे, बनता रिश्वतखोर।।
बनता रिश्वतखोर, दूध का धुला न कोई।
जनता हो बेहाल, खून के आंसू रोई।।
कहे विर्क कविराय, हमारी ही कमजोरी।
बनी है अमरबेल, देश में रिश्वतखोरी ।।


------ दिलबाग विर्क

* * * * * 

Tuesday 17 January 2012

नहीं चाहिए सचिन का महाशतक ...

मुझे इसी बात का डर था, कि कहीं सचिन अपने  खराब प्रदर्शन से लोगों के निशाने पर ना जाएं और वही हुआ। देश भर में ना सिर्फ सचिन बल्कि राहुल द्रविण, बी बी एस लक्ष्मण और वीरेंद्र सहवाग को लेकर गुस्सा देखने को मिल रहा है। हालत ये हो गई है कि जो क्रिकेट प्रेमी कल तक सचिन को भारत रत्न देने की मांग कर रहे थे, वो इतने खफा  हैं कि अगर सचिन को भारत रत्न मिल गया होता तो वे भारत रत्न वापस लेने की मांग करते हुए सड़कों पर उतर जाते। अरे भाई देश में क्रिकेट सिर्फ एक खेल भर नहीं है। क्रिकेट प्रेमी इसे अपना धर्म मानते हैं और धर्म की रक्षा के लिए किसी हद तक जा सकते हैं। मैने देखा कि कल तक सचिन को क्रिकेट का भगवान कहने वाली मीडिया पहली दफा सचिन पर उंगली उठाने की हिम्मत जुटा पाई।

आमतौर पर सचिन की खामियों को ढकने वाली मीडिया पहली दफा बैकफुट पर नजर आई, वो भी इसलिए तमाम दिग्गज खिलाड़ियों ने टीम के खिलाफ आवाज बुलंद कर दी। वैसे महान क्रिकेटर सुनिल गावस्कर बहुत पहले ही कह चुके हैं कि खिलाड़ियों को अच्छे फार्म में रहने के दौरान सन्यास ले लेना चाहिए, जिससे लोग ये कहते फिरें कि अभी  क्यों सन्यास ले लिया,  अभी तो बहुत क्रिकेट बाकी है। ऐसा मौका नहीं देना चाहिए कि लोग पूछने लगें कि " अरे भइया सन्यास कब ले रहे हो " ? आज सचिन ही नहीं राहुल द्रविण और लक्ष्मण की यही हालत हो गई है कि लोग पूछने लगे हैं कि आखिर कब मैदान से बाहर होगे।

अब एक  बात तो पूरी तरह साफ हो गई है कि सचिन समेत तमाम खिलाड़ी 2015 में होने वाले वर्ल्ड कप में नहीं खेल पाएंगे, ऐसे में हम वर्ल्ड कप की टीम अभी से क्यों नहीं तैयार कर रहे हैं। आज क्रिकेटप्रेमी सवाल कर रहे हैं कि सचिन तेंदुलकर टीम में क्यों हैं? जवाब सिर्फ एक है कि उन्होंने देश के लिए बहुत खेला है, अब उन्हें महाशतक बना लेने देना चाहिए। मैं कहता हूं कि महाशतक की कीमत क्या है, हम कितने दिनों तक और कितने मैच गंवाने को तैयार बैठे हैं। क्या सचिन की नाक देश की नाक से ज्यादा अहमियत रखती है। मुझे लगता है कि इसका जवाब है नहीं। टीम के चयन की जिम्मेदारी जिनके पास है, उनका कद ही उतना बडा नहीं है कि वो सचिन के बारे में फैसला करें, लिहाजा ये फैसला अब सचिन को ही करना होगा। आस्ट्रेलिया से लौटकर उन्हें क्रिकेट के सभी फार्मेट को अलविदा कहकर मुंबई इंडियंस के लिए टी 20 तक ही खुद को समेट लेना चाहिए। 

सचिन की  आड़ लेकर और खिलाडी बच जाते हैं। अब राहुल द्रविण को मजबूत दीवार कहना बेईमानी है। इसी तरह जिस बी बी एस लक्ष्मण से कंगारू डरते थे, उस लक्ष्मण ने कंगारुओं के सामने घुटने टेक दिए हैं। अब लक्ष्मण से कंगारु नहीं बल्कि कंगारुओं से अपना लक्ष्मण डर रहा है। भाई ये ठीक  बात है कि वीरेंद्र सहवाग अच्छे खिलाड़ी हैं, लेकिन मुझे लगता है कि वो भरोसेमंद खिलाड़ी बिल्कुल नहीं हैं। 10 पारियों में खराब प्रदर्शन कर अगर एक पारी में रन बना देते हैं तो मुझे नहीं लगता कि सहवाग को भी टीम में रहना चाहिए। बहुत नाक कट चुकी है, दुनिया भर के खिलाड़ी हमारी टीम पर छींटाकसी कर रहे हैं, सारी सचिन अब हमें आपके महाशतक में कोई रुचि नहीं रह गई है। 

बदबू आती है यूपी की राजनीति  से ...


