Friday 30 March 2012

बेचारा मत्ला!!!

समस्या पूर्ति-


वक़्त है लिक्खूँ मगर लिक्खूँ भी क्या?
वक़्ते-गर्दिश के जुनूँ का ख़ामिजा??

इसके बाद गुजारिश है कि यह मत्ला आप दानिशमंदों की कारस्तानी से मुक़म्मिल ग़ज़ल की शक्ल इख़्तियार करे। इस नेक और ज़रूरी काम को, इस पोस्ट पर टिप्पणी के माध्यम से अंजाम तक पहुँचाने के लिए आप सादर आमन्त्रित हैं! आपके पेश किए हुए चुनिन्दा अश्आरों से ही एक बेहतरीन ग़ज़ल मुक़म्मिल हो इसी तमन्ना के साथ आपका
                                                   -ग़ाफ़िल
कमेंट बाई फ़ेसबुक आई.डी.

Wednesday 28 March 2012

अपना घर अपना ही होता है ....

     जानते हो तुम्हारे घर से जाने के बाद मुझे घर कितना सुना और खाली-खाली सा लगने लगता है।  यूं तो मैं कहने को अक्सर कह दिया करती हूँ कि यही तो वो समय है मेरा जब सबके स्कूल ऑफिस जाने के बाद मैं दो घड़ी चैन से बैठकर चाय पी पाती हूँ और मन ही मन यह सोच लेती हूँ कि चलो अब सारा दिन केवल मेरा है, मेरे लिए है चाहे जो मन करे करूँ, अब तो तुम्हारे घर वापस आने तक यहाँ मेरा ही एक क्षत्र राज है, मगर यह सब कहने की बाते हैं वास्तविकता तो कुछ ओर ही है। वास्तव में घर वो स्थान है जहां यदि काम ढूँढने जाओ तो शायद एक पूरा दिन भी कम पड़ जाये और यदि न चाहो, तो कोई काम ही नहीं होता मगर यह सब मैं तुमसे कोई शिकायत करने के लिए नहीं कह रही हूँ बल्कि मुझे तो बहुत अच्छा लगता है यूं घर का काम करना और बाकी घर के सदस्यों कि तरह अपने इस घर कि भी देख भाल करना जानते हो क्यूँ, क्यूंकि जब मैं तुमसे जुड़कर यहाँ आई थी ना तब इसी घर ने मेरे पाओं कि मिट्टी को अपने अंदर जजब करके मुझे सदा के लिए अपना बना लिया था अपना मान लिया था तभी से एक अनदेखा, अंजान मगर जो अब बहुत ही जाना-पहचाना सा रिश्ता बन गया है मेरा इस घर से यहाँ की दीवारों से, यहाँ रखी हर चीज़ से मेरा एक रिश्ता सा बना हुआ है यहाँ कि हर चीज़ मुझसे बातें किया करती है अपनी भावनाओ को मेरे साथ सांझा किया करती है और उन सब से यूं बाते करते कराते कब शाम ढाल जाती है और तुम्हारे घर वापस लौटने का समय हो जाता है पता ही नहीं चलता जानते हो क्यूँ, क्यूंकि अपना घर अपना ही होता है चाहे महल हो या फिर छोटे से घर की चार दीवारी यहाँ तक की झोपड़ी ही क्यूँ ना हो अपना घर अपना ही होता है, चाहे जहां भी रहलो अपने घर का सा सुकून, शांति या आराम किसी को कहीं और मिल ही नहीं सकता फिर चाहे कोई भी जगह कितनी भी सुंदर हो या फिर कितने भी ऐश और आराम की वस्तुओं से ही क्यूँ न भरी पड़ी हो,किन्तु तब भी जो सुख और सुरक्षित होने की भावना का