Monday 25 June 2012

जनता   ने   उम्मीदों का    सूरज  था  जिनको माना |
अपने  सुख-दुःख का  उत्तरदायी था जिनको जाना |
आज   वही   कुर्सी   में  फंसकर   भूल  गए है  इसको |
अपनी  स्वार्थ-साधना  से ही  फुरसत नहीं है  उनको |
जिन्हें  सुनाई देती है  जनता की  करुण पुकार नहीं |
जनसेवा की डींग मारने  का उनको अधिकार नहीं | 

Friday 22 June 2012

जाति-व्यवस्था पर एक फ़ेसबुकीय परिचर्चा

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के एक हमारे सीनियर सुमन्त भट्टाचार्य सर ने फ़ेस बुक के एक समूह पर जाति व्यवस्था पर आधारित समस्या से सम्बन्धित सवाल उठाया है और उसपर कुछ उपयोगी टिप्णियां भी आयी हैं मैं उसको वैसे का वैसे यहां प्रस्तुत कर रहा हूं आप सब भी अपनी अनमोल टिप्पणियां देकर इस चर्चा में सकारात्मक रूप से भाग ले सकते हैं-

फेसबुक पर जातीय आधार पर समूहों का निर्माण देख रहा हूं। समर्थन में तर्क दिया जाता है कि जातीय समूहों में शामिल हुए वगैर जातियों में फैली खामियों को दूर नहीं किया जा सकता है। मेरा सवाल है कि क्या हम जाति की गंदगी दूर करने के एवज में जाति व्यवस्था को और मजबूत नहीं करते। जाति को स्वीकार नहीं करते। जाति को सामाजिक स्वीकृति नहीं दिलाते। मेरा सवाल इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के उन छात्रों से हैं, जिन्होंने वैचारिक तौर पर अपना अजातिकरण कर लिया है, या फिर जो इस प्रक्रिया में हैं। कृपया अपनी टिप्पणी में किसी जाति विशेष का उल्लेख ना करें। आशय सिर्फ बौद्धिक समाज के दृष्टिकोण को समझना है। सो बहुत ही संतुलित तरीके से राय रखें।
 ·  ·  · 17 जून को 22:09 बजे

  • Ranish JainVibhas AwasthiShailendra Pratap Singh और 19 अन्य को यह पसंद है.

    • Divyendra Shekhar Gautam sir main iski prishthboomi nahi janta lekin main ek bat ka samarthak hoon ki ham jati ki bat kisi bhi roop men aise manch par na kare kyonki mera yah manna hai ki yahan aanewala shayad apni jati se upar uth chuka hota hai,aur agar nahi utha hota hai to jatiwad ko baudhik jama pahna deta hai.meri rai hai ki baudhik bahas ke kram me kahin bat gadbad na ho jaye


      17 जून को 22:25 बजे ·  · 6

    • Sumant Bhattacharya 
      दिव्येंद्रु, जाति का प्रपंच इतना सहज और सरल नहीं है। जाति खास किस्म के परिवेश में काम करती है। हम अपना सरनेम हर गली मोहल्ले में ढोते हैं। पेशेवर दुनिया में जाति के नाम पर आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा मांगते हैं। और गौर करने लायक तो यह है कि बंगाल की तरह हिंदी पट्टी में अभी तक समाज के गर्भ से समाज के संकुचित मानस के खिलाफ कोई आंदोलन नहीं फूटा। आर्य समाज और दूसरे सभी आंदोलन आयातित आंदोलन थे, जो किसी और समाज से निकले और आंशिक तौर पर हिंदी पट्टी में स्वीकृत और खारिज हुए।


      17 जून को 22:48 बजे ·  · 4

    • Divyendra Shekhar Gautam maine nahin dhoya.mere father ne badalne ki koshish ki.mujhe achha lagta hai ki mera surname nahin hai aur log meri jati poochhne se darte hain.sir ye bhi nahin chalega ki jati samooh banane ki koi kharab koshish yahan ho.jativad.............kisi bhi roop me kisi bhi tarike se nahi chalega.


