Friday 31 August 2012

'पुष्प की अभिलाषा', 'जलावो दीये पर रहे ध्यान इतना' आदि जैसी कविताएँ लिखना क्या अब सम्भव नहीं? : एक परिचर्चा


अक्सर यह सवाल जी हलकान करता है कि 'पुष्प की अभिलाषा', 'जलावो दीये पर रहे ध्यान इतना' आदि जैसी कविताएँ अब क्या नहीं लिखी जा सकतीं? या ऐसी कविताएँ अप्रासंगिक हो चुकी हैं?

 ·  ·  · बुधवार को 03:13 अपराह्न बजे मोबाइल के द्वारा

  • Rajesh SinghRaju JaihindRachna Singh Tripathi और 16 अन्य को यह पसंद है.

    • Dharmendra Gupta Sir, accha prasn hai.................per kya aab ke logo me vo dhairya aur chamta hai jo us jamane ke kaviyo me hua karti thi.............

    • DrAmitabh Pandey कविताये नहीं सर ...आप हम ही लोग अप्रासंगिक लिखने लगे है ...आखीर हम लोग ही क्यों नहीं लिखते ?...आज भौतिकवादी दुनिया में वही कार्य आदमी करता है जिससे सस्ती लोकप्रियता मिले और पैसा मिले .पहले ये सोच नहीं थी .........!!!!

    • Dharmendra Gupta Sir kya Kavita hai...............aaj bhi man harshit hota hai..........parhne ke baad.............चाह नहीं मैं सुरबाला के
      गहनों में गूथा जाऊँ
      चाह नहीं प्रेमी माला में
      बिंध प्यारी को ललचाऊँ

      चाह नहीं सम्राटों के
      शव पर हे हरि डाला जाऊँ
      चाह नहीं देवों के सिर पर
      चढूँ भाग्य पर इतराऊँ

      मुझे तोड़ लेना बनमाली
      उस पथ पर तुम देना फेंक
      मातृभूमि पर शीश चढ़ाने
      जिस पथ जाएँ वीर अनेक

    • O.p. Singh ye bazarvad ka jamana hai..kavyakarm bhi iske prabhav se mukt nahi hai,,maang aur purti ka siddhant kam kar raha hai..ab sankalp aur shahadat se bhari kavitawo ki maang kam hai..upbhoktawo ka swad badal gaya hai.

    • Chandra Bhushan Mishra Ghafil यह सवाल हम और आप से ही है डॉ. अमिताभ भाई! और ओपी भाई आपसे सवाल! जितने सारे उत्पाद बज़ार में उपलब्ध हैं सबके सब क्या वास्तव में उपयोगी हैं? उपभोक्ताओं की ओछी और बिगड़ी आदत का ज़िम्मेदार क्या बाज़ार नहीं है? हद तो यह है कि उटपटाँग सामान पहले बनाया जाता है फिर उसकी अनावश्यक उपयोगिता प्रचारित की जाती है फिर उपभोक्ता को उसका आदती बनाया जाता है इन सब कुचक्रों का अंत कब और कैसे होगा? मेरे ख़याल से जिसे आप उपभोक्ता की माग कह रहे हैं वह साजिशन डाली गयी उपभोक्ता की ग़लत तथा अनावश्यक आदतों का नतीज़ा है यहाँ 'साजिशन डाली गयी' पर विशेष जोर है मेरा आगे आप लोग अपने-अपने दृष्टिकोण से इस मुद्दे की व्याख्या करें अगर उचित समझें तो!
      19 घंटे पहले मोबाइल के द्वारा · सम्पादित ·  · 6

    • O.p. Singh kisi ne ekbar mahesh bhatt se puchha ki aap to bahut hi gyanvardhak kalatmak film banate the ab aap bhi mashala films banane lage..unka jabab tha yahi aaj maang hai..apne astitwa ko banaye rakhne ke liye upbhokta chetna ke swaroop me parivartan se hum muh nahi mod sakte.

    • Chandra Bhushan Mishra Ghafil फिर वही सवाल है मान्यवर! उपभोक्ता चेतना के गिरे स्तर का ज़िम्मेदार कौन?
      19 घंटे पहले मोबाइल के द्वारा · सम्पादित ·  · 6

    • O.p. Singh Gafil sir, ab to aap gaflat me dal denge.

