Sunday, 10 March, 2013

आला आशिक आस्तिक, आत्मिक आद्योपांत

आला आशिक आस्तिक,  आत्मिक आद्योपांत ।
आत्म-विस्मरित आत्म-रति, रहे हमेशा शांत ।

रहे हमेशा शांत, ईष्ट से लौ लग जाए ।
उधर नास्तिक देह, स्वयं को केवल भाये ।

कहते मिथ्या मोक्ष, नकारे खुदा, शिवाला ।
भटके बिन आलम्ब, जला के प्रेम-पुआला ॥ 
आत्म-विस्मरित=अपना ध्यान ना रखने वाला 
आत्मरत नहीं बल्कि 
आत्म-रति=ब्रह्मज्ञान 

3 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!

    महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएँ !
    सादर

    आज की मेरी नई रचना आपके विचारो के इंतजार में
    अर्ज सुनिये

    ReplyDelete
  2. रहे हमेशा शांत, ईष्ट से लौ लग जाए ।
    उधर नास्तिक देह, स्वयं को केवल भाये ।

    बहुत सुन्दर प्रस्तुति !!!

    ReplyDelete
  3. श्री ग़ाफ़िल जी आज शिव आराधना में लीन है। इसलिए आज मेरी पसंद के लिंकों में आपका लिंक भी सम्मिलित किया जा रहा है।
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल सोमवार (11-03-2013) के हे शिव ! जागो !! (चर्चा मंच-1180) पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

    ReplyDelete

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