      17 जून को 22:54 बजे ·  · 7

    • Arun Kumar Singh 
      sumantji apne accha vishay uthaya hai. log ashiksha ko iska karan batate hain aur gramin parivesh ko iska janak batate hain, par main aisa nahi manata. Jab justice ki baat hoti hai to gaon ke log jaatigat agrahon se upar uth jaate hain jabki rojmarra ki jindagi mein vahan jaati ka ullekh kiye bagair koi baat nahi hoti.Iske ulat hamare shikshit aur shahari samaj mein hum jaati ka rojmarra ke mamlon mein bilkul ullekh nahi karete parantu mamla chahe justice jaise sarvbhaumik mulya se kyon na juda ho hum jaati se upar nahi uth pate.Mujhe khushi hogi yadi log mujhe galat saabit kar dein, par lagata hai shiksha hamein chalak banati hai ,samajhdaa


      18 जून को 04:45 बजे ·  · 6

    • Arun Kumar Singh ‎...r nahi.


      18 जून को 04:46 बजे ·  · 1

    • Raju Jaihind ना जाती-धर्म-भाषा ,, बस देशप्रेम परिभाषा .!!.......जयहिंद .!!!!


      18 जून को 04:51 बजे ·  · 4

    • Sumant Bhattacharya 
      हमारे मित्र और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर अश्विन कुमार ने एक किताब लिखी है, कम्युनिटी वॉरियर। बिहार में नक्सलवाद के संदर्भ में लिखी यह किताब जाति राजनीति के कई सारे आयामों का खुलासा करती है। कैसे जातीय योद्धा पैदा होते हैं। कैसे उन्हें जातीय गौरव स्थापित किया जाता है। इसमें एक मुद्दा यह भी है कि किस तरह से व्यवस्था के लाचार होने के बाद कोई इंसान अपनी जाति की संख्या में सुरक्षा तलाशता है। अरुण भाई, सुरक्षा और अवसरों की छीना छपटी में जाति आज की राजनीति में प्रमुख औजार बन चुकी है और कमोबेश हममें से हर कोई इसका कहीं ना कहीं इस्तेमाल करता है।


      18 जून को 07:38 बजे ·  · 3

    • Sumant Bhattacharya राजू भाई..जिस प्रदेश में बैठकर आप यह नारा दे रहे हैं, वहां की राजनीति की सच्चाई ही जाति है। नारों से वास्तविकताओं को नहीं नकारा जा सकता है।


      18 जून को 07:39 बजे ·  · 2

    • Ravish Shukla sir kuch log jaatiye kattarata se grast hai..jaativaadi kattrata me apni rajneetik mahtwakanchaye chipaaye logon ka gut banane par tule hain..


      18 जून को 09:53 बजे ·  · 3

    • Raju Jaihind सुमंत जी ,, अगर बात में दम हो तो आवाज दूर तलक जाती भी है ..और सुनी भी जाती है ,,..क्या इस सन्दर्भ में ' लोकतंत्र के चारों खम्भों ' ने कभी कोई कोशिश की .? मुक्तिबोध जी के शब्दों में ' बौद्धिक क्रीतिदास ' जुगाली करता रहा ...वक्त बदलता है ..कोशिश भी करनी पड़ती है ...,, और कामयाबी भी मिलती है ..आमीन .??......................जयहिंद .


      18 जून को 12:30 बजे ·  · 8

    • Mrittunjai Srivastava क्या बात है सर!!


      18 जून को 19:09 बजे ·  · 2

    • Kamlesh Pandey 
      venerable sumant sir, it has been a long process of sanskritisation and desanskritization . caste and race was a myth initially. human being can only be classified in terms of blood group ,color , genetic code ,hair, eyes etc. but there is ...