    • Ashok Tripathi Sir na to ye kavitaayen aprasangik hui hain aur na unke lekhak. Aaj paristhitiyaan badal gayee hain, yug-parivartan ho raha hai. Lekin chinta ki baat nahin hai....'Old is Gold'

    • Chandra Bhushan Mishra Ghafil 
      मैं विशेषत: इन कविताओं की बात नहीं कर रहा हूँ अशोक जी! इन जैसी वजनदार कविताओं की बात कर रहा हूँ एक बात और! परिवर्तन शाश्वत प्रक्रिया है जब ये या इन जैसी तमाम कृतियाँ मूर्त रूप पायीं होंगी उस समय भी वर्त्तमान ही रहा होगा ओल्ड युग नहीं जो तब
      भी परिवर्त्तन का प्रतिनिधित्व कर रहा होगा और हम आज भी इन कृतियों के क़ाइल हैं पर अशोक जी! ईमानदारी से बताइए की आज ऐसा क्या रचा जा रहा है जिन पर हमारी पीढ़ियों के गर्व करने की बात दरकिनार हमीं कितना गर्व कर सकते हैं? आज की ही परिस्थिति के लिहाज से सोचकर कृपा पूर्वक बताएँ!

19 घंटे पहले मोबाइल के द्वारा · सम्पादित ·  · 6


  • Vibhas Awasthi Chandra Bhushan Mishra Ghafil....बहुत अच्छा विषय..... ये चर्चा जारी रखना मेरे भाई...
    केवल कविता ही नहीं... कहानियो में भी, उपन्यासों में, सभी जगह कमोवेश ऐसा ही हाल है....
    16 घंटे पहले ·  · 4





  • Shashank Shekhar 
    Chandra Bhushan Mishra Ghafil bhai, बहुत ही विचारणीय मुद्दा उठाया है आपने. Vibhas Awasthi ji की बात में भी दम है कि 'केवल कविता ही नहीं... कहानियो में भी, उपन्यासों में, सभी जगह कमोवेश ऐसा ही हाल है'...इस सिलसिले में आगे एक प्रश्न यह भी
    उठेगा कि पिछले २०-३० वर्षों में देश को ऐसे कितने व्यक्ति या नायक मिले हैं जिन पर गर्व किया जा सकता है? शुरुआत आप द्वारा उल्लिखित कविताओं से की जाए तो महसूस होता है की देश के लिए आत्म बलिदान और लोक हित के जज्बे में कमी आई है. व्यक्ति आत्मकेंद्रित हुआ है. O.p. Singh ji, बाजारवाद तो बाद की चीज़ है. १०-२० पंक्तियाँ लिखने में कौन सी लागत लगानी है की माल नहीं बिकेगा तो कवि या लेखक तबाह हो जाएगा? व्यक्ति की सोच संकुचित हुई है. कौन है इसका ज़िम्मेदार? हम खुद या कुछ और ?




  • 14 घंटे पहले · सम्पादित ·  · 5


  • DrAmitabh Pandey देश काल और हमारी आर्थिक परिस्थितियों ....ने और स्वार्थ परक जीने के तरीके ने ....हमारी सोच को परिवर्तित कर दिया है.और इसकी स्पस्ट झलक न सिर्फ कविताओं में बल्कि ...बल्कि उपन्यासों ,संस्मरण में , यात्रा वृतांत में साफ़ झलकता है ....सेक्सवादी दुनिया और चका चौध ने हमारी सोच को परिवर्तित कर दिया है ...जब प्लेटो लिख रहा था तो वर्तमान यूनान पर लिखा ....हम भी लिखते है तो वर्तमान को देख कर ही लिखते है
    14 घंटे पहले ·  · 5





  • DrAmitabh Pandey आप देश प्रेम पर लिखे ......तो लोग कहेंगे " वाह आदर्श वादी " सेक्स पर लिखे तो हैण्ड टू हैण्ड बिक जाएगी
    14 घंटे पहले ·  · 2





  • DrAmitabh Pandey सनी लियोन की एक तस्वीर आपके १००० कविताओं को पीछे झोंक देगी ..आप आवक रह जायेंगे भाई
    14 घंटे पहले ·  · 3





