Monday 22 October 2012

,,,,आ जा सिंहवाहिनी

आदिशक्ति     जगजननी    तू    है त्रिकालरूप
सदा    ही   समाज में     रहेगी    मातु    दाहिनी ।
शक्ति  के  समेत    विष्णु,ब्रह्म,हे पुरारि  नाथ,
काली    हे     करालरूप !     पाप-ताप    दाहिनी  ।
साजि दे समाज मातु भक्तों की भावना भी,
करि    दे अभय ,    पाहिमाम        विश्वपाहिनी ।
मातु हंसवाहिनी तू  ,  आ जा रे बजाती बीन,
सिंह   पर   सवार    मातु,  आ  जा  सिंहवाहिनी ।

Monday 1 October 2012

माता का सम्मान

भारत भूमि सुहावनी, बसती अपनी जान|
जीवन में सबसे बड़ा, माता का सम्मान||
माता का सम्मान, मातु या धरती माता|
हमको इनके हेतु, प्राण देना है आता|
कह 'झंझट' झन्नाय, रहो हर पल सेवारत|
बने विश्वशिरमौर, हमारा प्यारा भारत|१|

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