Sunday, 5 February, 2012

बना है भीड़तन्त्र

1.

मुद्दों को हम भुला दें , डालें जब भी वोट |
लोकतंत्र में फिर सभी , निकालते हैं खोट ||
निकालते हैं खोट , भूलकर अपनी गलती |
पछताते उस वक्त , चोट जब गहरी लगती ||
जब भी डालो वोट, जाति-धर्म सब भुला दो |
कहे विर्क कविराय , मुख्य मानों मुद्दों को ||

2.

उठती न बात देश की , हो मुद्दों की हार ।
जाति - धर्म जैसे कई, उगते  खरपतवार ।।
उगते खरपतवार, वोट के दिन जब आते ।
यूं रहते हैं गौण , इस वक्त रंग दिखाते ।।
लोकतंत्र की साख , इसी कारण है गिरती 
बना है भीड़तन्त्र, ऊँगली इस पर उठती ।।

-------- दिलबाग विर्क 

* * * * *

9 comments:

  1. देखते हैं कैसी सरकार आती है ,कितने लोग सूझ बूझ के साथ निर्णय लेते हैं..
    kalamdaan.blogspot.in

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  2. आज नहीं चेते तो कल फिर पछताएँगे,
    खिसियानी बिल्ली के माफ़िक हो जाएँगे।
    फिर-
    गाड़ के तम्बू रामदेव-अन्ना बोलेंगे,
    उनके पीछे पूँछ हिलाते हम डोलेंगे।

    बनी हुई है ऐसी ही कुछ फ़ितरत अपनी,
    'मूरख हृदय न चेत' सिखाओ चाहे जितनी।

    वाह भाई साहब! बहुत ख़ूब

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  3. कल 06/02/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  4. वाह!!!!!बहुत सुंदर कुंडलियाँ ,अच्छी रचना

    नई रचना ...काव्यान्जलि ...: बोतल का दूध...

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  5. बहुत सुन्दर प्रस्तुति
    आपकी इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल दिनांक 06-02-2012 को सोमवारीय चर्चामंच पर भी होगी। सूचनार्थ

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  6. बहुत खूब ....लाजवाब प्रस्तुति

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