  • DrAmitabh Pandey बाजारवाद है .....लहरों के साथ बहे ...नहीं तो .....बेभाव बह जायेंगे साहब
    13 घंटे पहले ·  · 2





  • DrAmitabh Pandey Shashank Shekhar शशांक सर कुछ लिख रहे है जानता हू...धमाकेदार .....बस आने ही वाला है उनका कमेन्ट
    13 घंटे पहले ·  · 3





  • Shashank Shekhar हां, कुछ लिख तो रहा था लेकिन आपने इतना जोरदार हमला किया कि उसे स्थगित कर के आना पड़ा... DrAmitabh Pandey भाई, जो कुछ हो रहा है, उसके विषय में आपका कहना १०० प्रतिशत सही है. मुझे लगता है कि जो कुछ होना चाहिए, वह क्यों नहीं हो रहा है, इस पर सोचने की जरूरत है, सनी लिओन जो काम सबसे बेहतर ढंग से कर सकती है, कर रही है, पर जो लोग कपड़े उतार कर उसकी तरह नहीं बिक सकते, वे वह काम क्यों नहीं कर रहे, जो सबसे बेहतर ढंग से कर सकते हैं?
    13 घंटे पहले ·  · 6





  • DrAmitabh Pandey Shashank Shekhar लोग सोचते है सर ....लेकिन संख्या कम है ...जीवन की आपा धापी में सोच खतम सी होती जा रही है ....लोंगो के पास इतना पैसा आ गया है की उनका दिमाग ख़राब हो गया है ....इसलिए सोच की शक्ति छीड़ होती जा रही है ...क्या करे ? अभी बचे है कुछ लोग उनसे ही सब कुछ चल रहा है
    13 घंटे पहले ·  · 3





  • DrAmitabh Pandey अब इस पोस्ट को ही देखिये .....कितने लोग यहाँ आये .....लिखने ...अब शायद जरूर आ जाये ..हा हा हा हा हा हा ह Shashank Shekhar sir
    13 घंटे पहले ·  · 1





  • Shashank Shekhar नहीं, ऐसा मत कहिए, और न ही सोचिए DrAmitabh Pandey भाई. दोपहर का वक्त है, लोग काम में लगे होंगे...
    12 घंटे पहले ·  · 2





  • Shashank Shekhar 
    DrAmitabh Pandey ji, आगे सोचने की बात यह है कि..... क्या दिलों का दायरा छोटा हुआ है. अब उनमें पहले जैसी अमाई नहीं रही! ( जबकि पहले समुन्दर समाया करते थे)
    .........दिल में थोड़ी-बहुत जो भावनाए हैं, उनमें वह वेग - वह रवानी नहीं; वे लहरें - व
    ह उछाल नहीं; वह ज्वार नहीं और वह सैलाब नहीं, जो व्यक्ति के अस्तित्व को जड तक भिंगो जाता है; उसके अहंकार और आत्मकेद्रित स्वार्थों को कहां-का-कहां बहा ले जाता है. उसकी अच्छाइयों को सींचता है; उसके समूचे अस्तित्व को नहला-धुला कर साफ-सुथरा अच्छा बच्चा बना देता है.
    .........इस सैलाब के ही तो बार-बार उमड़ने से हृदय इतना विशाल हो जाता है कि सारी दुनिया उसमें समा जाती है, मेरा-तेरा का भेद मिट जाता है.
    .........पर अब ऐसा क्यों नहीं हो रहा? क्या माटी के साधारण पुतले को इंसान बनाने के लिये जिस मंजाई की जरूरत होती है, उसके अनुरूप परिस्थितियां अब नहीं रहीं? क्या अब दिल को मथ कर तमाम अमृतों और विषों को अलग-अलग अवक्षेपित करने वाले कश्मकश के वासुकियों का अभाव हो गया है? इस पर चर्चा की जरूरत है. (अब शाम को मिल पाऊंगा.)