चुनाव जीतना है मकसद, तरीका कुछ भी और कैसा भी हो। सच कहूं तो इस समय नेताओं की बातों में इतनी गंदगी भरी हुई है कि इनका नाम भर सुनकर बदबू आने लगती है। अब देखिए अपने जन्मदिन पर भी मायावती शालीन नहीं रह पाईं। तर्क भी ऐसे बेपढों वाली देतीं हैं कि हैरानी होती है। सच कहूं तो चुनाव आयोग ने मायावती का बहुत पक्ष लिया, वरना उन्होंने जिस तरह से सरकारी पैसे का दुरुपयोग करके जगह जगह अपनी और पार्टी के चुनाव निशान हाथी की मूर्ति रखवा दी, उसकी सजा इन मूर्तियों को ढकना भर नहीं है। सजा तो ये होनी चाहिए कि मायावती को जीवन भर के लिए चुनाव लड़ने के अयोग्य कर दिया जाना चाहिए। इतना ही नहीं पार्टी का चुनाव निशान भी बदल देना चाहिए। ऐसा नहीं है कि ये बात मायावती नहीं जानती हैं कि उन्होंने कितना बड़ा अपराध किया है, लेकिन कुतर्क देखिए, कि अगर ऐसा है तो लोकदल का चुनाव निशान हैंडपंप भी सरकारी खजाने से लगा है, उसे भी ढक दिया जाए। मायावती ऐसी घटिया बातें जान बूझ कर करती हैं, क्योंकि जो उनके वोटर हैं, उन्हें ऐसी ही सतही बातें समझ में आती हैं।


एक ओर जब देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ इतना बड़ा आंदोलन छिड़ा हो और वो चुनाव का मुद्दा बन रहा हो, तब ऐसा काम बीजेपी ही कर सकती है कि एक बेईमान नेता बाबू सिंह कुशवाहा को अपनी पार्टी में शामिल करे। ऐसे में जब बीजेपी कहती है कि उसका चाल चरित्र और चेहरा दूसरी पार्टियों से अलग है, तो मुझे भी लगता है कि वाकई अलग है। ऐसा करने की हिम्मत और पार्टी तो बिल्कुल नहीं कर सकती। अच्छा भाजपाई अपने कुकृत्यों के बचाव में भी देवी देवाताओं को इस्तेमाल करने से नहीं चूकते। बाबू सिंह कुशवाह को लेने के बाद भाजपा से जब पूछा गया कि इससे पार्टी की छवि पर खराब असर नहीं पड़ा, तो पार्टी के एक नेता ने कहा कि गंगा मइया में हजारों गंदे नाले आकर मिलते हैं तो क्या गंगा मइया मैली हो गई, उसकी पवित्रता खत्म हो गई ? शाबाश.. भाजपाइयों आपका कोई जवाब नहीं। इसीलिए अभी तीसरे नंबर की पार्टी है, इस चुनाव में क्या होगा, भगवान मालिक है।


कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव राहुल गांधी बहुत मेहनत कर रहे हैं उत्तर प्रदेश में। उन्हें लग रहा है कि उनकी पार्टी बहुत बेहतर प्रदर्शन करेगी इस चुनाव में। पर राहुल को कौन समझाए कि वो बेचारे जितना मेहनत करते हैं उनकी पार्टी के नेता दिग्विजय सिंह उस पर पानी फेर देते हैं। राहुल अच्छा माहौल बना रहे थे कि श्री सिंह ने राहुल के किए कराए पर पानी फेर दिया। अरे क्या जरूरत थी इस समय बाटला हाउस मामले की चर्चा करने की। बाटला हाउस की चर्चा से श्री सिंह सुर्खियों में जरूर आ गए, लेकिन वोट में इजाफा बिल्कुल नहीं  हुआ है। वैसे दिग्विजय मुझे तो किसी गंभीर बीमारी के शिकार लगते हैं, उनसे जनता जितनी दूर रहे वही अच्छा है। उनके पास मीडिया वाले बस इसीलिए जाते हैं कि कुछ आंय बांय शांय बोल देगें तो पूरे दिन का काम हो जाएगा।


