Tuesday 28 February 2012

कोऊ काहू में मगन है

माया के अपार मोहजाल में भुलान कोऊ ,
कोऊ राम नाम में लगाय रह्यो मन है ।
कामिनी कमान-नैन बीन्धि गयो काहू उर ,
कोऊ भाव-भगति भुलाय दियो तन है ।
कोऊ दोऊ हाथन सों बांटि रह्यो भुक्ति-मुक्ति,
कोऊ दोऊ हाथन बटोरि रह्यो धन है ।
साधो ! ऐसा जग है बेढंगा बहुरंगा कोऊ-
काहू में मगन कोऊ काहू में मगन है । 

Sunday 26 February 2012

होती बन्दरबांट

सिफारिश बिना कब मिले, किसी को पुरस्कार |
होती बन्दरबांट है , हो ऐसा हर बार ||
हो ऐसा हर बार , छूट रहे बुद्धिजीवी |
बना हुआ आधार , बाप, भाई या बीवी ||
मिलेगा पुरस्कार , न पालना कभी ख्वाहिश |
कहे विर्क कविराय , नहीं है अगर सिफारिश ||

* * * * *

Saturday 25 February 2012

बन्दौं संत कबीर, कवी-वीर पुण्यात्मा--

File:Kabir004.jpg
बन्दौं संत कबीर, कवी-वीर पुण्यात्मा,
अन्ध-बन्ध को चीर, किया ढोंग का खात्मा ।

परम्परा परित्याग, लीक छोड़ कर जो चला,
दुनिया दुश्मन दाग, भर जीवन बेहद खला ।

खरी खरी कह बात, वीर धीर गंभीर थे,
पोंगे को औकात, ज्ञानी श्रेष्ठ कबीर थे ।

भर जीवन संघर्ष,  किया कुरीती से सतत,
इक सौ उन्निस वर्ष, निर्गुण महिमा थे रटत ।

काशी जन्मो-करम, साखी सबद सिखाय के,
  मेटा सरगे भरम, मर मगहर मा जाय के ।

Friday 24 February 2012

बौद्ध धर्म-दर्शन का मूलाधार-


     संसार के प्रत्येक प्राणी का परम् श्रेय सुख प्राप्त करना तथा दुःख से निवृत्ति ही होता है। प्रायः दुनिया के सभी धर्म सांसारिक कष्टों से निवृत्ति के मार्ग का ही अनुसंधान करते हुए दिखाई पड़ते हैं। बौद्ध धर्म भी परम् श्रेय सुख की प्राप्ति और दुःख निवृत्ति का उपाय बताता है, लेकिन और धर्मों के तरीकों तथा बौद्ध धर्म के तरीके में आमूल-चूल अन्तर होने के नाते यह सभी धर्मों से विशिष्ट और आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना बुद्ध के समय में रहा होगा।
     दुनिया के प्रत्येक धर्मों का आधार विश्वास और श्रद्धा है जबकि बौद्ध धर्म की नीव बुद्धि है। सभी धर्म पहले परम श्रेयस् में विश्वास करने की शिक्षा देते हैं जबकि बौद्ध धर्म का आधार वाक्य है ‘सोचो, विचारो, अनुभव करो जब परम श्रेयस् तुम्हारे अनुभव में आ जाये तो श्रद्धा या विश्वास करना नहीं होगा स्वतः हो जाएगा।’ उनके मत में इसे जबरन करने की आवश्यकता नहीं है। और यदि किसी के कहने पर विश्वास कर ही लिया जाय, आस्था थोप ही ली जाय अपने मन पर तो यह जबरदस्ती की आस्था हमारे साथ कितनी दूर चलेगी। इसीलिए बुद्ध कहते हैं कि तुम हम पर भी विश्वास मत करो। अपना दीपक स्वयं बनो ‘अप्प दीपो भव’। बुद्ध के विचार से आस्था करने की चीज़ नहीं है आस्था होने की चीज़ है। इस तरह बौद्ध धर्म पूर्णतः बुद्धि पर आधारित है न कि अन्धश्रद्धा पर। और आज 21वीं सदी के युग की प्रवृत्ति नितान्त बुद्धिवादी होती जा रही है। वैसे भी मानव का विकास बुद्धि के ही तरफ़ हो रहा है और हम जितना विकसित होते जा रहे हैं बौद्ध धर्म से अधिक नज़दीक होते जा रहे हैं।
     जहाँ दुनिया के दूसरे धर्म परम श्रेयस् के स्वरूप के निर्धारण में उलझकर रह जाते हैं वहीं बुद्ध का विचार है कि हम परम श्रेयस् के स्वरूप का निर्धारण कर ही नहीं सकते। अगर परम श्रेयस् का अनुभव हमें हो भी जाये तो हम उसे दूसरे को बता नहीं सकते ठीक वैसे ही जैसे यदि लाल रंग किसी के अनुभव में कभी भी न आया हो तो भला उसको हम कैसे समझा सकते हैं कि लाल रंग कैसा होता है? फिर इस उद्योग का निरर्थक प्रयास क्यों?
     इसलिए बुद्ध कभी सुख की बात नहीं करते, कभी ईश्वर की बात नहीं करते, कभी स्वास्थ्य की बात नहीं करते। उनके मत से इन श्रेयष्कर तत्त्वों की व्याख्या करके इन्हें किसी सीमा में बांधा नहीं जा सकता। हम नहीं कह सकते कि सुख क्या है और उसकी सीमा क्या है? वहीं दूसरी तरफ़ हम इसके विपरीत तत्त्वों, दुःख, व्यथा, रोग आदि की व्याख्या भी कर सकते हैं, सीमांकित भी कर सकते हैं और उसका अनुभव भी कर सकते हैं। हम दुःख की परिभाषा कर सकते हैं, उसका कारण जान सकते हैं, उसका निवारण भी सम्भव है, उसके निवारण के उपाय भी खोजे जा सकते हैं। और जब हम रोग, दुःख से पूर्णतः निवृत्त हो जायें तो जो कुछ बचेगा वह सब स्वास्थ्य और सुख होगा। दुःख की अनुभूति तो हमें सहज होती ही रहती है पर दुःख निवृत्ति के बाद ही सुखानुभूति सम्भव है।
     इस प्रकार महात्मा बुद्ध अपना दर्शन दुःख की खोज से आरम्भ तो करते हैं पर परिणति सुख पर ही होती है। अतः बौद्ध धर्म-दर्शन पर दुःखवादी होने का मिथ्यारोप जो कभी-कभी लगाया जाता है सर्वथा अनुचित है। प्रायः और सभी धर्म अपना दर्शन सुख से आरम्भ करते हैं जो कि सर्वसाधारण की समझ से कोसों दूर होता है। परम श्रेयस् से नितान्त अनभिज्ञ होने के कारण लोग उसकी कल्पना में ही उलझ कर रह जाते हैं। जबकि बौद्ध धर्म दुःखी प्राणी को श्रेयस् में उलझाता नहीं वल्कि उसके दुःखों की व्याख्या करके उससे निवृत्ति का मार्ग सुझाता है। दुःख से सम्यक् निवृत्ति के उपरान्त तो परम् सुख का सहज अनुभव होना ही है। महात्मा बुद्ध और उनका धर्म-दर्शन अपने इसी अनूठे दृष्टिकोण के कारण तब, अब और दूर भविष्य में भी कभी अप्रासंगिक नहीं होने वाला। क्योंकि मानव में जितनी ही बौद्धिक क्षमता बढ़ती जायेगी बौद्ध-दर्शन मानव-वृत्तियों के उतना ही अनुकूल और सामयिक होता जायेगा।
                                                        -शालिनी