  • 12 घंटे पहले · सम्पादित ·  · 6


  • Chandra Bhushan Mishra Ghafil 
    अमिताभ जी यह कहकर कि बाज़ारवाद का जमाना है पल्ला झाड़ लेना कम से कम बुद्धिमान तबके का सगल नहीं ही होना चाहिए वे लोग जो कुछ सोच-विचार नहीं सकते, जिनके पास नीर-क्षीर विवेक नहीं है जमाने के साथ बहें क्योंकि उनके पास कोई चारा भी तो नहीं है पर एक
    ऐसा तबका भी होना चाहिए जो जमाने की भटकी धारा को सही दिशा, दशा दे सके और जहाँ तक शशांक सर! मैं समझता हूँ ऐसा तबका है जो यह काम बख़ूबी कर सकता है क्या उसे भी हनुमान जी की तरह जामवन्त बनकर उसके सामर्थ्य की याद दिलानी होगी? क्यों वह भूल रहा है अपना दायित्व? क्यों नहीं वह सचेत, सतर्क है अपने महत्तम कर्त्तव्य के प्रति? इन सारे प्रश्नों का उठना ही सबसे बड़ा दुर्भाग्य है इनका उत्तर ढूँढना ही होगा अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब हमारे और जंगलियों के बीच का फ़र्क़ बेमानी हो जाएगा जो हम बेहतर होते जाने का फ़र्जी ढिंढोरा पीटते हुए भ्रम-भंवर में नाच-नाचकर रसातल की ओर बढ़े चले जा रहे हैं। आप सबसे अनुरोध है कि इस पोस्ट पर आकर अपने महत्त्वपूर्ण विचार दें बेझिझक




  • 11 घंटे पहले मोबाइल के द्वारा · सम्पादित ·  · 6


  • Singh Arun 
    chetana ke avshesh to dikh rahe hain, aaj bhi. par susuptavastha me..bhavnao ke ye jhatke, sambhvatah soye huvo ko jagane me samarth hon..par aaj ka chhaya hua upbhoktavaad ya bazzarvaad utna prasangik nahi hai, seedhe is khsati ke liye, ba
    lki aavashaykata hai ek manthan, ek atmvishleshan kee, ki hamara yogdaan kya hai, is chharan me aur aage ke sambhavit punarutthaan me...samay ke abhaav ko dosh de ke bachne ka ek rasta maujood hai..par shayad uchit na..




  • 10 घंटे पहले ·  · 2


  • Shashank Shekhar 
    Arun,.............एकदम सही जगह पहुंचाया तुमने हम लोगों को...समाज के मौजूदा चलन ( गति या अधोगति) में हमारा क्या योगदान है, क्या हो सकता है, और जो नहीं है,वह क्यों नहीं है? इसके लिए आत्म मंथन - आत्म विश्लेषण जरूरी है. मंथन द्वारा ही इंसान अप
    नी तह तक - बुनियादी बनावट तक पहुँच सकता है, जहां स्वहित व लोक हित एक हो जाते हैं.
    ...............इसमे भी दो राय नहीं कि आत्म मंथन के लिए पहले के मुकाबले आज लोगों के पास समय बहुत कम है. समय क्यों कम है, यह जानने के पहले आओ गौर करें कि जब समय पर्याप्त होता था तो वे कौन सी बातें थी, जो सहज भाव से मथ कर उसे आत्मावलोकन का अवसर देती थीं.
    ...............एक तो उस ज़माने में प्रेम बड़ा दु:साध्य काम था. मक्खन की जगह भले आंसू ही निकले लेकिन कमबख्त मथता भरपूर था.
    ...............दूसरे, उस ज़माने में Generation gap भी बहुत माथा-पच्ची करवाता था. Readymade कुछ नहीं था, सब कुछ खुद ही समझना - गुनना पड़ता था. ऐसे में विद्रोह के तेवर की धार बहुत तीखी होती थी और कोई अवरोध नहीं मानती थी.
    ...............इसके अलावा व्यक्ति पहचान की समस्या से भी खूब जूझता था. आज जिस 'मै कौन हूँ' जैसे प्रश्न को कोई मुद्दा ही नहीं माना जाता, उसमें उलझते-फंसते हुए किसी तरह से निकल कर 'मुझे क्या करना चाहिए' तक पहुंचता था, या नहीं भी पहुंचता था.
    ...............उसके आस-पास आदर्श बिखरा पड़ा था और आदर्शवादी को बेवकूफ का पर्याय नहीं माना जाता था.
    ...............उसके पास नायक भी थे, जो सुदूर अतीत की चीज़ या अव्यावहारिक नहीं हुए थे.
    ...............एक बड़ी अहम् बात की उसके पास मनोरंजन के लिए किताबें, सिर्फ किताबें थीं.
    मेरी समझ से आज के मुकाबले पहले के ज़माने में उपरोक्त बातें ही ऐसी थीं, जो आत्ममंथन का कठिन लेकिन कारगर वातावरण देती थीं. इसके अलावा भी कुछ बिंदु अगर सूझ रहे हों तो कृपया Chandra Bhushan Mishra Ghafil भाई औरDrAmitabh Pandey ji बताएं ताकि उन्हें जोड़ कर आगे बढ़ते हुए सबसे पहले 'तब का प्रेम- अब का प्रेम' पर चर्चा की जाए. इससे यह नीरस विषय सरस भी हो जाएगा................