अब बची समाजवादी पार्टी। मुझे लगता है कि अमर सिंह से छुटकारा पाने के बाद पार्टी थोड़ा विवादों से दूर है। वैसे युवा नेता अखिलेश की मेहनत कितना रंग लाएगी, ये तो  चुनाव के नतीजों से पता चलेगा, पर डी पी यादव को पार्टी में लेने से इनकार कर अखिलेश ने ये तो साबित कर दिया है कि वो सही मायने में पार्टी के अध्यक्ष हैं और वो जो ठीक समझते हैं वहीं करेंगे। इन सबके बाद भी तमाम अपराधी छवि वाले लोग पार्टी का टिकट पाने में कामयाब हो गए हैं, इसलिए सपा को भी पाक साफ कहना गलत ही है।
बहरहाल यूपी के लोगों से एक सवाल पूछता हूं। यूपी के साथ चार और राज्यों में भी चुनाव हो रहे हैं , क्या आपको वहां की कोई खबर है ? मुझे लगता  है कि कोई खबर नहीं होगी, क्योंकि वहां ऐसा कुछ है ही नहीं जो खबर बने। लेकिन आपको पता है यूपी के चुनाव की खबरें देश भर के अखबारों की सुर्खियों में है। इसलिए सबको पता है कि यूपी में क्या हो रहा है। नेताओं का बायोडाटा, कितने अपराधिक मामले, सबसे पैसे वाली दलित मुख्यमंत्री, रोजाना यूपी में करोडों रुपयों का पकड़ा जाना, असलहों की बरामदगी, नेताओं की दंबंगई, गांव गांव शराब की बरामदगी सब कुछ तो है सुर्खियों में। सही बताऊं बदबू आ रही है यूपी के चुनाव से, लेकिन क्या करुं मुझे भी पूरे एक महीने इन्हीं बदबूदार नेताओं के साथ बिताना है। भगवान भला करें।






Monday 16 January 2012

....चुनाव का मौसम

लो,आ गया...... चुनाव का मौसम |
वोट के ...  मोल-भाव  का मौसम |

चकाचक दिख रही खादी की चमक ,
दल बदल... ठाँव ठाँव , का  मौसम |

एक  दूजे  पे ...........फेंकते कीचड़ ,
छुट्टा भैंसों के ....चाव का मौसम |

सिर्फ कहते हैं......नहीं सुनते कुछ ,
कौवों के काँव-काँव.... का मौसम |

जाति-मज़हब के......उठ रहे झण्डे ,
है दिलों के .......दुराव  का  मौसम |

पञ्च-परधान .........रंग  बदले  हैं,
यही बदलेंगे .......गाँव का मौसम |

Sunday 15 January 2012

त्यौहार एक रूप अनेक ....