Thursday 23 February 2012

हम भी हैं भारत रत्न

समय-समय पर इस देष में व्यक्ति विषेड्ढ या व्यक्तियों के समूह द्वारा भारत रत्न की मांग की जाती है। भारत रत्न के लिए कभी सरकार को कोसा जाता है तो कभी किसी संस्था को। कोई भारत रत्न की स्वयं मांग करता है तो कभी दूसरों से करवाता है। सालो भर भारत रत्न के लिए कोई न कोई सरकार को कोसता हीं रहता है। भारत रत्न मांग करने वाले सरकार को उसकी अक्षमता के लिए कोसते हैं। उनका आरोप होता है कि सरकार में प्रतिभा पहचान की कमी है। जिसके चलते लाखों प्रतिभाएं इस देष में प्रोत्साहन के अभाव में कुंठित हो जाती हैं। लोगों का यह भी आरोप होता है कि सरकार भारत रत्न उन्हें बांटती है, जिसे इसकी कद्र हीं नहीं है। जबकी जो लोग भारत रत्न के लायक हैं सरकार उन्हें देने में कंजूसी करती है। लोगों का यह भी कहना होता है कि सरकार उन्हें भारत रत्न देती तो उनकी और सरकार दोनों की कीर्ति बढ़ती। वे उपयोगितावाद के सिद्धान्त पर भी अपनी भारत रत्न की मांग को जायज ठहराते हैं, क्योंकि उनकी यह मांग अधिकतम को संतुष्टी प्रदान करनेवाली है।
लोगों का यह भी कहना है कि भारत रत्न देने में सरकार को कंजूसी का परिचय नहीं देना चाहिए। उनका यह भी कहना है कि प्रत्येक भारतवासी को भारतरत्न नहीं देना लोकतंत्र के सिद्धान्तों के खिलाफ है क्योंकि यह अवसर की समानता का विरोध करता है। उनका यह भी कहना है कि सरकार अगर संकल्पषक्ति प्रदर्षित करे तो प्रत्येक भारतवासी भारत रत्न पाकर अपने को धन्य कर सकता है।
भारत रत्न साल में एक या दो को क्यों देना चाहिए। भारत रत्न का कृत्रिम अभाव क्यों उत्पन्न किया जा रहा है। क्या भारत रत्न थोक के भाव में नहीं दिया जा सकता है। जनता की इस छोटी मांग पूरे किये बिना कोई भी सरकार लोक कल्याणकारी होने का दावा कैसे कर सकती है। यह बात किसी के गले नहीं उतरेगी कि इस देष में भारत रत्न का अकाल हो गया है। बल्कि वास्तविकता यह है कि भारत रत्न का कृत्रिम अभाव उत्पन्न कर देष में प्रतिभा को हतोत्साहित किया जा रहा है। मेरा तो यहां तक मानना है कि हर भारतीय भारत रत्न है। यानी समूचे भारतवासी को भारत रत्न दिया जाना चाहिये।
क्या घोटाला करने वाला भारत रत्न नहीं है। क्या कालाबाजारी करने वाला भारत रत्न नहीं है। क्या ब्लैकमनी बनाने वाला भारत रत्न नहीं है। ब्लैकमनी के पास इतनी क्षमता है कि वह अगर देष में वापस ला दी जाए तो पूरे देष को 25 साल तक टैक्स नहीं देना पड़ेगा। आखिर इतनी संभावना ब्लैकमनी बनाने वाले के कारण हीं देष में बनी है।
इधर स्वर्ग लोक की खबरों के अनुसार अतृप्त आत्माओं ने स्वर्ग लोक में भारत रत्न को लेकर एक बैठक की। उन्होंने बैठक में जीते जी भारत रत्न उन्हें नहीं देने के लिए सरकार को कोसा। उन्होंने सरकार से मांग की है कि सरकार भारत रत्न नहीं पानेे वाली दुखी आत्माओं से मांफी मांगे तथा उन्हें भारत रत्न देकर उनके भटकन को दूर करे। ऐसा नहीं करने पर वे जंतर- मंतर पर विषाल प्रदर्षन करेंगे। अगर फिर भी नहीं बात बनी तो वे अन्ना एवं रामदेव का समर्थन लेंगे। और भविष्य में सरकार के खिलाफ चुनाव प्रचार करेंगे।



Wednesday 22 February 2012

परीक्षा का मौसम

     लो जी! आ गया फिर परीक्षा का मौसम, अभी तो साल शुरू हुआ था और इतनी जल्दी परीक्षा भी आ गई ऐसा ही लगता है न हर किसी को परीक्षा के वक्त, वो लंबे-लंबे दिन वो सुनी दुपहरी उस दुपहर के सन्नाटे में आइसक्रीम वाले के डमरू की आवाज़ तो कहीं कुल्फी वाले की घंटी की टन-टन वो गरम हवायें चारों ओर एक अजीब सा पसरा हुआ सन्नाटा सिर्फ ओर सिर्फ पंखे और कुलर की आती हुई आवाज ऐसे में घर को बाहरी गर्मी से बचाने और ठंडा रखने के लिए हरे पर्दों के बंद किया गया कमरा जहां पसरी हुई होती थी एक आजीब सी खामोशी। चारों और बस पढ़ाई के लिए बनाया गया माहौल न टीवी की आवाज न किसी और मनोरंजक चीज़ की बस शाम  होते ही थोड़ी लोगों की चहल-पहल और नल में पानी का आना और यदि थोड़ी देर के लिए मन बहलाना भी है। तो गर्मी से तपते पेड़ों में पानी देना और सूखे बरान्दे को गीला करना ही आपका एक मात्र मनोरंजन, तय किया जाता था फिर चाहे आपको उन तपते हुए पत्थरों से उठी हुई भाप देखकर अपना वर्तमान ही क्यूँ ना दिखाई दे इसे किसी को कोई सरोकार नहीं....  ज़रा ध्यान भटका नहीं की कहीं से आवाज आई "यहाँ वहाँ ध्यान देने की जरूरत नहीं पढ़ाई करो-पढ़ाई जिस से भले दिन हो, जो पढ़ा होता सारे साल तो आज यूं इतनी मेहनत न करनी पड़ती अब भुगतो और पढ़ो चुप-चाप खबरदार जो यहाँ से हिले हम से बुरा कोई न होगा समझ लेना हाँ!!!" ...  यही माहौल हुआ करता था अपने जमाने में परीक्षा के समय. उम्मीद है आप सभी को भी अपने-अपने परीक्षा के दिन ज़रूर याद आ गये होंगे  और आप सभी एक होंटों पर एक यादों भरी प्यारी सी मुस्कुराहट भी ज़रूर आ रही होगी है न...
अरे यह देखो आ भी गई 
     बड़ा ही खतरनाक महिना होता है भई यह मार्च का महिना सारे साल की कसर एक ही महीने में निकल जाती है और आपकी ज़िंदगी में आगे क्या होने वाला है का निर्णय भी केवल एक ही महीने में होने वाली परीक्षा पर निर्भर करता है। एक अपना ज़माना था जब ज्यादा से ज्यादा हर महीने यूनिट टेस्ट या बहुत हुआ तो छ:माही परीक्षा और उसके बाद सीधा फ़ाइनल। मगर अब तो बच्चों को जैसे आदत लग गई है परीक्षाएं देने की अब शायद बच्चों को उतना डर नहीं लगता होगा इस परीक्षा नामक भूत से क्यूँकि बेचारे आज कल के बच्चे सरकार की मेहरबानी से पहले ही सारे साल इस परीक्षा नुमा बला से जूझते रहते हैं। तो भला ऐसे हालातों में साल की आखिरी परीक्षा से काहे का डर  रही बात परीक्षा फल के बाद क्या मिलेगा ? सो आज कल बच्चों को शायद उसका भी कोई खास चस्का बाकी नहीं रह गया है। क्यूंकि बेचारे बच्चों को गर्मियों की छुट्टी के नाम पर मिलती ही कितनी छुट्टियाँ हैं। अभी बेचारे परीक्षा सामाप्त होने बाद ठीक से अंगड़ाई भी नहीं ले पाते की स्कूल खुलने के दिन आ जाते है और एक महीने में ही इतना पढ़ा दिया जाता है, कि आने वाले अगले महीने की छुट्टियाँ भी गए महीने का गृह कार्य समाप्त करने में ही गुज़र जाती हैं।
     यही कहर कम नहीं होता, कि होली जैसे त्यौहार को भी मन जलाने के लिए मार्च में ही आना होता है। जब ना पढ़ाई में ही मन लगता है किसी का और न होली खेलने में ही मज़ा आता है। क्यूंकि दिमाग जो शांत नहीं होता रह रहकर परीक्षा वाले भूत का डर सताया करता है। बेचारे बच्चों कि तो ऐसी हालत होती जाती है जैसे वो कहावत है न-
"धोबी का कुत्ता न घर का घाट का"
     अरे रे यह क्या कह दिया मैंने कहीं विद्यार्थी वर्ग बुरा न मान जाये भई, माफ करना विद्यार्थियों आपके मन की व्यथा यूं सरे आम कह गई मैं  बुरा न माओ होली है यार ...इस कहवात वाली बात को मैंने केवल होली के दिन के लिए इस्तेमाल किया है और किसी दिन के लिए नहीं, यदि मेरी इस बात से किसी को बुरा लगा हो तो क्षमा प्रार्थी हूँ भाई लोग,...
मेरी ओर से सभी विद्यार्थियों को उनकी परीक्षा हेतु बहुत-बहुत शुभकामनायें