  • 5 घंटे पहले · सम्पादित ·  · 5


  • Arun Jaihind 
    आज का दौर सिर्फ बाजारवाद का दौर है, ऐसा कहकर हम अपने आलस्य को छुपा नही सकते हैं..
    ऐसी कवितायेँ आखिर आप क्यू चाहते हैं की हर दौर मे लिखी जाएँ..?
    और सही कहा विभाष सर ने की यही स्थिति आज साहित्य की लगभग हर विधा मे है...मै सहमत हूँ..!!
    किन्तु आ
    प लोग चाहते हैं कि आज गोदान, चित्रलेखा, सुहाग के नुपूर, तमस, चंद्रकांता...आदि-आदि जैसी रचनाएँ की जाएँ....?
    मै असहमत हूँ, क्योंकि आज न केवल भारत अपितु पूरे विश्व मे एकसाथ परिवर्तन होते चल रहे हैं..
    आज हर नयी तकनीक की जानकारी दुनिया के हर कोने मे रहने वाले इंसान को सुलभ है यदि वह चाहे तो..
    हैरानी की बात है कि आज निर्वाचन मे अंतरिक्ष-यात्री अपने मताधिकारों का प्रयोग कर रहे हैं...
    साहित्य अपने युग का दर्पण होता है, उस युग की ज़रुरत वैसी कवितायेँ थी, सो लिखी गयीं, उपन्यास लिखे गए वैसे, फिल्मे बनी वैसी..
    पर आज का मानव उससे बहुत आगे निकल चुका है, बार-बार बाज़ार को रोना हम कब तक रोते रहेंगे....!!!
    शशांक शेखर सर से थोड़ी दूर तक सहमत हूँ..
    लेकिन क्या ऐसी कविताओं की वकालत करना, वर्तमान पीढी को गढ़ने का गैरलोकतांत्रिक प्रयास नही माना जायेगा..
    यद्यपि मुक्तिबोध के ऊपर लिखने वालों ने सिर्फ लाल-चश्मा पहनकर ही उनको जाना है...पर यहाँ मुक्तिबोध की एक पंक्ति को गद्य मे ढाल रहा हूँ कि आखिर हम क्यू पुराने मठ-मंदिर को इतनी तरजीह देना चाह रहे हैं...
    आज ज़रुरत है कि हम अपने लोगों को एक नागरिक की तरह रहना सिखा दें...
    और सर समय न तो कभी कम रहा है और न ज्यादा, जिस पीढ़ी ने जितना सद-उपयोग किया है, वह उतना ही बेहतर उदाहरण आने वाली पीढी को डे पायी है..
    जय हिंद




  • 4 घंटे पहले ·  · 5


  • Chandra Bhushan Mishra Ghafil 
    Arun Jaihind भाई आपका बहुत-बहुत शुक़्रिया! आपके इस कथन कि "आज ज़रुरत है कि हम अपने लोगों को एक नागरिक की तरह रहना सिखा दें...
    और सर समय न तो कभी कम रहा है और न ज्यादा, जिस पीढ़ी ने जितना सद-उपयोग किया है, वह उतना ही बेहतर उदाहरण आने वाली पी...और आगे देखें




  • 2 घंटे पहले ·  · 4


  • Chandra Bhushan Mishra Ghafil Shashank Shekhar सर आप यहां से ग़ायब न हों प्लीज!