    • Divyendra Shekhar Gautam dosto bahut dino se LALLA ke member ban chuke mere aur raka ke priya dost kamlesh(PP) ab sakriy roop men shamil ho gaye.welcom.apne sabhi sathiyon ko batana chahunga ak nivedan ke sath ki pahle se hin bahut unche LALLA ke baudhik bahas ka star bahut uncha hone wala hai.........WELCOME............KAMLESH



    • Jyoti Mishra kamlesh ki sakriyta mujhe bohat achhi lagi....lalla pariwar inki sadi ki sal girah par apni aseem shubhkamnaye kal hi de chuka hai, vishayo par gahri paith kamlesh ki visheshta hai......charcha me mza aayega....




    • Shailendra Pratap Singh jati-vyavasthaa ek abhishaap hai to lekin kya Sumant Bhattacharya ki is baat se inkaar kiya ja sakta hai ki aaj ki uttar-bharteey raajneeti ki yah ek sachchaai hai. kintu sath hi main yah bhi sochta hoon ki jo vyavasthaa sadiyon se chali aa rahi hai wah khatm hone me bhi samay legi. prayaas avashy chal rahe hain par unki gati aur tej karne ki aavashyakta hai.



    • Arun Jaihind 
      बडे ही अचरज का विषय है की जाति नामक पूँछ जो विलुप्त सी होती जा रही है..... वर्तमान सामाजिक सन्दर्भों मे भ्रस्टाचारी-व्यवस्था एवं इसके रहनुमा....वर्चस्व बनाये रखने के लिए भले इसका सफलता पूर्वक प्रयोग कर ले रहे हों...किन्तु दहेज़-हत्या से लेकर दहेज़ के नाम पर लूट के प्रपंच सजातीय तत्वों द्वरा ही किये जाते हैं....हम सभी को आपात-रक्त की आवश्यकता होती है तो हमे याद ही नही रहता की अगले की जाति-धर्म-भाषा क्या है....सुमंत सर हमे विमर्श इसपर करना है की इस सच को आम आदमी तक किस प्रभावी माध्यम से पहुचाया जाये....सहमत हैं.....? एक विमर्श की प्रतीक्षा मे इलाहबाद से.........जय हिंद



    • Shailendra Pratap Singh अरुण जी, मैं आपकी बात "इस सच को आम आदमी तक किस प्रभावी माध्यम से पहुचाया जाये." से पूर्णतया सहमत हूँ. शायद इसी से गति तेज हो सकेगी.



    • Jyoti Mishra 
      jati kewal rajneeti me nhi, iski gahri paith khan-pan,rahan-sahan,phnawa,sanskaraur sabse bdi baat vyaktiyo ki sonch me jatiyon ka astitw hai.....jade atyant gahri hai, hazaro saal se ye vyawasth falta fulta rha hai......varmaan samay me ja...




    • Sumant Bhattacharya 
      कमलेश, ज्योति, दिव्येंद्र भाई और शैलेंद्र सर और अरुण सर आप सभी ने बहुत गंभीरता से विषय पर अपनी राय रखी। कमलेश ने संस्कृतिकरण का प्रश्न उठाया तो शैलेंद्र सर ने सदियों से चली आ रही परंपरा का उल्लेख किया। हैरानी की बात तो यह है कि औपनिवेशिक शासन से पहले इस मुल्क में सरनेम की व्यवस्था ही नहीं थी। श्रमण और वर्मण। श्रमण वो जो ब्राह्मण और वर्मण वो जो गैर ब्राह्र्मण। अंग्रेजों के दौर में पहली बार 19वीं सदी में सरनेम को थोपा गया। लेकिन मेरा सवाल यह नहीं है कि हम जाति के ऐतिहासिक बिंदओं की मिमांसा करें। बल्कि अवसरों की लगातार होती कमी। विकास के छद्म ढांचे के बीच संसाधनों की लूट में जातीय गोलबंदी क्या हिंदी पट्टी के विकास की राह खोल पाएगी। या फिर कभी दलित लहर और कभी पिछड़ा लहर के बीच हिंदी पट्टी, खासतौर पर यूपी का विकास मार्ग अवरुद्ध हो जाएगा। विकल्प की सियासत का लोप हो जाएगा। और लूट के आखिरी कतरे के बाद सूक्ष्म आरक्षण की राजनीति एक भयावह जातीय युद्ध की ओर यूपी को धकेलेगी। मेरी आशंकाएं ये हैं, क्या आप में से कोई सुधिजन इन सवालों पर कोई अंतरदृष्टि देगा मुझे।