Sunday 19 February 2012

खुदा ! खैर हो


हर शाख पे
बैठ गए हैं उल्लू
खुदा ! खैर हो |

बुरे हैं नेता
हैरानी किसलिए
आदमी वे भी |

विकल्प कहाँ
जनता के सामने
राजनीति में |

अच्छे व्यक्ति थे
राजनीति में कूदे
बुरे हो गए |

न कर्म में है
न शुचिता सोच में
वस्त्र सफेद |

मिले सबको
वो हाथ जोडकर
नेता ही होगा |

खादी जारी है
फैंक चुके चरखा
कूड़ेदान में |

* * * * *
                            ----- दिलबाग विर्क 

* * * * *

Saturday 18 February 2012

मनमे अतीत की याद लिए फिरते है

 (1)
निज अंतर में उन्माद लिए फिरते हैं,
उन्मादों में अवसाद लिए फिरते हैं,
अंदर ही अन्दर झुलस रही है चाहें,
मनमे अतीत की याद लिए फिरते है।
(2)
बेकस का कोमल हृदय जला करता है,
निशदिन उनका कृश-गात धुला करता है,
दुखों की नाव बनाये नाविक,
दुर्दिन सागर पर किया करता है।
(3)
औसत से दुगुना भार लिए फिरते हैं,
संग में कितनों का प्यार लिए फिरते हैं,
यदि किसी भिखारी ने उनसे कुछ माँगा,
भाषण का शिष्ट-आचार लिए फिरते हैं।
(4)
जो सुरा-सुंदरी पान किया करते हैं,
'कल्याण' 'सोमरस' नाम दिया करते हैं,
चाहे कितना भी चीखे-चिल्लाये जनता,
वे कुर्सी-कृष्ण का ध्यान किया करते हैं

Friday 17 February 2012

विनम्र निवेदन-

पिछले तीन दिनों से हमारा नेट एकदम ख़राब चल रहा है इसलिए ज़ल्दी-ज़ल्दी तीन-चार सवाल कर लेता हूँ देश के रहनुमाओं से। कल हमने समाचार-पत्र में देखा एक और घोटाला लगभग 25 करोड़ का मनरेगा मद से। आये दिन घोटालों की झड़ी सी लगी जा रही है। वाह! क्या नज़ारा है एकदम फुलझड़ी सरीखा। देश में जब पहला घोटाला हुआ होगा और उसकी जांच समिति बठाई गयी होगी तब से लेकर आज तक हुए समस्त घोटालों की जांच समितियां बैठी पर प्रश्न एक- उनका कुछ नतीज़ा आया? या केवल जांच समितियां ही बैठाकर सरकार अपने कर्त्तव्य की इति समझ लेती है। किसी भी घोटाले का अब तक सम्पूर्ण निराकरण हो पाया हो कोई बता दे? घोटालेबाजों को ज्यादा से ज्यादा निलम्बित कर दिया गया होगा या थोड़े दिन के लिए ज़ेल भेज दिया गया होगा लेकिन किसी भी घोटाले की रिकवरी आज तक हो पायी? 25-25 करोड़ का घोटाला करके अगर कोई मात्र निलम्बित हो जाय तो क्या फ़र्क पड़ता है उसकी सेहत पर इतना तो वह अपने सम्पूर्ण सेवा-काल में तनख़्वाह नहीं पाता वह तो हो गया राजा। हाँ यह होता है कि जांच समितियां बैठाकर घोटाला करने के नये-नये तरीक़ों से अवश्य लोगों को परिचित करा दिया जाता है। उसका न तो दण्ड दिया जाता है न रिकवरी तो इस रूप में और लोगों को घोटाला करने के लिए प्रोत्साहित ही किया जाता है। क्या भारतीय संविधान में इन घोटालों जैसे अपराधों के सम्पूर्ण और तुरन्त निराकरण का कोई कारगर प्रावधान नहीं है? बस अपराधों पर जांच समितियां बैठाकर उसे बिलम्बित करने का ही प्रावधान है? या सरकारी नुमाइन्दे नहीं चाहते कि ऐसे अपराधों को सम्यक् निराकरण हो और अपराधियों को दण्ड मिले तथा उसकी रिकवरी की जाये। अगर ऐसा प्रावधान नहीं है तो क्यों नहीं ऐसा कानून बनाया जाता कि ऐसे मामलों का निराकरण भी हो तथा लोंगों को सबक भी मिले ताकि आइन्दा ऐसे अपराध न हों। मैं तो समझता हूँ कि सक्षम लोग ही यह सुकृत्य करते हैं अतः वही नहीं चाहते कि इसका कोई स्थाई हल निकले। तो भाई! जो धन घोटाले स्वरूप हासिल किया जाता है वह देश की जनता का ही होता है किसी या कुछ लोगों की व्यक्तिगत सम्पत्ति नहीं अतः वह द्वार सबके लिये खोल दो कि उसे सब हासिल कर सकें। कुछ लोग ही क्यों? अनावश्यक जांच-समितियां बैठाकर उन घोटालों पर और धन तथा समय ख़र्च करने से तो बाज़ आओ जिनका कोई स्थाई निराकरण कम से कम भारत में तो सम्भव नहीं है। हे सियासत के महारथी! हे हमारे महाराजाधिराज! हे धनलोलुप परमभट्टारक! आपसे भारत की जनता की ओर से मैं सविनय निवेदन करता हूँ कि भारतीय जनता के श्रमपूर्वक कमाये धन, समय तथा नाज़ुक संवेदनाओं के साथ खिलवाड़ न करो नाज़ायज रूप से जांच-समितियों को बैठाकर। या तो जनता को भी ऐसा करने का सुअवसर प्रदान करो! हम जनता को भी पैसों की खनक भाती है। यह हमारी भी आवश्यक सुख-सुविधाओं का साधन हो सकता है। आपके अपराध-निवारक गतिविधि से हमारा उत्साह बढ़ा है हम भी ऐसा अपराध करने के लिए उत्साहित हैं।
                                                             -ग़ाफ़िल

Wednesday 15 February 2012

जिम्मेदार आख़िर कौन ??


 यूं तो आज कल है प्यार का त्यौहार मगर क्या आज सभी कि ज़िंदगी मे बचा है प्यार ? न जाने कितने साल बीत गए कश्मीर को जीत ने की लड़ाइयाँ लड़ते-लड़ते, मगर अब तक खुद कश्मीर को इन लड़ाइयों से आज़ादी नहीं मिल पाई है। कभी-कभी सोचो तो लगता है एक नारी जीवन और कश्मीर की व्यथा शायद एक सी है। जिसकी अपनी कोई मर्ज़ी नहीं होती। जब जिसका जैसा मन करता है, वो उसे अपने तरीके से चलाने की कोशिश करता रहता है। लेकिन उस कश्मीर से आज तक किसी ने नहीं पूछा कभी, कि तुम खुद क्या चाहते हो, तुम्हारी अपनी मर्ज़ी क्या है। एक है जो उसे हथियारों के माध्यम से हथियाने में लगा है। बिना उसकी मर्जी जाने उसे अपना बनाना चाहता है। तो दूजा उन्हीं हथियारों से उसकी रक्षा और सुरक्षा के नाम पर उसे बचाने में लगा है.

मगर उन दोनों ने कभी यह नहीं सोचा कि बात उस कश्मीर को अपना बनाने की हो या बचाने की हो, आखिर इस्तेमाल तो हथियारों का ही कर रहे हैं दोनों। चाहे उसे पाना हो, या बचाना चोंट तो उसे ही लग रही है ना। घायल तो वो एक कश्मीर ही हो रहा है। डर लगता है यह सोचकर कहीं ऐसा न हो,कि एक दिन इन दो चक्की के पाटों में पिस्ते-पिस्ते कश्मीर अपना दम तोड़ दे। तब क्या करेंगे यह दोनों...उससे उसकी खूबसूरती और अमन चैन तो पहले ही छीना जा चुका है। अब ज्यादा कुछ रह नहीं गया सिवाय ज़मीन के एक टुकड़े के जैसे किसी औरत से जब उसका घर परिवार सब कुछ छिन जाने के बाद उसके अस्तित्व का कोई मोल नहीं रह जाता और तब उसका जीवन एक ज़िंदा लाश के समान हो जाता है। ठीक वही हाल तो है अब कश्मीर का कुछ भी तो बाकी नहीं है अब वहाँ सिवाय एक ज़मीन के टुकड़े के, कभी यह जुमला सुना था कहीं किसी ने कहा था एक बार