  • DrAmitabh Pandey सर , इस पोस्ट को आप सेव कर के रखियेगा ....कल फिर चर्चा होगी इसपर





  • Arun Jaihind Chandra Bhushan Mishra Ghafil......सर कौन से उच्चतम मानदंडों की स्थापना आप चाह रहे हैं, कृपया इसको भी सगुण करिए...?
    और एक बात और की सर इस युग की मूलभूत ज़रुरत क्या है..?
    और इस पीढ़ी का क्या योगदान होना चाहिए, भारतीय-इतिहास मे...?





  • Shashank Shekhar 
    Arun Jaihind भाई, कहीं कुछ गफलत है.( Ghafil की Post जो है)
    गफलत न. 1 - आपने 'ऐसी कविताए' का जिक्र दो बार किया है ( 'ऐसी कवितायेँ आखिर आप क्यू चाहते हैं की हर दौर मे लिखी जाएँ..?'
    'लेकिन क्या ऐसी कविताओं की वकालत करना, वर्तमान पीढी को गढ़ने...और आगे देखें






  • Arun Jaihind Shashank Shekhar......सर आपने यदि कुछ कहा है तो अवश्य कुछ गफलत हुई ही होगी मुझको...
    और यथासंभव मै शीघ्र इस का उत्तर यहाँ पर लिखूंगा..
    जय हिंद





  • Shashank Shekhar Ghafil भाई, मेरी और आपकी तो बात ही नहीं हो पा रही है. Inverter जवाब दे रहा है. यदि बिजली आ गयी तो बात होगी...





  • DrAmitabh Pandey Vibhas Awasthi sir pranam...........





  • Chandra Bhushan Mishra Ghafil 
    अरुण भाई मानव के लिए प्रत्येक युग में मानवता से बड़ा उच्चतम मानदंड क्या हो सकता है और येन केन प्रकारेण इसी की स्थापना से इतर और क्या अपेक्षा हो सकती है मानव समाज से? एक बात और सामिल करिएगा अपने विचार में कि आज का मानव क्या साधनों के आविष्कार
     और उसके पूर्ति के उद्योग में ही इतना उलझकर नहीं रह गया है कि उसे ही वह साध्य मान बैठा एक पंखा निर्माता इसी में ख़ुश है कि उसके द्वारा पंखा बन गया उससे प्राप्त ठंडी हवा का सुख लेना वह भूल गया। अब आप ही बताइए अरुण भाई कि पंखे का निर्माण उसका मूलभूत उद्देश्य था या ठंडी हवा प्राप्त करना? मेरे ख़याल से आज हमारी सारी झंझटों का जड़ साधन को ही साध्य रूप में स्वीकार कर लेना है हम वास्तविक साध्य क्या भूल से नहीं गये हैं अरुण भाई! ज़रा इस तरह भी सोचिए बाज़ारवाद, समयाभाव तथा अतिव्यस्तता की दलील शायद इससे कुछ हद तक ख़ारिज़ हो सके और वास्तविक मानदंडों की पुनर्स्थापना की क़ाबलियत से हम आगाह हो सकें




  • 34 मिनट पहले मोबाइल के द्वारा · सम्पादित ·  · 2


  • Vibhas Awasthi अगर साहित्य रचनाकार के अंतर्मन के सौंदर्य की अभिव्यक्ति है......
    - तो क्या बाजारवाद ने वाकई.... रचनाकार के के अंतर्मन के सौंदर्य को विकृत कर दिया है... जिसकी वजह से ऐसी बहु आयामी रचनाएं नहीं आ रही है...जिनमें थोड़ा-बहुत कालजयी तत्व हो....
    - और अगर अंतर्मन का सौंदर्य विकृत हो गया है या हो रहा है.... तो इस बाजारवाद के युग में हमें ... पुष्प की अभिलाषा, गोदान...जैसी कृतियां हमें आज भी अंदर से आनंद की अनुभूति क्यों कराती हैं.....





  • Chandra Bhushan Mishra Ghafil आदाब Vibhas सर! आपका आगमन हमारे लिए अतिप्रेरणास्पद होता है...मैं धन्य हुआ





  • Vibhas Awasthi गाफिल भाई.... आना तो रोज ही होता है.... लेकिन ऐसे समय में जब सारी दुनिया सोने की तैयारी करती है.... अभी आप लोगों से बात करते-करते ही खाना खाऊंगा.... फिर सुबह 8 बजे निकलने की तैयारी.... कुछ दिन तो कम से कम ऐसी ही नियति है....





    लिखिए अपनी भाषा में

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