    • Dinesh Verma adarneeya sumant sir kripaya is bindu par thoda aur prakash dalein ruchikar vishay hai:विकास के छद्म ढांचे के बीच संसाधनों की लूट में जातीय गोलबंदी क्या हिंदी पट्टी के विकास की राह खोल पाएगी।



    • Dinesh Verma Jyoti sir sorry I came after 5 min but the post was so busy that I could not dare to in me.



    • Sumant Bhattacharya दिनेश इस बिंदु पर अब कल बात करूंगा। आज अभी कुछ हलकी फुलकी बातें करते हैं। काफी दिनों बाद आपसे मुलाकात हुई है..आइए ऊपर सीमा जी के पान वाली पोस्ट पर चलते हैं



    • Kumar Pankaj sir ka hal ba, roj apki tiparri parne ko milti hai.


      22 घंटे पहले ·  · 1

    • Shailendra Pratap Singh 
      Sumant Bhattacharya, आप के दो बिन्दुओं पर टिप्पणी करता हूँ - 

      1. छद्म विकास की संज्ञा पूर्ण सत्य नहीं है क्यूंकि विकास निश्चित रूप से हो रहा है. मैंने बचपन में अपने गाँव में कई मजदूरों को देखा था जो दोपहर में रोटी के साथ प्याज और नमक मात्र खाते थे किन्तु आज इतना विपन्न कोई मजदूर मुझे मेरे गाँव में नहीं दिखता. 

      सोचिये पैसा न होने पर कुछ लोग गाँव से मुग़लसराय (४० किमी) पैदल जाते थे. आज मुझे ऐसा कोई नहीं दिखता, तो यह तो निश्चित है कि कुछ तो विकास हुआ ही है. हाँ, यह अवश्य है कि विकास कि गति बहुत धीमी है. 

      संसाधनों की लूट और जातीय गोलबंदी के बावजूद विकास हो रहा है और होगा. 
      हिंदी पट्टी, खासतौर पर यूपी का विकास मार्ग अवरुद्ध हो जाएगा। विकल्प की सियासत का लोप हो जाएगा। और लूट के आखिरी कतरे के बाद सूक्ष्म आरक्षण की राजनीति एक भयावह जातीय युद्ध की ओर यूपी को धकेलेगी। मैं इतना हताश नहीं हूँ. 
      हो सकता है भविष्य मुझे गलत ठहराए पर आज तो मैं इतना निराश न तो हूँ और न ही मेरा अंतस मुझे इस चरम तक सोचने कि अनुमति दे रहा है.
      2. मैं आपके इस कथन से भी असहमत हूँ कि औपनिवेशिक शासन से पहले इस मुल्क में सरनेम की व्यवस्था ही नहीं थी। 
      अ) चन्द्रगुप्त, कुमारगुप्त, समुद्रगुप्त आदि गुप्त वंशी राजा थे और गुप्त उनका सरनेम ही था. 
      ब) प्रभाकर वर्द्धन - - - हर्ष वर्द्धन आदि के नाम में भी सरनेम लगा है.
      स) पृथ्वीराज चौहान के नाम में भी उनका सरनेम है.
      द) शुंग वंशी राजा यद्यपि मूल रूप से कंधार के थे किन्तु उस समय कंधार भी भारत का ही अंग था. और इनकी राजधानी मथुरा भी रही है, ये सभी शासक अपने नाम के साथ शुंग सरनेम लगते थे.