     कितनी अजीब बात है ज़िंदगी और समय किसी के लिए नहीं रुकते चाहे आपके जीवन में कुछ भी क्यूँ न घटित हो जाये। इसलिए मेरा ऐसा मनना है कि ज़िंदगी और वक्त एक ही सिक्के के दो पहलुओं की तरह हैं। जीवन में हमेशा आने वाला पल जाने वाला होता है क्यूँकि वक्त किसी के लिए नहीं ठहरता जैसे हवा उसका भी कोई आशियाँना नहीं होता। खैर बात जब ज़िंदगी को हो और उसमें यादों का जिक्र ना हो, ऐसा तो हो ही नहीं सकता। यादें जो सभी के पास होती है। कुछ खट्टी ,तो कभी कुछ मीठी भी, जो अक्सर समय-समय पर आकर हमारे मन की कुलबुलाहटों का कारण बन जाती है। कुछ अच्छा जो कभी आतित में हुआ हो, अक्सर वैसा ही कुछ हम वर्तमान में भी चाह ने लगते है और उस चाहत को पाने के लिए मन कुलबुलाने सा लगता है कभी-कभी, मेरे साथ तो अक्सर ऐसा होता है और मुझे यकीन है आपके साथ भी ज़रूर होता होगा।
     मेरे साथ अक्सर ऐसा तब होता है जब कोई त्यौहार नजदीक आरहा हो, जैसे आज मकर संक्रांति है,मेरे मन में उसे जुड़ी बहुत सारी यादें हैं। मैंने बचपन से लेकर भारत में रहने तक इस एक भोपाल से पुणे तक मैंने इस तौहार के कई अलग-अलग रूप देखे हैं। भोपाल के पास एक स्थान है भोजपुर जहां बहुत बड़ी शिवजी की मूर्ति है आप सभी ने वहाँ का नाम ज़रूर सुना होगा। हर साल संक्रांति के दिन वहाँ मेला लगता है और आस पास के ग्रामीण वहाँ अपनी-अपनी चीज़ें बेचने आते है पतंग बाज़ी भी होती है। सच बहुत मज़ा है, हम लोग तो हर साल वहाँ पिकनिक मनाने के अंदाज़ से जाया करते थे। बिना वहाँ जाये पता ही नहीं चलता था कि संक्रांति का त्यौहार मानया भी है हम ने, उस दिन घर का माहौल सुबह से ही बड़ा धार्मिक महसूस हुआ करता था। सबसे पहली शर्त होती थी पानी मे तिल डालकर ही नहाना है। फिर दान-पुण्य करने के बाद ही कुछ खाने पीने को मिला और जो जितना देर से नहाये गा उसे उतनी देर तक  कुछ खाने-पीने को नहीं मिलेगा और जो आलस कर गया वो लंका का गधा बनेगा अगले जन्म मे ऐसी मान्यता है। यह भी कहा जाता है कि संक्रांति के दिन से सूर्य की दिशा बदल जाती है और दिन तिल-तिल करके बड़ा होना शुरू हो जाता है। तभी शायद वो कहावत भी बनी होगी-
"महा तिला तिलवाड़े फगुना गौड़ पसारे" 
     अर्थात तिल-तिल करके दिन बढ़ता चला जाता है फागुन आने तक, हो सकता है यहाँ मुझ से कोई भूल हो रही हो मुझे ठीक से याद नहीं है यदि आप लोगों को याद हो तो कृपया टिप्पणी के माध्यम से मुझे याद दिलाये। हाँ तो हम बात कर रहे थे संक्रांति महोत्सव की तो भई लंका का गधा बनने से तो अच्छा है नाहा लिया जाये फिर पूजा पाठ और दान-पुण्य के बाद तयारी होती थी मेले में जाने की यह सब भोपाल का चलन हैं मगर पुणे में मैंने बहुत अलग माहौल देखा इस त्योर का वहाँ सुबह से सारी महिलायें नहा धोकर साज श्रिंगार कर मंदिर जाती है प्रसाद  में तिल गुड से बनी कोई मिठाई का भोग लगाया जाता है घर पर तरह -तरह के पकवान बनाये जाते हैं जैसे श्रीखंड ,तिल गुड के लड्डू ,चीवड़ा इत्यादि हल्दी कुमकुम का भी चलन है आज के दिन महाराष्ट्र में जिसमें सुहागन स्त्रियॉं को घर पर बुलाकर खिलाया पिलाया जाता है हल्दी और कुमकुम का तिलक लगा कर उनका सम्मान किया जाता है कुछ लोग इत्र भी लगाते हैं और उपहार में भी कुछ न कुछ दिया जाता है। सच कितना अच्छा देश है अपना जहां हर संस्कृति और सभ्यता को पूरा-पूरा मान और सम्मान दिया जाता है बिना किसी भेद भाव के आज हजारों मत-भेद होने के बावजूद भी त्यौहारों पर अनेकता में एकता को बड़ी ही सहजता से आज भी देखा जा सकता है। इन सभी त्यौहारों के मानये जाने का एक मात्र कारण है नई फसल का आना इस ही त्योहार का एक और रूप है लौहड़ी इसमें भी मक्के ,मूँगफली,और तिल से बनी रेवड़ी ही बांटी जाती है यह पंजाब के मुख्य त्यौहारों में से एक है और संक्रांति के एक दिन पहले मनाया जाता है। कहने का मतलब त्यौहार का एकमात्र कारण एक नई फसल का आना मगर उसके मनाये जाने के रूप अनेक इसलिए तो मैं कहती हूँ सारे जहां में कहीं नहीं है दूसरा हिंदुस्तान क्यूंकि मेरा भारत महान॥ जय हिन्द                       

Saturday 14 January 2012

टोटे-टोटे टाट, जीत ले लगा पलीता--

मोह लगे, माया ठगे, जगे कमीशनख़ोर।

सत्ता शक्ती के सगे, चमचे, लीचड़, चोर।

चमचे, लीचड़ चोर, घोर शैतानी बेला।

रविकर रहा अगोर पुनः बिरतानी खेला।

जाति-धर्म में बांट ठाठ से जीवन जीता।

टोटे-टोटे टाट, जीत ले गया पलीता।।

File:BambooKyoto.jpg

Friday 13 January 2012

तो दादा कांट! फिर से आज के परिप्रेक्ष्य में कोई नया नीतिशास्त्र गढ़ो ताकि हम आत्म-सम्मान की रक्षा करते हुए सम्मान पूर्वक जी सकें