आभास जैसा अपने घर की चार दीवारी में प्रवेश करने के बाद मिलता है मेरा दावा है, वो सुख किसी को भी और कहीं मिल ही नहीं सकता पर क्या खुद कभी महसूस की है एक बात तुमने या फिर सोचा है क्या कभी यूं तो कहने को पूरा घर ही अपना होता है लेकिन तब भी हर घर के कोने में, कोई न कोई एक ऐसी जगह भी ज़रूर होती है जहां मन एक असीम शांति और अपने पन का अनुभव करता है, जहां वक्त के ठहराव को महसूस किया जा सकता है जो अपने घर के अलावा पूरी दुनिया में और कहीं मिल पाना संभव नहीं, वो जगह किसी भी व्यक्ति के लिए, उसके घर में बनी कोई भी जगह हो सकती है जैसे किसी के लिए पूजा घर, तो किसी के लिए महज़ कोई खिड़की,कोई बालकनी,बागीचा, छत या फिर आपका अपना कमरा या किचन घर की कोई भी जगह हो सकती है वो जहां आप अपने आप से बात करते हैं वह एक स्थान अपने आप में आपके लिए बहुत खास होता है,जहां ज़िंदगी की उलझनों और मन में चल रहे किसी भी प्रकार के विचारों को आप अपने आप से बांटते है,फिर चाहे वो, आपके अंदर चल रहा किसी प्रकार का अंतर द्वंद हो,किसी बात का दुख हो, कोई समस्या ही ,परेशानी हो या फिर चाहे कोई बेहद खुशी की बात ही क्यूँ ना हो मुझे भी बहुत अच्छा लगता हैअपने इस घर की हर एक चीज़ से बाते करना यूं ही कभी बागीचे में या घर के आँगन में टहलते-टहलते पेड़ पौधों से बाते करना या उनसे अपने मन की बातों को कहना,कभी-कभी खिड़की में घंटों खड़े रहकर बाहर के नज़रों को देखते हुए अपने आपसे बाते करना कभी-कभी तो यूं भी होता है की अपने कमरे में किसी एक जगह बैठकर तकिये को हाथों में लिए घंटो मन ही मन कुछ सोचते रहना अपने आप खुद से ही सवाल भी पूछना और खुद ही जवाब भी देना या फिर छत की मुडेर पर खड़े होकर वहाँ लगे गमलों से बाते करनाप्रकृति के साथ अपनी बातों को अनुभवों को अहसासों को बटना अपने आप में एक ऐसा सुकून देता है जिसका कोई पर्याय नहींवाकई ऐसा महसूस होने लगता है जैसे सच मुछ कुदरत आपकी बातें सुन रही हो और आपसे वो कह रही हो जो आप और से सुने की आपेक्षा रखते हो मगर कभी सुन नहीं पाते उस वक्त प्रकृति एक ऐसे दोस्त के रूप में सामने होती है जो आपकी हर बात सुनने समझने को तैयार है बिना किसी शर्त के बिना किसी शिकायत के जो हर नज़रिये से आपके साथ है यदि आप खुश हो तो वो खुश है और यदि आप दुखी हो तो दुखी भी है बस यह सब देखने की नज़र चाहिए यह सब सिर्फ ओर सिर्फ केवल अपने ही घर में संभव हो पाता है किसी और के घर में यह सुख कहाँ ,इसलिए मुझे प्यार है अपने इस छोटे से मगर मेर इस अपने आशियाने से क्यूंकि कुछ बातें खामोशी के साथ ही और खामोशी के बाद भी बहुत अच्छी लगती है...