      21 घंटे पहले ·  · 6

    • Sumant Bhattacharya शैलेंद्र सर बहुतेरी बिंदुओं पर आपने विमर्श को आमंत्रित किया है, सो इजाजत चाहूंगा कि हर बिंदु पर क्रमवार अपनी समझ आपके सामने रखूं और फिर आपसे विमर्श कर अपनी समझ और साफ कर सकूं..कहिए तो शुरू हो जाऊं,,,


      18 घंटे पहले ·  · 3

    • Shailendra Pratap Singh Sumnat ji, स्वागत है


      18 घंटे पहले ·  · 1

    • Shailendra Pratap Singh आपके प्रश्न "क्या हम जाति की गंदगी दूर करने के एवज में जाति व्यवस्था को और मजबूत नहीं करते। जाति को स्वीकार नहीं करते। जाति को सामाजिक स्वीकृति नहीं दिलाते।" के उत्तर में भी मैं यही कह सकता हूँ कि हाँ, पर जाति व्यवस्था टूट तो रही है पर इसकी गति विकास कि गति कि भी 1/1000वीं या उससे भी कम है. जाति-व्यवस्था पर चोटें तो निश्चित रूप से पड़ ही रही हैं.



    • Sumant Bhattacharya शैलेंद्र सर ...इस पर थोड़ा इत्मीनान से आया हूं,,क्या थोड़ी देर दोस्तों के साथ चकल्लस कर लूं...अभी दफ्तर से लौटा हूं,...इजाजत दें तो दोस्तों के बीच कूदी मार आऊं जाकर,..सादर


      18 घंटे पहले ·  · 1

    • Sumant Bhattacharya कुमार पंकज...तुम दंडित किए जाओगे....तुम यहां आने के बाद किसी सीनियर को नमस्ते नहीं करते...जूनियर्स से बात नहीं करते। शैलेंद्र सर ई कुमार पंकज इस वक्त हिंदी आऊटलुक में है..बहुत मेधावी पत्रकार है...मैं प्यार से इसे छोटे पहलवान बोलता हूं...सीनियर्स चाहें तो इस नाम से बुला सकते हैं।


      18 घंटे पहले ·  · 2

    • Shailendra Pratap Singh kshamaa chahta hoon, vaastav me kushaan kandhar ke the, shung to bharat ke hi the. baharhaal, mool vishay surname lagane ka tha aur wah tathy yathaavat hai.



    • Rajani Kant Singh पंचतंत्र के रचयिता विष्णु शर्मा, शंकराचार्य के समकालीन विद्वान मंडन मिश्र, जयपुर के राजा मान सिंह, मेवाड़ के राजा राणा उदय सिंह, ग्वालियर के राजा मान सिंह तोमर जैसे लोगों ने सरनेम लगाया था...जाहिर है कि ये सभी16वीं-17वीं शताब्दी से पहले थे


      14 घंटे पहले ·  · 3

    • Rajani Kant Singh जातीयता की भावना सरनेम की मोहताज नहीं है....जयप्रकाश नारायण के आंदोलन के असर से बिहार में 70-80 के दशक से सरनेम हटाने का सिलसिला शुरू हुआ...लेकिन सदियों से चले आ रहे जातीय दंभ पर इसका ज्यादा असर नहीं हुआ...इसी दौरान जातियों की अपनी-अपनी सेनाएं खड़ी होने लगीं...जातीयता की भावना नई नहीं है। कबीर दास जी को भी कहना पड़ा था कि - जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान। मोल करो तलवार का, पड़ा रहने दो म्यान।।


      14 घंटे पहले ·  · 5

    • Satish Singh 
      the Kshatriya are the nobility or ruling class. if we go by the the definition. let me say i was born satish singh got educated , did my job,was a visiting faculty for mba. lets say we have multiple identity, i am confused when did i ass...