"घरों को लूटते हैं
इन्सानों को उजाड़ते है
जाने क्या आज़ाद करना चाहते है" 

कश्मीर के नाम पर भाषण देने वाले की कोई कमी नहीं है। मगर ऐसे कितने लोग हैं, जिन्होंने वहाँ के लोगों के दर्द को समझा, उनसे बातें की, उनकी भावनाओं को समझने कि कोशिश की, शायद बहुत कम लोग होंगे,जिन्हों ने उनके मुंह से यह सुना होगा, कि लाखों घर उजाड़ गए मियां, हम किस गिनती में आते हैं। अब तो बस अपना घर वहाँ होगा जहां अपने होंगे बाकी सब तो ईंट पत्थर है। माना की घर-घर में रह रहे लोगों से बनता है, ना की ईंट पत्थरों से, क्यूंकि जो ईंट पत्थरों से बना होता है वो घर-घर नहीं मकान होता है। मगर इस एक जुमले के पीछे कितने मासूम बच्चों कि कुचली हुई भावनाए हैं। कितने दिलों के जज़्बातों का खून है, उसे शायद ही किसी ने महसूस किया हो, 
अरे ज़रा आप ही सोचकर और अपने दिल पर हाथ रखकर कहिये, कि क्या सिर्फ अपनों के होने से ही घर घर होता है। ? क्या उस घर में उन ईंट पत्थरों का कोई मोल नहीं होता। जहां घर के एक बुजुर्ग इंसान ने अपनी तामम उम्र गुज़री हो, जहां बच्चों ने अपना बचपन जिया हो, जिस घर से कोई बेटी कि डोली उठी हो जहां से उस घर में रह रहे हर एक व्यक्ति के जीवन की हजारों यादें जुड़ी हों, क्या ऐसे  ईंट पत्थर से बने घर की कोई कीमत नहीं?? एक हम हैं, (हम से यहाँ तात्पर्य एक आम इंसान से है) जब कभी हमारे सपनों का आशियाँ भी अगर टूट जाये तो तिलमिला जाते हैं हम।
तो ज़रा सोचकर देखो ओ बाक्षकों और रक्षकों जब वहाँ के बाशिंदों का घर उजाड़ देते हो तुम तो क्या गुजरती होगी उन मासूम दिलों पर और जब आज वही मासूम दिल यह सब सहसह कर पत्थर के हो चुके हैं और बदले की भावना में जलते हुए उन्होने भी हथियारों को चुना और औढ लिया नकाब आतंकवाद का तो क्या बुरा किया??? जब खुद हमने ही इस कदर लूटा उन्हें आज़ाद कराने के नाम पर, तो कभी सुरक्षा के नाम पर, और रही सही कसर पूरी करदी उसे छीन कर जबर्दस्ती अपना बना लेने की तमन्ना रखने वालों ने जिसका अंजाम आज यह है कि उनका इंसानियत और विशवास जैसे शब्दों पर से भरोसा ही उठ गया तो, यह गुनाह पहले किया किसने हम ने या उन्होने .??..तो फिर अब क्या हक रह जाता है किसी का की कश्मीर में हो रहे फ़सादों को कोई आतंकवाद का नाम दे। यूं तो इस विषय में सबका अपना एक अलग ही नज़रिया है और उस नज़रिये के आधार पर अपना एक निर्णय की ऐसा होना चाहिए इस समस्या का हल या वैसा होना चाहिए , मगर कहने से क्या होता है। हल तो आज तक निकाल नहीं पाया, कारण चाहे भ्रष्टाचार हो या कुछ और झेल तो वहाँ के लोग ही सबसे ज्यादा रहे हैं। ऐसे में यदि उन्होने खुद की रक्षा के लिए या बदले की भावना के चलते ही सही, जो की जायज़ है आतंकवाद का नाकाब पहन भी लिया तो क्या बुरा किया। आखिर हैं तो वो भी इंसान ही हर कोई तो महात्मा गांधी नहीं हो सकता।     
आप को क्या लगता ?.             

Monday 13 February 2012

... जनता है लाचार

जनता का दरबार है,जनता की सरकार ।
जनता को चूना लगे, जनता   है लाचार ।
जनता है लाचार , खड़ी बस देख रही है ।
इसकी खरी कमाई , कुर्सी   ऐंठ    रही है ।  

Sunday 12 February 2012

बने रहें युवराज

कैंसर के इस रोग से, जूझ रहे युवराज ।
दुआ करे ये देश है , जल्दी हो ईलाज ।।
जल्दी हो ईलाज , ठीक होकर वे आएँ ।
बने घटा घनघोर, विपक्षी पर छा जाएँ ।।
वही पुराना खेल , विर्क खेलें वो आकर ।
बने रहें युवराज , न कुछ कर पाए कैंसर ।।

----- दिलबाग विर्क

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Saturday 11 February 2012

राज-तंत्र की बेल, बढ़ी इन रायबरेली ।।

राज-तंत्र की बेल, ताकता रायबरेली

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राय-बरेली फिर सजे, दिखे नए युवराय ।
नव पीढ़ी जो मंच पर, मम्मी मन हरषाय।

मम्मी मन हरषाय, देख के नाती नातिन ।
राहुल उम्र-दराज, साल अब जाते गिन-गिन ।

ख़्वाब देखती माय, व्याह का रविकर डेली ।
राज-तंत्र की बेल, बढ़ी इन रायबरेली ।।
 
पाला पोसा शौक से, बढ़ी नहीं जब बेल ।
तब चुनाव के मंच पर, दिखा अनोखा खेल ।

दिखा अनोखा खेल, डोर सत्ता की पकड़े ।
नौनिहाल अल-बेल , खड़े मैया को जकड़े ।

सदियों से परिवार, देश का सबसे आला ।
अगली पीढ़ी ठाढ़, पड़ेगा इससे पाला ।।

Friday 10 February 2012

बार-बार दिन यह आये

आज कल हमारे यहां बिजली महरानी के केवल दर्शन ही नहीं हो रहे हैं अपितु इनकी कृपा स्थाई रूप से चौबीसों घंटे हो गयी है। यह कृपा कब तक रहेगी यह समझना अस्थाई है। वैसे हम तो एक हफ़्ते दिन और एक हफ़्ते रात में आपकी (बिजली महरानी) कृपा के आदी हो गये थे तो अब यह अवसर हमें चकित करने वाला हो गया है। यह कृपा चुनाव के सुहाने मौसम की बदौलत मिली है सो डर भी है कि स्थिति में परिवर्तन को हम कैसे झेलेंगे जो कि निश्चित है। क्योंकि मौसम बदलता ही रहता है भारत में। वैसे यह समय हमारे लिए तो स्वर्णकाल से कम नहीं है यह मौसम यूँ ही बना रहे स्थायी रूप से क्या ऐसा सम्भव नहीं? हम तो भाई यही चाहते हैं। उत्तर प्रदेश वासियों का अगर जरा भी सहयोग मिला तो स्थाई सरकार के न बन पाने के चलते इस सुकृत्य को हम तो सम्भव ही मान रहे हैं। अब यह दूसरी बात है कि राजनीतिक दल आपसी समझौते के द्वारा कोई स्थायी सरकार बना लें और हमारी आकांक्षाओं पर पानी फिर जाये। राजनीतिक दलों की बातों का कोई भरोसा नहीं आज लड़ेंगे कल एक हो जायेंगे, चोर-चोर मौसेरे भाई। फिर हम तरस जाएंगे बिजली महरानी के दर्शन को। इस चुनावी मौसम के फ़ायदों को देख कर हम तो यही रट लगाये हुए हैं कि- ‘बार-बार दिन यह आये’।
                                                                    -शालिनी