     बचपन में मेरे गुरुजनों के द्वारा पता नहीं क्यों नसीहत दी गयी थी कि किसी भी जीवात्मा को कष्ट न दो यहां तक कि अपनी आत्मा को भी नहीं, आत्म-सम्मान के साथ जीओ। सो मैं मूढ़मति चल पड़ी उसी लकीर पर। किन्तु आज जब मैं जीवन और समाज से दो-चार हुई तो जाना और माना भी कि आत्म-सम्मान नहीं बल्कि सम्मान से जीना हमारा अभीष्ट होना चाहिए, यही आज की प्रवृत्ति है। पहले तो मैं यह मानती थी और जैसा कि गुरुजनों ने बताया भी था कि अगर आत्म-सम्मान है तो सम्मान स्वतः पास दौड़ा आएगा पर यथार्थ में ऐसा नहीं है। सम्मान होना आवश्यक है आत्म-सम्मान भले ही दांव पर लग जाये। सम्मान ही जीवन की मुख्य शर्त बन गया है। उसको कैसे भी प्राप्त करना ही है। यद्यपि यह सही है कि यदि हममें आत्म-सम्मान है तो सम्मान भी वहीं होना चाहिए पर यह विरोधाभास कहां से आया विचारणीय प्रश्न है लेकिन वास्तविकता यही है कि वर्त्तमान में आत्म-सम्मान और सम्मान सहचर नहीं हैं और आवश्यक बन गया है सम्मान के साथ जीना न कि आत्म-सम्मान के।
     इमैन्युअल कांट, जिसे आधुनिक दार्शनिकों में नीतिशास्त्र का पुरोधा माना जाता है और उसके प्रत्येक वाक्य को कसौटी के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है, ने कहा कि- ‘आत्मा स्वयं साध्य है इसे साधन मत बनाओ! आत्मा को साधन बनाकर किया गया सभी कृत्य अनैतिक हो जाता है’ और मैंने मान लिया कि कांट कह रहा है तो सही ही कह रहा होगा। हमारी बुद्धि ने भी यही तथ्य स्वीकार कर लिया। किन्तु आज यदि हम अपनी आत्मा को साधन के रूप में प्रयुक्त नहीं करते तो सम्मान पूर्वक जी ही नहीं सकते। सम्मान से जीने के लिए आत्मा को गिरवी रखना ही है, कुछ ऐसी व्यवस्था ही बन पड़ी है जो कि सर्वस्वीकृत भी है। आत्मा को साधन के रूप में इस्तेमाल करने का एक माक़ूल उदाहरण है चापलूसी करना। चापलूसी जैसा आवश्यक (अब) कार्य करते समय अपनी आत्मा को गिरवी रखकर निकृष्टतम सत्ता की भी वाहवाही और पूजा करनी ही है हमको यदि सम्मान पूर्वक जीना है। यह मज़बूरी भी है और अब फ़ितरत भी बनती जा रही है।
     आज प्राकृतिक शक्तियों से लेकर देवी देवताओं तथा अपने से शक्तिमान मनुष्यों तक की पूजा और चापलूसी करना हमारी आदत में शुमार हो गया है। और प्रत्यक्ष रूप से हमें लाभ भी मिल रहा है। ज्योतिषी महोदय कहते हैं कि राहु या शनि रुष्ट हैं, सूर्य का प्रकोप है कुछ टेढ़े हैं अतः उनकी आराधना और बड़ाई के मन्त्र जपो, तो बाबू जी अथवा साहब जी को ख़ुश करो, कुछ चढ़ावा चढ़ावो काम हो जाएगा। हम ऐसा करते हैं और काम हो जाता है। हम जी रहे हैं शान से। भले ही निकृष्टतम ग्रह अथवा बाबू, साहबों की पूजा-अर्चना करनी पड़े आत्मा को गिरवी रखकर। तो दादा कांट! फिर से आज के परिप्रेक्ष्य में कोई नया नीतिशास्त्र गढ़ो ताकि हम आत्म-सम्मान की रक्षा करते हुए सम्मान पूर्वक जी सकें।

(सभी चित्र गूगल से साभार)

                                           -शालिनी

Thursday 12 January 2012

नेताजी का जयमंत्र कल्याणकारक है

बेरोजगारी की बात करना नाहक है।
सरकार की अक्षमता की बात करना संहारक है।
रामलीला मैदान जैसा कष्टदायक है।
निगमानंद जैसा हश्रदायक है
नेताजी का जयमंत्र कल्याणकारक है
उनके गुणों का गुणगान करना फलदायक है।
उनकी परिक्रमा करना भवतारक है।
और विरोध करना मोक्षकारक है।

Wednesday 11 January 2012

कुछ उलझे हुए विचारों से उत्पन्न कुछ सवाल .....