      14 घंटे पहले ·  · 5

    • Satish Singh sir ye jati pratha kab jaati ( janewali) pratha hogi?


      13 घंटे पहले ·  · 1

    • Chandra Bhushan Mishra Ghafil 
      सभी श्रेष्ठ जनों को मेरा प्रणाम! अगर आप सब की इजाजत हो तो मैं अपनी ग़फ़लत वाली बुद्धि से कहना चाहूंगा कि जाति के प्रत्यय को हम सर्वथा अस्वीकृत नहीं कर सकते हां उसके व्यापक दृष्टिकोण को अपनाने की आवश्यकता है। जाति कहीं न कहीं हमारे विकास में सहायक ही रही है इसी लिए उसकी अवधारणा की गयी। जाति की अवधारणा में निहित स्वार्थ केवल इतना होना चाहिए कि हम विधर्मी जातियों यानी मानवेतर जातियों से अलग-थलग होकर एक जुट हों और अपना सर्वांगीण विकास सुनिश्चित कर सकें इसी उपक्रम में हम अनेक उपजातियों में विभाजित हो गये शुरुआती दौर में उसका भी उद्देश्य यही रहा कि उपजातियों के माध्यम से क्रमिक विकास करके महत्तर उद्देश्य की प्राप्ति कर सकें पर ऐसा न हो सका आज हम अपने उस महत् उद्देश्य को भूल कर सम्बन्धित उपजातियों के स्वार्थ तक ही सीमित होकर रह गये हैं। यही कारण है कि जब यदा-कदा निजी स्वार्थवश हम जाति व्यवस्था के नितान्त पक्षधर बन जाते हैं और कभी उसे समूल खारिज करने लगते हैं। जब अपने ऊपर पड़ती है तो मानवता की दुहाई देते हैं और दूसरे के लिए हम ठाकुर साहब या पंडित जी बन जाते हैं कोई यादव ऐंठकर चलने लगा तो पंडिताई या ठकुराई ख़तरे में पड़ जाती है। ऐसा नहीं होना चाहिए। प्रत्येक जातियां अपना क्रमिक विकास करके सम्पूर्ण मानवता के श्रेय को प्राप्त करें और इसमें आपस में सभी एक दूसरे के सहायक हों इस भावना का उदय कैसे हो तथा कैसे फलीभूत हो यह विचारणीय प्रश्न यह होना चाहिए न कि जाति व्यवस्था का समूल विनाश। क्योंकि यह प्राकृतिक नहीं है और ऐसा सम्भव भी नहीं है तथा होना भी नहीं चाहिए। एक साथ एक बारगी ही सभी उन्नत अवस्था को प्राप्तकर मानवता के महत्तम श्रेय को हासिल नहीं कर सकते इति आगे आप बुद्धिमानों के विचार...


      13 घंटे पहले ·  · 2

    • Dinesh Verma Gaafil sir sasamman aapki is tippadi aur vichaar janane ke liye utsuk hun ' जाति की अवधारणा में निहित स्वार्थ केवल इतना होना चाहिए कि हम विधर्मी जातियों यानी मानवेतर जातियों '


      13 घंटे पहले ·  · 2

    • Dinesh Verma gafil sir kya aapka tatpayrya maanvon se itar jatiyon se hai.