Thursday 9 February 2012

किसानों को अपमानित न करो यारों।

     इस देश में किसानो के प्रति जैसा असम्मान है वैसा विश्व के किसी भी देश में नहीं है। जिस देश को कृषि प्रधान कहा जाता हो। जिस देश के विकास में कृषि का योगदान महत्वपूर्ण हो, जिस देश में कृषि उत्पाद कम या अधिक होने पर देश की अर्थव्यवस्था प्रभावित होती हो, जिस देश की आत्मा गांवों में बसती हो, उस देश में किसानों की दुर्दशा पर आंसू बहाना बर्दास्त के बाहर है। कम से कम देश के प्रधानमंत्री या वित्तमंत्री ने किसानों की इज्जत का ख्याल किया और अपने बजट पूर्व विमर्श में उद्योगपतियों को शामिल किया, अन्य वर्गो से बात की लेकिन किसानों की समस्याओं को सुना तक नहीं। दरअसल किसानों की कोई समस्या है ही नहीं जिस पर प्रधानमंत्री एवं वित्तमंत्री उनसे बात करते। मेरी नजर में भी किसान खुशहाल है। लेकिन लोगों को कौन समझाए। वे प्रधानमंत्री की नीयत में खोट का रिसर्च कर रहे हैं। उन्हें करने दीजिए रिसर्च, क्योंकि कम से कम वे अपनी रचनात्मकता का उपयोग तो कर रहे हैं न वरना अन्ना एवं रामदेव के साथ वे अपना समय जाया करेंगे। 
     यह विचार करने का प्रश्न है कि जिस देश का किसान अपनी फसलों को सड़कों पर फेंक देता हो वह गरीब कैसे हो सकता है। वह तो इतना संपन्न है कि उसे अपने उत्पादित माल को सड़कों पर फेंकना पड रहा है। जिस देश में किसान इतना संपन्न होंगे वहां क्या कोई विश्वास कर सकता है कि वे आत्महत्या करने तक को उतारू हो जाएंगे।  
     जब 25-30 रूपये आमदनी वाले को सरकार ने गरीब मानने से इनकार कर दिया था तो मुझे पहली बार यह लगा कि वर्तमान सरकार लोक कल्याणकारी सरकार है। और यह मानकर चल रही है कि भला किसी का कर न सको तो बुरा किसी का मत सोचो। लेकिन जल्द ही यह मेरे मन का वहम निकला और सरकार ने 25-30 रूपये प्रतिदिन कमाने वाले को अमीर मानने से इनकार कर दिया। कुछ देश द्रोही तत्वों ने सरकार के इस कदम की जमकर आलोचना की थी लेकिन मेरा सीना तन कर 11 फुट चौड़ा हो गया था क्योंकि जब मैं सुबह जगा तो अमीर हो गया था।
     सरकार के रूख में विरोधाभास भी नजर आता है। एक ओर किसानों अमीर मानकर उनसे बजट पूर्व विमर्श नहीं किया जाता तो दूसरी ओर मंचों से माननीयों द्वारा उनकी दशा पर खूब आंसू बहाया जाता है। देश का शायद ही कोई मंत्री हो जो कृषि एवं किसानों की दुर्दशा पर आंसू न बहाता हो। किसानों के सारे तर्क कि उनकी स्थिति इस देश में दीन-हीन नहीं। माननीय सदस्यगण इतने दयालु न बने, क्योंकि ये उन्हें रिएक्शन कर जा रहा है।  किसानों को मजबूरी में यह भी बताना पड़ रहा है कि वे गरीब नहीं बल्कि इतना अमीर हैं कि वे अपनी फसलों को मुफ्त में दे दे रहे हैं यानी सड़को पर फेंक रहे हैं। 
     आइए! थोड़ा हम किसानों के घावों पर मरहम लगाते हुए थोड़ी उनकी स्तुति गाएं। इस क्रम में हम उनकी तुलता नारियों से करेंगे। किसानों की भी इस देश में वैसी ही महिमा गाई जाती है जैसा कि नारियों की गाई जाती है। नारी को इस देश में देवी कहकर सम्मानित किया जाता है। घर-घर में इस देवी की कैसी पूजा होती है, इसे पूरा इंडिया जानता है। नारी और किसान एक और मामले में समान है। दोनों का त्याग देश और समाज के लिए बेजोड़ है। ये दोनों दूसरे के लिए जीते हैं। दोनों हंसते हंसते अपना तन-मन-धन देश एवं समाज के लिए उत्सर्ग कर देते हैं। किसान खेतों में दिन भर खटता है और नारियों को घरों में खटना पड़ता है। दोनों का लोग आदर करते हैं, लेकिन तब तक जब तक वे अपने अधिकारों की बात नहीं करते। अधिकारों की मांग करने पर किसानों पर गोलियां चलाई जाती है और बहु-बेटियों की होलियां जलायी जाती है। दोनों अपने दुखदर्द को दबा जाते हैं। मुख से उफ्‌ तक नहीं कहते। और चुपचाप अपनी इहलीला समाप्त कर लेते हैं।

Wednesday 8 February 2012

एक नज़र इधर भी ....

नारी जीवन आज कल का एक ऐसा विषय बन गया है जिस पर लोग जमकर लिख रहे हैं। इस विषय पर मैंने भी बहुत लिखा ,बहुत क्या शायद ज़रूर से ज्यादा ही लिखा है। क्यूँकि और लोगों की तरह मैं भी चाहती हूँ कि नारी जीवन में परिवर्तन आए इस  पुरुष प्रधान देश और समाज में हर वर्ग की नारी को बराबर का सम्मान मिले उसका अधिकार मिले। क्यूंकि मुझे ऐसा लगता है, कि हमारे समाज में हर वर्ग की नारी को अब तक उसका अधिकार और सम्मान वैसा नहीं मिला है जैसा मिलना चाहिए। आज भी छोटे-छोटे गाँव में नारी की दशा वैसे ही दयनीय है। जैसे पहले हुआ करती थी। हाँ मध्यम वर्ग और उससे ऊपरी वर्ग में जागरूकता जरूर आई हैं। तभी आज नारी हर एक क्षेत्र में पुरुष के कंधे से कंधा मिला कर चल पा रही है।
मगर फिर भी आज भी जब कहीं किसी बहन, बेटी या बहू की दहेज को लेकर की गई हत्या की कोई घटना सामने आती है, तो मन से जैसे एक आह! सी निकलती हैं, कि इतने सालों बाद भी हमारे समाज से यह दहेज प्रथा जैसी कुप्रथाओं का नाम नहीं मिट पाया है और ज़ेहन में हर वक्त, हर घड़ी एक ही सवाल कौंधता है। आखिर क्यूँ और कब तक चलेगा यह सब। अब तो पढ़ी लिखी अच्छे औधे पर कार्यरत लड़की जैसे कोई डॉक्टर हो, या फिर इंजीनियर या और कोई पोस्ट मगर उसके साथ भी ससुराल में वही सुलूक और वही दहेज की मांग और फिर दहेज ना मिले की सूरत में वही हत्या कांड, ऐसे हालातों में मुझ जैसे लेखकों (यहाँ मैं सभी लेखकों की बात कर रही हूँ) केवल एक यही माध्यम नज़र आता है। लिखने का, कि शायद इस विषय पर ज्यादा से ज्यादा लिखने से लोगों में जन चेतना जागउठे और एक क्रांति आसके जो इन कुप्रथाओं के खिलाफ एक आवाज बन सके।
मगर अफसोस की ऐसा कुछ होता ही नहीं, भले ही आज नारी मुक्ति मोर्चा जैसे कई संस्थायें है जो नारी के सशक्ति कारण के लिए बहुत से सराहनीय और महत्वपूर्ण कार्य कर रही हैं। मगर स्त्री की दशा आज भी वहीं के वहीं ज्यून की तियु ही बनी हुई है। जब भी मैं इस विषय में सोचने लगती हूँ, तो ऐसा लगता है कितना कुछ है कहने के लिए, लिखने के लिए, लोगों को समझाने के लिए, तो दूसरे ही पल फिर ऐसा लगता है क्या फायेदा इस गूंगे बहरे समाज को कुछ भी समझाने का क्यूंकि यदि इसमें इस पीड़ा को देखने सुने और समझने की थोड़ी सी भी शक्ति होती। तो कम से कम हमारे देश में विद्यमान हजारों कुप्रथाओं में से कम से कम इस एक दहेज प्रथा जैसी कुप्रथा का खात्मा तो अब तक हो ही गया होता। लेकिन वो कहते हैं

"जिस तन लागे वो तन जाने"