कहने को फिर 26 जनवरी आने वाली है जिस दिन हम अपना स्वनिर्मित संविधान आत्मार्पित कर अँग़्रेजी कानूनों से भी स्वतन्त्र हो गये थे इस विषय पर बहुत सोचने  पर मुझे ऐसा लगा जैसे मैं कुछ सवालों के घेरे में बस उलझती ही चली जा रही हूँ। क्या मेरे इन सवालों का कोई जवाब है आपके पास...? आज हमारे देश को आज़ाद हुए इतने साल हो गये मगर क्या वाकई आज भी हम उसी श्रद्धा से मनाते हैं इस राष्ट्रीय पर्व को ? क्या दे पाते है इस त्यौहार को वही मान- सम्मान जो वास्तव में हमे इसे देना चाहिए...शायद नहीं कम से कम यदि मैं अपने दिल कि बात कहूँ तो ज़रा भी नहीं सिर्फ़ 26 जनवरी पर जोश भरे गीत गा लेने या सुन भर लेने से, या मिठाइयाँ बांटने भर से ही पूरा नहीं हो जाता देश के प्रति हमारा कर्तव्य। यह त्योहार हम हिंदुस्तानियों के लिए उतना ही महत्वपूर्ण होना चाहिए, जितना कि हमसे जुड़े हमारे रिश्ते, हमारी ज़िंदगी,वास्तव में नए साल की तरह इस दिन भी हमको देश के प्रति अपने फर्ज़ और कर्तव्यों का पालन करने का प्रण लेना चाहिए। जो शायद हम लेते तो हैं, मगर कभी उस पर ईमानदारी से चल नहीं पाते। आज कल तो इन नेताओं कि वजह से, तो प्रण के भी मायने बदल गए है।

हालाकी इस दुनिया में सभी लोग एक से नहीं होते अगर बुरे लोग हैं, तो इस दुनिया में अच्छे लोगों की भी कमी नहीं है। मगर साधारण तौर पर नज़र उठाकर देखो तो कहीं कोई अच्छा होते हुए भी अच्छा नज़र नहीं आता। हर किसी पर विश्वास से पहले संदेह होता है, क्यूंकि ना जाने ज़िंदगी में आगे चलकर कौन कैसा निकले। यूँ तो ज़िंदगी है ही एक जुआ जहां हर एक मोड़ अपने आप में कौन सी गहराई लिए खड़ा है, यह कोई नहीं जानता मगर चलना सभी को उसी पथ पर है। तो मैं कहती हूँ जब ज़िंदगी के छोटे-छोटे फैसलों को ध्यान में रखते हुए हम हर कदम सूझ-भुझ और सावधानी से रखते हुए जीवन पथ पर आगे बढ़ते हैं, तो क्या ऐसा ही कोई मार्ग हम देश की सेवा के लिए नहीं खोज सकते, कि सभी उस पर चलने के लिए बाध्य हों सकें और बंधन के कारण ही सही मगर देश प्रेम की ,देश-सेवा की सही राह पर चल सकें। हालाकी भक्ति कभी किसी से ज़ोर जबर्दस्ती से न कराई गई है और ना ही कभी कराई जा सकती है। वह  तो मन की भावना है, आपकी अपनी श्रद्धा जिसे जबरन उत्पन्न नहीं किया जा सकता। ठीक भगवान के लिए हुई उत्पन्न श्रद्धा की तरह जो जबरन नहीं लाई जा सकती।