      13 घंटे पहले ·  · 1

    • Chandra Bhushan Mishra Ghafil 
      जी हां दिनेश जी मानवेतर जातियों से तात्पर्य मानवों से इतर जातियों से ही है...मानव समाज में अवस्थित सभी उपजातियों का समुच्चय सम्पूर्ण मानव जाति में ही निहित हो सकता है उसी परम श्रेय की प्राप्ति हमारा उद्देश्य होना चाहिए इस उद्देश्य की प्राप्ति के उपरान्त ही हम सम्पूर्ण जीव-जगत के कल्याण की कल्पना कर सकते हैं...मानव समाज में निहित उपजातियों के क्रमिक विकास के बिना हम सम्पूर्ण मानव जाति के विकास की बात सोच भी नहीं सकते और यह भी नहीं सोच सकते कि इन उपजातियों के बिना ही हम विकास कर सकते हैं यहीं हम चूक रहे हैं उपजातियों भी समाज की इकाई हैं इकाई के बिना हम अनन्त की कल्पना कैसे कर सकते हैं हां एक-एक को जोड़कर ही दहाई सैकड़ा हजार आदि आदि सोचा जा सकता है इसमें प्रत्येक को प्रत्येक का सहयोग अपेक्षित है वर्ना हम आहें भरते रहेंगे ता‘उम्र हासिल कुछ न होने वाला...जाति की दुहाई भी देते रहेंगे और जाति व्यवस्था को ख़रिज भी करते रहेंगे अपने अपने स्वार्थवश


      12 घंटे पहले ·  · 1

    • Chandra Bhushan Mishra Ghafil मेरे ख़याल से Dinesh Verma जी! 'जियो और जीने दो' वाली लाइन में थोड़ा सा और जोड़ कर यह लाइन बना दी जाय और अमल में लाने की कोशिश की जाय कि 'अच्छे से जियो और अच्छे से जीने दो' तो सारा लफड़ा ख़त्म हो जाय और हम शायद सुक़ून का अनुभव कर पाएं


      12 घंटे पहले ·  · 3

    • Dinesh Verma Gaafil sir,saadar dandwat pranaam . aapto serious ho gaye main to kewal Gafil sir se ek sher daakhil karane ki sifarish kar raha tha :)


      2 घंटे पहले ·  · 1

    • Shailendra Pratap Singh Chandra Bhushan Mishra Ghafil bhai, मैं आपकी बात से इस सीमा तक सहमत हूँ कि जब जातियाँ अस्तित्व में आयीं होंगी तो उसका कोई न कोई उचित कारण अवश्य रहा होगा.

      किन्तु आज की तिथि में क्या उसकी कोई उपादेयता है ? हाँ, दुरूपयोग अवश्य किया जा रहा है या यह कह सकते हैं कि जिनके लिए और जिन अर्थों में इसकी उपादेयता है वही इसे जीवित रखे हैं और जीवित रखने का प्रयास भी कर रहे हैं.



    • Chandra Bhushan Mishra Ghafil 
      शैलेन्द्र सर को प्रणाम करते हुए निवेदन करना चाहूंगा कि हमें लगता है कि आज ही इसकी उपादेयता है पर उसको सार्थक रूप में लिया जाय तो वैसे ही जैसे यह कहा जाय कि एकाकी परिवार की क्या उपादेयता है तो उपादेयता है विकास के लिए आवश्यक है पर विकास की गति सकारात्मक हो पतनोम्नुखी नहीं...उच्छृंखलता न हो एक जिम्मेदाराना जज्बातों से लबरेज़ हों सभी तो। और सर यही तो गति है संयुक्त परिवार था, आवश्यकता नुसार हम एकाकी होते जा रहे हैं ऐसे ही मानव समाज था आवश्यकतानुसार उपजातियों में विभाजित हुए...इस व्यवस्था में इतना विकार आ जा रहा है कि फिर हम जाति व्यवस्था के उन्मूलन की बात सोच रहे हैं बस ऐसे ही दुनिया गोल-गोल। एक से ऊबे और जैसा कि होना ही है तो दूसरी उपयोगी...सर आपका सवाल कि आज जाति व्यवस्था की क्या आवश्यकता है तो मेरे विचार से इसकी उतनी ही उपयोगिता है जैसे एकाकी परिवार की। इसमें भी वे सभी दोष हैं जो एकाकी परिवार में और वे सभी ख़ूबियां हैं जो एकाकी परिवार में इति ग़ाफ़िल उवाच



    लिखिए अपनी भाषा में

    Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...