बस वैसा ही कुछ रवैया है, हमारे समाज में रह रहे लोगों का इस कुप्रथा के प्रति भी है, जिसकी बहू या बेटी पर यह बीतता है वहीं जानता है और समझ सकता है इस पीढ़ा को, बाकियों का क्या है आए थोड़ी देर इस विषय पर भाषण झाड़ा, दो आंसु बाहये और निकल लिए बस हो गया। मगर जिन लोगों की ज़िंदगी में उनके अपनों के साथ ऐसा भायानक वाकया हुआ है कभी उनके दिलों से पूछकर देखा है ? किसी ने बचपन से जिस नन्ही सी फूल सी गुड़िया, जैसी बेटी को पाला-पौसा उसे अच्छे संस्कार के साथ उच्च शिक्षा भी दिलवाई और उसके बाद शादी के समय पढ़ी लिखी काबिल बेटी देने के साथ-साथ दहेज भी दिया। उसके बावजूद भी माता-पिता को क्या मिला। ? बेटी पहले घर से गई और फिर दहेज के लोभियों ने उसे दुनिया से भी विदा कर दिया। यह सब सोचकर, पढ़कर, जानकर ऐसा लगता है छी..... एक ऐसे सड़े हुए विचार और इतनी छोटी सोच रखने वाले समाज का मैं भी एक हिस्सा हूँ। तब शर्म आने लगती है अपने आप पर, ऐसी सोच रखने वाले इन्सानों ने ना केवल एक इंसान बल्कि पूरी इंसानियत को बदनाम कर रखा है। समझ नहीं आता आखिर कहाँ जा रहे हैं हम?? या फिर कहाँ पहुंचे हैं हम? यदि इस विषय के दृष्टिकोण से सोचो तो लगता है कहीं गए ही कहाँ है हम, जहां कल थे वहीं तो आज भी खड़े हैं।
वैसे तो में भूर्ण हत्या के सख्त खिलाफ हूँ, मगर जब ऐसा कुछ पढ़ने में आता है कि कुछ मुट्ठी भर लोगों का दबदबा इस समाज में हजारों, लाखों लोगों के अस्तित्व से कहीं ज्यादा है तो ऐसे में यह भूर्ण हत्या भी गलत नज़र नहीं आती मुझे, भले ही उसके लिए वह माँ खुद भी कितनी बड़ी दोषी क्यूँ ना हो, भले ही लोग उसे कितना भी यह कह-कह कर क्यूँ न कोसते हों ,कि एक औरत होकर भी दूसरी बच्ची के या दूसरी औरत के प्रति उसने भूर्ण हत्या जैसा महा पापा किया, बेटी को जन्म लेने से पहले ही मार दिया वगैरह -वगैरह मगर ज़रा आप खुद को उस स्त्री,उस माँ की जगह पर रखकर देखिये और एक बार आपने दिल, अपनी आत्मा से सोचिए कि जिस माँ को यह डर हो कि उसकी संतान के साथ भी बड़े होकर वही सब किया जाएगा, जो उसके साथ हुआ जैसे दहेज के लिए दी गई यातनाएं या फिर आदिवासी समाज में महिलाओं को निर्वस्त्र करके सारे आम भगाना या नचाना आए दिन होते बलात्कार सारे समय असुरक्षा की भवाना, चाहे बच्ची कि उम्र हो या औरत की नारी जीवन को सदा ही एक अग्नि परीक्षा बनाते हैं लोग, ऐसे हालातों में भला कौन माँ चाहेगी अपनी बेटी को इस अग्निपरीक्षा से गुज़ारना। 

लेकिन ख़यालों का क्या है, वो तो बस आते-जाते हैं, पल में तोला, पल में माशा ....जब दोनों पहलुओं पर ग़ौर करके देखो तो एक बार यह ख्याल भी दिलो दिमाग पर दस्तक देता है, कि नारी के प्रति हर तरह से बढ़ रहे अत्याचार के लिए हम केवल पुरुषों को ही जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते। कहीं न कहीं इस सब के पीछे खुद नारी  भी उतनी ही जिम्मेदार है जितना कि यह पुरुष वर्ग, क्यूंकि जिस तरह से आज कल के आधुनिक दौर में जिस तेजी से नारी का पहनावा और सोच बदली है। वही सोच कहीं न कहीं जिम्मेदार है इस आए दिन घटती बलात्कार और छेड़छाड़ जैसी घटनों के लिए। क्यूंकि अंगप्रदर्शन करने वाले वस्त्र पहनकर सारे आम घूमना, खुद को आधुनिक युग का दिखाने के चक्कर में शराब और सिगरेट पीना, देर रात तक बाहर क्लबों में जाना और घूमना यही सब बढ़ावा देता है पुरुषों को इसमें उन बेचारों की भी भला क्या गलती। आग को हवा तो खुद औरतें ही देती हैं। 

मगर हाँ जितनी यह बात सच है उतना ही कड़वा सच यह भी है,कि इस सब मामलों में ज्यादा तर गरीब,लाचार और मजबूर औरतें ही पिसा करती हैं। कुछ को भूख और गरीबी के कारण जानबूझ कर इस नर्क की आग में कूदना पड़ता है, तो कुछ मासूम बच्चियाँ शिकार हो जाती है इस समाज में हवस के भूखे घूम रहे भेड़ियों का, मेरे कहने का मतलब है कि यह जरूरी नहीं कि इन सब मामलों में हमेशा पुरुष वर्ग ही गलत हो कुछ हद तक गलतियाँ औरतों कि भी हुआ करती है। पता नहीं कुछ लोग (यहाँ मेरा तात्पर्य कुछ महिलों से है) कुछ लोग यह क्यूँ भूल जाते हैं

"ज़माना चाहे कितना भी क्यूँ ना बदल जाये, 
नारी हमेशा नारी और पुरुष हमेशा पुरुष ही रहेगा" 

एक नारी के लिए उसके जीवन के कुछ नैतिक मूल्य है और ऐसा नहीं है, कि यह नैतिक मूल्य केवल नारी के लिए ही बनाए गए हैं पुरुष वर्ग के लिए भी हैं। आखिर कुछ तो सोचा होगा और अनुभव किया होगा न हमारे बुज़ुर्गों ने भी...जिसके चलते उन्होने दोनों वर्गों के लिए कुछ नियम, कायदे, कानून बनाये। जिनका पालन यदि दोनों ही वर्ग सही ढंग से करने तो शायद संतुलन बना रहेगा लेकिन ऐसा हो नहीं पाता है। अंधी आधुनिकता की दौड़ में नारी खुद अपनी मान-मर्यादा सब कुछ दांव पर लगाने को तयार है, केवल खुद को आत्मनिर्भर बनाने और पुरुष से बराबरी दिखाने के लिए आज कल लड़कियां क्या कुछ नहीं करती। हाँ यहाँ इतना ज़रूर कहना चाहूंगी, कि हर क्षेत्र में ऐसा नहीं है। मगर कुछ एक ऐसे क्षेत्र हैं, जहां महिलायें खुद पूरी तरह से अपनी मर्यादा भूलाने के लिए सहजता से तयार हैं। मैं भी आज के जामने कि ही एक महिला हूँ। मगर तब भी मुझे बहुत आश्चर्य होता है महिलाओं की  ऐसी सोच पर सब कुछ गवा कर मर्यादा और आत्मसम्मान को खोकर यदि आपने कुछ पा भी लिया जीवन में तो क्या आप खुश रह सकते हैं और अपने साथ-साथ अपने से जुड़े लोगों को खुशी दे सकते है??? जहां तक मेरी सोच कहती है नहीं क्यूंकि मेरा ऐसा मानना है कि जब तक 

"कोई भी इंसान यदि स्वयं अंदर से खुश नहीं होगा, 
वो औरों को भी कभी खुश नहीं रख पाएगा" 

यह सब मैं इस लिए कह रही हूँ क्यूंकि जिस तरीके से आजकल रुपहले पर्दे पर औरतों के पहनावे के द्वारा आश्रलीलता लोगों के सामने परौसी जा रही है। उससे तो यही सब बातें सामने आती है जो मैंने ऊपर लिखा पहनावे के नाम पर तो जैसे आजकल केवल अंतर वस्त्र ही रह गए है औरतों के लिए.....यह सब विदेशी संस्कृति हैं। जिसने आज की युवा पीढ़ी की सोच पर पूरी तरह काबू पा लिया है। इसलिए हम लोग यह भूल गए हैं कि एक औरत के लिए ज़माना कभी नहीं बदलता। उसके लिए उसके जो आदर्श और उसूल कल थे। वही आज भी हैं और जिन्होने यह आदर्श और उसूल आज भी बचा कर रखें हैं वह आज भी सुरक्षित हैं तभी दुनिया उन्हें सम्मान की दृष्टि से देखती है और जिन्होने इन्हें खो दिया है उन्हे तो बड़ी आसानी से आप अपने आस-पास देख ही सकते है।

ज़रा सोचिए यदि ऐसा ना होता तो क्यूँ पुरुष वर्ग बाहर चाहे जितनी भी आइयाशी क्यूँ ना करते हों, मगर खुद के घर कि बहू बेटियों को एक आदर्श भारतीय नारी के रूप में ही देखना चाहते है। आज भी जब कोई लड़का शादी के लिए लड़की देखने जाता है तब भले ही आज कल के महंगाई के दौर में उसकी पहली शर्त नौकरी वाली महिला हो मगर तब भी उसकी इच्छा यही होती है, कि जब भी वो घर पर लौटे उसकी बीवी उसे घर में बच्चों के साथ मिले अगर मैं गलत हूँ तो कह दीजिये ऐसी मंशा नहीं होती पुरुषों में, आप सब ही बताइये की इन सब समस्याओं का कारण आखिर है क्या ? सामाजिक सोच या बदलती संस्कृति के चलते तेजी से बदलती मानसिकता ? क्यूंकि बदलाव प्रकृति का नियम हैं और किसी भी संस्कृति को अपनाना कोई गलत बात भी नहीं है। मगर हाँ जिस तरह हर चीज़ के दो पहलू होते हैं, एक अच्छा एक बुरा वैसा ही कुछ संस्कृति में भी होता होगा ना!!! तो हमको जरूरत है उस दूसरी संस्कृति के वो अच्छे पहलू को अपनाने की जिनसे हमारे जीवन और हमारे समाज का कुछ भला हो सके। हमें कुछ अच्छी और नई सोच मिल सके, न कि उस नकारात्म पहलू को अपनाने की जिसके चलेते हम खुद अपनी संस्कृति ,सभ्यता ,और संस्कारों को स्वयम ही भूल जाये .....आपको क्या लगता है ...???      