मगर जैसे बचपन में होता है जब हमको पता भी नहीं होता कि श्रद्धा और आस्था किस चिड़िया के नाम है हम बस नियमानुसार रोज़ मंदिर जाया करते है और धीरे-धीरे वही आदत कब आस्था और विश्वास में बदल जाती है पाता ही नहीं चलता। काश ठीक इसी तरह कोई ऐसा मार्ग निकाल सकता, कि पहले लोगों को देश प्रेम की आदत डलवाई जा सकती और फिर वही आदत भी धीरे-धीरे देश-भक्ति में बदल सकती जैसे आज़ादी से पहले लोगों में देश-प्रेम की भावना जगाई गई थी। जो जंगल की आग की तरह बस बढ़ती ही चली गई थी और मेरा ऐसा मानना है, कि एक मात्र वही कारण था कि आज हम आज़ाद है। मगर अफसोस कि आज हमको हमारी उसी आज़ादी का मोल नहीं पता तभी तो केवल एक दिन दिल में जोश भर कर तिरंगा लहराने, मिठाई खाने और बांटने, देश भक्ति के गीत सुनने और सुनाने, को ही हम आज़ादी का त्योहार माना लेना मानते हैं। जब कि यदि अपने अंदर झांक कर देखा जाये ईमानदारी से तो शायद हर कोई यही पाएगा कि आखिर कहाँ जा रहे हैं हम ... न प्रकृति का साथ निभाया है हमने, न ही देश का ,न धर्म का, यहाँ तक कि इंसानियत के धर्म को तक भूल चुके हैं हम, क्या यही आज़ाद और उन्नत भारत कि पहचान है ? क्या यही वह कारण हैं जिनके आधार पर हम खुद को एक सच्चा देश-प्रेमी या देश-भक्त कह सकते हैं ?

आज आज़ादी के इतने सालों बाद भी मुझे तो ऐसा लगता है कि आगे बढ़ने के बाजये और पिछड़ गए हैं हम, क्यूंकि हमारी संस्कृति के मूल आधार ही अब हमारे नहीं रहे। जिसमें झलकती थी हमारे देश कि संस्कृति और सभ्यता की खुशबू अब उसकी जगह ले ली है आपसी मतभेद और नकल ने फिर उसका क्षेत्र चाहे जो हो वो मायने नहीं रखता। जिस देश के नेता भ्रष्ट हों ,जिस देश कि आने वाली नस्लें खुद अपना ही देश छोड़ के जाने पर आमादा हों, जिस देश के लोगों में अपनी मात्र भाषा को लेकर द्वंद मचा रहता हो। क्या ऐसे देशवासियों को अधिकार है राष्ट्रीय त्योहार मनाने का आज़ादी के गीत गाने का ???? खुद को सच्चा हिन्दुस्तानी कहने का ...??? यदि मेरे इन सवालों का कोई जवाब आपके पास हो तो कृपया ज़रूर अवगत करायें ....                  

Tuesday 10 January 2012

मायावती का चुनाव निशान बदले आयोग ...

ड़तालिस घंटे के बाद नेट और टीवी से रूबरू हो पाया हूं। एक खबर मुझे बहुत परेशान कर रही है। ये खबर है उत्तर प्रदेश की। आपको पता ही है कि वहां की मुख्यमंत्री मायावती ने इस प्रदेश को वैसे ही बदरंग कर इसका चेहरा बिगाड़ दिया है। अब निर्वाचन आयोग का एक फैसला किसी के गले नहीं उतर रहा है।
दरअसल मुख्यमंत्री मायावती ने सूबे भर में अंबेडकर पार्क के नाम पर मनमानी की है। लखनऊ और नोएडा में तो कई एकड में पार्क बनाने में हजारों करोड रुपये खर्च किए गए हैं। मायावती ने इन पार्कों में दलित नेताओं की मूर्तियां तो लगवाई ही, पार्टी का चुनाव निशान हाथी की भी हजारों मूर्तियां पार्क में लगा दी । अब चुनाव में इसे दूसरे दलों ने मुद्दा बना दिया है। उनका कहना है कि ये पार्क सरकारी पैसे से बने हैं और इसमें खुद मायावती, उनकी पार्टी के संस्थापक कांशीराम, भीमराव अंबेडकर,  बाबा ज्योतिबाफुले समेत तमाम नेताओं की मूर्ति तो है ही, साथ ही पार्टी का चुनाव निशान हाथी की मूर्ति भी एक दो नहीं हजारो की संख्या मे लगा दी गई है। इसका चुनाव पर असर पडेगा।

निर्वाचन आयोग ने इस शिकायत की सुनवाई में बहुत ही गैरजिम्मेदाराना निर्णय दिया है। उनका कहना है कि पूरे प्रदेश में जहां कहीं भी पार्क या सरकारी परिसर में ऐसी मूर्तियां हैं उन्हें चुनाव तक ढक दिया जाए। इन पार्कों में हजारों करोड़ रुपये पहले ही खर्च किए जा चुके हैं। सिर्फ अस्थाई रुप से इसे ढकने पर लगभग पांच करोड रुपये खर्च होने का अनुमान  है। जनवरी में ढकने के बाद इसे मार्च में हटा भी दिया जाना है, ऐसे में सरकारी खजाने से पांच करोड रुपये खर्च करने को कत्तई जायज नहीं ठहराया जा सकता। इन पार्कों को देखने से ही साफ पता चलता है कि इसके पीछे मुख्यमंत्रीं मायावती की मंशा कत्तई साफ नहीं रही है। ऐसे में सजा किसे मिलनी चाहिए ? सजा तो मुख्यमंत्री को मिलनी चाहिए थी, लेकिन जो सजा निर्वाचन आयोग ने सुनाई है कि इसे चुनाव तक ढक दिया जाए, ये सजा तो आम जनता को दे दी गई है। क्योंकि सरकारी खजाने हमारे और आपके ही टैक्स का पैसा है।