Monday 6 February 2012

विधायकी चिंता

ये सर की करें चिंता    या    कार की करें ।
या दिल से जुड़े माफिया सरदार की करें ।
झंझट ये हैं विधायक  ,   मजबूरियाँ भी हैं ,
चिंता  करें  तुम्हारी या  घर-बार   की   करें । 

Sunday 5 February 2012

बना है भीड़तन्त्र

1.

मुद्दों को हम भुला दें , डालें जब भी वोट |
लोकतंत्र में फिर सभी , निकालते हैं खोट ||
निकालते हैं खोट , भूलकर अपनी गलती |
पछताते उस वक्त , चोट जब गहरी लगती ||
जब भी डालो वोट, जाति-धर्म सब भुला दो |
कहे विर्क कविराय , मुख्य मानों मुद्दों को ||

2.

उठती न बात देश की , हो मुद्दों की हार ।
जाति - धर्म जैसे कई, उगते  खरपतवार ।।
उगते खरपतवार, वोट के दिन जब आते ।
यूं रहते हैं गौण , इस वक्त रंग दिखाते ।।
लोकतंत्र की साख , इसी कारण है गिरती 
बना है भीड़तन्त्र, ऊँगली इस पर उठती ।।

-------- दिलबाग विर्क 

* * * * *

Saturday 4 February 2012

खूब "घुटा-लो" शीर्ष, खुदा तक चाहे जाओ ।।

खूब "घुटा-लो" शीर्ष, खुदा तक चाहे जाओ ।।

घमंडी की मंडी
जाओ जाना है जहाँ, लाओ फंदा नाप ।
मातु विराजे दाहिने, बैठा ऊपर बाप ।

बैठा ऊपर बाप, चित्त का अपने राजा ।
मर्जी मेरी टॉप, बजाऊं स्वामी बाजा ।

उच्च-उच्चतम दौड़, दौड़ कर टाँग बझाओ ।
खूब "घुटा-लो" शीर्ष, खुदा तक चाहे जाओ ।।

चले-छुक छुकछुक-गाड़ी--

गाड़ी छुक-छुक चल रही, तेइस घंटे लेट ।
चौदह को निश्चित करे, वेलेन्टाइन डेट
वेलेन्टाइन डेट, बैठिये वेले नाहीं ।
लव-आईन का बन्ध, देखिए प्रेम-सुराही ।
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आँट-साँटकर भेंट, खेल कर प्रेम-खिलाड़ी।
 गत नाड़ी की तेज, चले-छुक छुकछुक-गाड़ी ।।

Friday 3 February 2012

ये बलात्कारी डॉक्टर!!

     चौंकिए नहीं साहब! यह बलात्कार वैसा नहीं है जो आप समझ रहे हैं और डॉक्टर भी वो नहीं जिसे आप जान रहे हैं। यह शब्दों के साथ बलात्कार है और बलात्कारी हैं पी-एच.डी. उपाधिधारी डॉक्टर। आपके समक्ष कुछ वाक्य रख रहा हूँ ज़रा ध्यान दें-
     'मिशिरा जी नमस्कार! अभी-अभी पसिंजर ट्रेन आ रही है आज हम थोड़ा लेट हो गये, पहले अपनी उपस्थिती दर्ज करा लूँ। क्या कहूँ बभनान की लाइट ऐसी है, अपने प्रिंसिपल साहब की भी अज़ीब व्यवस्था है, जमरेटर भी नहीं चलवा देते। भला बताइए काम कैसे हो? अच्छा जो वह पी.जी.टी. की वांट निकली है उसकी मिनिमम अहरता देखना था आपकी लाइब्रेरी में वो वाला अकबार मिल जाएगा?' तभी एक साहब और आए और बोले कि हमारा कल फंक्शन में एलाउंसमेंट कैसा था मिशिर जी? और उनके एनाउंस पर ग़ौर करें- ‘...बस अभी चन्द्र क्षणों में मुख्य अतिथि जी मंच पर पधारने वाले हैं।’
     उपर्युक्त वाक्यों को पढ़कर क्या आप सबको यह नहीं लग रहा है कि शब्दों के साथ जाने-अंजाने बलात्कार हुआ है तथा यह बलात्कार करने वाले और कोई साधारण व्यक्ति नहीं बल्कि लब्ध प्रतिष्ठ डॉक्टर संवर्ग (पी-एच.डी. उपाधि धारक) के लोग हैं।
     महाविद्यालय के पुस्तकालय में नौकरी करने के नाते मेरा पाला ऐसे अनेक डॉक्टरों से पड़ता रहता है। एक तो अंग्रेजियत की कृपा से मिश्र-मिश्रा, गुप्त-गुप्ता का अन्तर वैसे भी समाप्त हो गया है तिस पर यह पढ़े-लिखे डॉक्टर ही शब्दों के साथ इस प्रकार का व्यवहार करेंगे तो विद्यार्थियों और आम लोगों की क्या बात की जाये। वैसे भी श को स तथा स को श कह देना आम है जिस पर ध्यान भी नहीं दिया जाता किन्तु और अनेक महत्त्वपूर्ण शब्द गलत उच्चारण की परम्परा के चलते अपना अस्तित्व ही खोते जा रहे हैं। उपस्थिति एवं परिस्थिति कब उपस्थिती और परिस्थिती में बदल गयी पता ही नहीं चला तथा वही सही लगने लगा। 95 प्रतिशत पढ़े लिखे लोग अर्हता को अहरता पढ़ते हैं और बोलते भी हैं। शब्दों के साथ इस बलात्कारी प्रवृत्ति का यदि व्यापक विरोध नहीं हुआ तो निकट भविष्य में ही शब्दकोशों को बदलना पड़ेगा और नये शिरे से गलत शब्द वाले शब्दकोशों को हमें स्वीकार कर लेना होगा। आशीर्वाद कब का आशिर्बाद हो चुका है। मेहनत मेनहत में परिवर्तित हो चुकी है। एनाउंस को एलाउंस कहना आम बात है। यह सब कोई अनपढ़ कहता तो चलता पर पी-एच.डी. उपाधि धारक यदि ऐसा अपराध करें तो इसे एक अक्षम्य बलात्कारी उद्योग माना जाना चाहिए। आप सब मेरी बात से कहां तक सहमत हैं अवश्य बताने की कृपा करें।

कमेंट बाई फ़ेसबुक आई.डी.

Thursday 2 February 2012

असंभव संभव है-

     आज तक वैज्ञानिकों ने जो नहीं किया वह राजनेताओं ने कर दिखाया। उत्तर प्रदेश में चल रहे वैज्ञानिक सम्मेलन में विभिन्न दल अपने-अपने शोध-पत्र यानी चुनावी घोषणा-पत्र प्रस्तुत कर रहे हैं। इस घोषणा-पत्र पर नजर डालने से विभिन्न पार्टियों द्वारा खोजी गई  नई चीजों के बारे में पता चलता है।  शोध-पत्रों से जहां पार्टियों का विज्ञान के प्रति उनके प्रेम का पता चलता है वहीं  दूसरी ओर उनका मानवता के प्रति सेवा-भाव भी झलकता है। सचमुच जिस देश का राजनेता भी वैज्ञानिक खोजों में रूची रखता हो, उस देश को आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता।  जीवन को सुलभ बनाने में नेताओं का योगदान काबिलेतारीफ है। विज्ञान सम्मेलन.यानी चुनावी सम्मेलन में प्रस्तुत शोध-पत्र  को सुनकर लोग यह सोचने को भी मजबूर हो गये कि जिसे हम घोटाला के रूप में जानते हैं, कहीं वह हमारे देश-भक्त राजनेताओं का नूतन प्रयोग तो नहीं। मुझे तो राजनेताओं के चुनावी घोषणा-पत्र को पढ़कर लगा असंभव वाकई संभव है। पहले इसे मैं नेपोलियन का बड़बोलापन मानता था। 
     क्या उत्तर प्रदेश चुनाव से पहले कोई छात्र यह कल्पना कर सकता था कि उन्हें लैपटॉप भी फ्री में मिल सकता है। लेकिन नेताओं ने इसे संभव कर दिखाया। मुलायम सिंह के नेतृत्व वाली वैज्ञानिकों की टीम ने एक ऐसी खोज की है जिससे मानव जीवन में क्रांतिकारी बदलाव आएगा। इस टीम की खोज के बदौलत छात्रों को मुफ्त में लैपटॉप मिलेगा। हालांकि ऐसी खोज कर लेने का दावा तमिलनाड़ु चुनाव में भी किया जा चुका है। लेकिन धरातल पर खोज के नतीजे अबतक सामने नहीं आए हैं। फिलहाल आप विश्वास कीजिए क्योंकि संशयआत्मा विनष्यति। 
     इसके पहले टेबलेट आकाश को एक बड़ी खोज के रूप में देखा जा रहा था। और माना जा रहा था कि इसके मार्केट में आ जाने पर उन लोगों को भी इंटरनेट पर काम करने का सपना पूरा होगा जिसके लिए यह अब तक दूर की कौड़ी रहा है। 
     संभव है राहुल गांधी के नेतृत्ववाली वैज्ञानिकों की टीम मुफ्त में कुछ और देने की टेक्नोलॉजी डेवलप कर दे। वैसे दिग्गिराजा के नेतृत्व में भी एक टीम खोज में लगी है। और इस टीम ने इस बात का पता लगाने का दावा किया है कि बटलाहाउस इनकांउटर फेक था। उमा भारती वाली वैज्ञानिकों की टीम भी जोर-शोर से खोज में लगी है। अगर इस टीम ने मुफ्त में कार  देने की टेक्नोलॉजी खोज दी तब तो जनता की बल्ले-बल्ले होने से कोई नहीं रोक पाएगा। अमर सिंह की टीम भी किसी बड़ी खोज में लगी हुई है। मायावती के नेतृत्ववाली टीम, जो मुर्तियों पर अपने अनुसंधान करने के लिए जानी जाती है। इस सम्मेलन में लोगों को बता रही है कि मुर्तियां बड़े काम की चीज है। यह लोगों का पेट भी भर सकती हैं। 
     हालांकि नेताओं के इस खोज में कमियां ढ़ूंढने वाले भी कम नहीं हैं। अन्ना हजारे एव रामदेव की टीमें उनके खोजों का हवा निकालने में भी लगी है। खोज प्रेमी अन्ना हजारे भी भ्रष्टाचार के टीके की खोज अबतक नहीं कर पाए हैं। हालांकि उन्होंने  लोगों को जुटाकर खुब हो-हल्ला किया और करवाया। बाबारामदेव को भी यह वहम हो गया था कि रोगों का ईलाज करने जैसा हीं आसान भ्रष्टाचार के टीके की खोज करना है। लोकपाल का माला जपना तो आसान है लेकिन इसकी तार्किक अनिवार्यता सिद्ध करना संभव नहीं है। आखिर इस उत्तर आधुनिक युग में लोकपाल की क्या आवश्यकता है। ग्लोबलाइजेशन के इस युग में जब हर चीज का उदारीकरण हो रहा है। अनावष्यक प्रतिबन्धों को हटाया जा रहा है। चाहे वह नैतिकता के रूप में हो या किसी अन्य रूप में। तो भला लोकपाल जैसे प्रतिबन्धात्मक कानून की क्या आवश्यकता है। लोकपाल भी एक अनावश्यक प्रतिबन्ध है जो नेतागिरी के विकास में बाधक है। अगर व्यक्ति को धर्म करम हीं करना होगा तो वह राजनीति में क्यों आएगा। किसी मठ का मठाधीश नहीं बनेगा।  स्वतंत्रता आंदोलनवाली बात तो अब रही नहीं कि नेता आदर्श के लिए मरे-मिटे। 
     राजनेताओं की खोजी प्रवृत्ति इसी तरह जारी रही तो आईटी कंपनियां प्लेसमेंट के लिए विश्वविद्यालय कैंपस की जगह पार्टियों के दफतरों में जाएंगी। यह भी सच है कि हर चीज का फायदे के साथ-साथ नुकसान भी होता है। राजनेताओं ने वैज्ञानिकों की जगह लेकर उनकी रोजी-रोटी पर भी सवाल खड़ा कर दिया है। वैसे कई और क्षेत्रों में राजनेताओं के चलते लोग बेरोजगार हो चुके हैं। 
     मेरा बेटा मुझसे एकदिन हवाई जहाज खरीदने की जिद कर रहा था । मैंने कहा कि बेटा उत्तर प्रदेश चुनाव सम्पन्न होने का इंतजार कर लो क्या पता कोई दल तुम्हें हवाई जहाज खरीदकर दे दे। अगर कोई दल नहीं देगा तो मैं तुम्हें खरीद दूंगा। बताइए मैंने ठीक कहा है न। मैं आपसे भी कहना चाहूंगा कि धैर्य रखिए एवं नेताओं की क्षमता पर भरोसा रखिए वे एक दिन आपको सब कुछ मुफ्त देने की स्थिति में होंगे।

Wednesday 1 February 2012

ख़याल...



एक कप कॉफी और ख़यालों का साथ जैसे हो चोली दमन का साथ 
और इन्हीं ख़यालों की इस उधेड़बुन सी ज़िंदगी में 
हजारों लाखों आते-जाते,पल-पल में बदलते ख्याल 
इन ख़यालों से जैसे दिन रात जूझती सी ज़िंदगी 
कभी भरी सड़क पर भी जब निकलो अकेले यूं ही  
तो साथ होता है दिल और दिमाग में चल रहे न जाने कितने जाने-अंजाने 
से अपने पराये से कभी धूप तो कभी छाँव से ख़यालों का साथ   
जिनका न कोई सर होता है न पैर एक पल हम कुछ सोचते हैं 
तो दूजे ही पल कुछ और तब आस पास क्या हो रहा है क्या नहीं 
इस सब से कोई फर्क नहीं पड़ता उस वक्त
ऐसी मनःस्थिति मे बस इतना ही मन करता है कि चलते ही चले जाओ दूर कहीं ... 
बहुत दूर..जहां शायद कभी ख़त्म हो सके यह विचारों की उलझन 
ऐसी में अगर मिल भी जाये हमसफर कोई 
तो भी खलने लगता है उसका भी साथ कभी-कभी 
जहां उसको अपनी मन की बातें कहते हुए भी बहुत कुछ ऐसा होता है 
जिसे अक्सर छुपा जाते है हम तब न दिल को चैन मिलता है न दिमाग को शांति 
बस उबलते पानी से ख़याल जैसे उबलते ही रहते है हमारे अंदर कहीं न कहीं, 
समझ ही नहीं आता क्या हो रहा है क्या चल रहा है
जैसे नशे में हो कोई, या फिर हो कोई मौन संवाद 
जिसे आँखों से देखकर केवल महसूस किया जा सकता है 
जहां बस चुप रहकर देखा करते हैं हम अपने ही उस दिलो दिमाग के अंतर द्वंद को 
जैसे यह हमारे मन के भाव नहीं किसी और के मनोभाव हों,
जिसमें हम किसी चलचित्र की तरह खुद को ही पात्र रूप देख रहे हो      
तब ना किसी की सलाह अच्छी लगती है, न दखल
मन जैसे बस ख़यालों में ही डूबता चला जाता है   
ऐसे में अचानक महसूस किया है क्या कभी ? 
"एक कप कॉफी" की महक को 
जो सासों के जरिये अंदर तक उतरकर सुकून पहुंचा जाती है 
न सिर्फ तन को बल्कि मन को भी कहीं और तब ऐसा लगता है 
उस वक्त जैसे किसी ने नींद से जगाकर पूछा हो कॉफी पीनी है क्या 
दूजे ही पल खुद को वर्तमान में पाते है हम और 
फिर साथ होता है एक बार फिर "एक कप कॉफी" और ख़यालों का साथ    

लिखिए अपनी भाषा में

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