मुझे लगता है कि आयोग को इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। चूंकि आयोग ने इन मूर्तियों और हाथी को ढकने का आदेश दिया है, इससे इतना तो साफ है कि वो मायावती को चुनाव आचार संहिता तोडने और चुनाव में गलत तरीका अपनाने का जिम्मेदार मानता है। ऐसे में आयोग को चाहिए कि वो बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) का चुनाव निशान ही बदल दे। क्योंकि सही कारण होने पर चुनाव निशान बदले जाने का प्रावधान भी है। अगर आयोग चुनाव निशान नहीं बदलता है तो आयोग को बीएसपी को ये फरमान सुनाना चाहिए कि वो अपने पैसे से इन मूर्तियों को ढकने का काम करे। वैसे भी अगर कोई उम्मीदवार किसी दीवार पर नारे लिखवाता है तो उस उम्मीदवार को ही अपने खर्चे पर उसे साफ करने का आदेश दिया जाता है। अगर आचार संहिता में इसका प्रावधान भी है, फिर मायावती पर इसे क्यों नहीं लागू किया जा रहा है ?

Monday 9 January 2012

यही नेता महान है !

ठेके में लगा जिसका पूरा खानदान है |
दूर  से  ही   दीखता   ऊंचा   मकान है |
गाड़ियों का काफिला है   ऊंची शान है |
पहचान लीजिये, यही नेता  महान है !

जनता को  बेवकूफ  बनाना  जिसे आये |
बस मीठे-मीठे  बोल सुनाना जिसे आये |
बस जान लीजिये  वही नेता है साथियों !
वादों के झूठे स्वप्न दिखाना जिसे आये |

Sunday 8 January 2012

कुंड़लिया ----- दिलबाग विर्क

कपड़े ऐसे पहनते, बाहर झांके अंग।
कैसे आज रिवाज हैं, कैसा है ये ढंग।।
कैसा है ये ढंग, बढ़ावा देते खुद हम।
ले नवयुग की आड़, भरें नूतनता का दम।।
देखो करके ध्यान, बढ़े हैं इससे लफड़े।
लगता है वो सभ्य, शिष्ट हों जिसके कपड़े।।
* * * * *
नफ़रत बढ़ती जा रही, खत्म हुआ है प्यार।
रिश्ते-नातों पर यहाँ, हावी है व्यापार।।
हावी है व्यापार, देखते हैं बस मतलब।
हो जब मुश्किल वक्त, काम आया कोई कब?
सदगुण सारे छोड़, बना ली कैसी फितरत।
अपनाए गुण आज, स्वार्थ, ईर्ष्या औ' नफरत।।
* * * * *

Saturday 7 January 2012

बेसुरा रविकर

गाफिल की आज्ञा भला, कैसे देता टाल | 
प्रस्तुत बे-सिर पैर की, बे-सुर भरूँ बवाल || 
चल दल-दल पर चल |
बदल बदल दल चल ||
 File:African elephant warning raised trunk.jpg
चाची ने थप्पड़ जड़ा,  ताऊ के घर बैठ |
चरबी चढ़ती बदन पर, चला करोड़ों ऐंठ |
चला करोड़ों ऐंठ, उमा-योगी का करिहैं |
जाति-सभा में पैठ, कमल कीचड़ मा सरिहै |
चूस-चास कर खून, दाँव जो चले पिशाची |
करिहै का कानून, सँभल के रहना चाची ||
खल जन-जन-मन खल |
छल खल-दल  बन छल ||
Samajwadi Party Flag.jpg
गन्ना की मिल में पिरे, स्वाभिमान जन-रोष |
अंचल पर गहरी पकड़, होय सदा जय घोष |
होय सदा जय घोष, करे जो मोहन प्यारे |
लगे भयंकर दोष, जाँय बेमतलब मारे |
लोकतंत्र की खोट,  पकड़ ना पाते अन्ना |
बाहुबली पर चोट, पेरता जाये गन्ना ||

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