Tuesday 27 March 2012

जनरल: बेईमानों का राज बदल दो ...


     सेनाध्यक्ष जनरल वी के सिंह के मामले मे मैने छह महीने पहले ही कहा था कि आर्म्स दलालों की एक बहुत बड़ी लाबी नहीं चाहती कि श्री सिंह सेनाध्यक्ष के पद पर बने रहें। इसी लाबी ने उनकी जन्मतिथि को लेकर एक बड़ा विवाद खड़ा किया। वजह कुछ और नहीं बस ये कि जनरल जितने दिन कुर्सी पर रहेंगे, दलालों की नहीं चलेगी। दरअसल भ्रष्टाचार की बात होती है तो हम बिजली, सड़क, हैंडपंप जैसी बुनियादी जरूरतों वाली जगह खोजने लगते  हैं, जाहिर है यहां भी भ्रष्टाचार है, पर सेना में जिस तरह का करप्सन है, वहां तक हम सोच भी नहीं पाते। मतलब हम सब भारत का भ्रष्टाचार देखते हैं इंडिया के करप्सन तक हमारी पहुंच ही नहीं है।
     सेना में बड़ी संख्या में लड़ाकू विमान, तोप, गन और वाहनों की खरीददारी प्रस्तावित है। सेना में खरीददारी एक ऐसा विषय है जिस पर छोटे से लेकर बड़े या कहें रक्षा मंत्रालय तक की नजर लगी रहती है तो कहना गलत नहीं होगा। सबका बंधा है, इस मामले में सेना के  डिसीप्लीन का कोई जवाब नहीं है। सब की चीजें सब तक पहुंच जाती हैं, कहीं चूं चां नहीं होता है। पर इस सिस्टम में कोई इक्का दुक्का सिरफिरा ईमानदार अफसर आ जाए तो पूरा महकमा हिल जाता है और फिर उस ईमानदार अफसर के खिलाफ  सारे अफसर एकजुट होकर लाबिंग करते हैं। लाबिंग में सिर्फ देश के लोग ही शामिल नहीं होती हैं, बल्कि दूसरे देश के लोग भी इसमें शामिल रहते हैं।
     कहा जाता है कि रक्षामंत्री ए के एंटोनी ईमानदार हैं, मुझे भरोसा नहीं है। दरअसल हमारे देश में ईमानदारी की जो परिभाषा है, वो पचासों साल पुरानी है। हम पैसा नहीं लेते तो हम ईमानदार हो गए, इस सोच से हमें ऊपर उठना होगा। होना ये चाहिए कि अगर आप पूरे सिस्टम को दुरुस्त रखने में कामयाब नहीं हैं तो भी आप अपने काम के प्रति ना ईमानदार हैं और ना सक्षम। अब आप कहते रहें कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ईमानदार हैं, मैं तो नहीं मानता। उनके मंत्री एक से एक गोरखधंधे में शामिल हैं, काहे के ईमानदार हैं प्रधानमंत्री। रक्षामंत्रालय में चोर उचक्के हावी हैं, काहे के ईमानदार हैं ए के एटोंनी।
     रक्षामंत्री के लिए सबसे ज्यादा शर्मनाक भला क्या हो सकता है कि फौज में घटिया वाहनों  की आपूर्ति की जा रही है और हिम्मत देखें कि दलाल इसके लिए सेनाध्यक्ष को सीधे 14 करोड़ रिश्वत देने की पेशकश करता है। इसकी जानकारी एंटोनी को दी जाती है तो चुप्पी साध लेते हैं। हो सकता है कि मैं आवेश में कह रहा हूं लेकिन सैनिकों के जीवन से जिस तरह खिलाड़ किया जा रहा है,वो दिन दूर नहीं जब अफसर या मंत्री सरहद पर जाएं और अपने ही सैनिक इन्हें ठिकानें लगा दें।
     खैर मैं जनरल का इस बात के लिए सम्मान करता हूं कि उन्होंने सच कहने की हिम्मत की, जबकि वो जानते हैं कि सिस्टम में चोर अफसर ज्यादा ताकतवर होते हैं, वो सिस्टम को खरीदने में सक्षम होते हैं और ऐसे लोगों के मददगार भी बहुत होते हैं। कहा तो यहां तक जा रहा है कि वी के सिंह को कार्यकाल पूरा करने से पहले  ही कुर्सी से हटाने के लिए एक आर्म्स लाबी कई करोड़ रुपये सत्ता के गलियारे में इन्वेस्ट कर चुकी है। सच्चाई ये है कि इस मंत्रालय में मंत्री और अफसर से ज्यादा मजबूत दलाल हैं।
चलते - चलते...
     जनरल वैसे तो ये नारा  भाजपाई लगाते हैं कि  तख्त बदल दो, ताज बदल दो, बेईमानों का राज बदल दो। पर मैं आपसे भी कहना  चाहता हूं कि सेना से रिटायर होने के पहले इन बेईमानों का असली चेहरा जरूर जनता के सामने कर दें, ताकि हम दुनिया को बता सकें कि हमारे  फौजी जब दुश्मनों का मुकाबला करने के लिए सीमा पर तैनात होते हैं, तो उन्हें नहीं पता रहता कि उनके हांथ में जो बंदूक है, वो चलेगी भी या नहीं।

Monday 26 March 2012

....आ जा सिंहवाहिनी

आदिशक्ति      जगजननी      तू है    त्रिकालरूप ,
आज  तू    समाज  में      रहेगी    मातु    दाहिनी ।
शक्ति के समेत विष्णु , ब्रह्म, हे पुरारि नाथ ,
काली   हे    करालरूप         पाप-ताप     दाहिनी ।
साजि दे समाज आज भक्तों की भावना भी ,
करि    दे    अभय     पाहि माम     विश्वपाहिनी ।
मातु हंसवाहिनी तू      आ जा रे बजाती बीन ,
सिंह     पे     सवार मातु    आ जा सिंहवाहिनी ।

Friday 23 March 2012

विरुद-गीत भी व्यर्थ गाओ नहीं-

सही को सराहो बिराओ नहीं ।
विरुद-गीत भी व्यर्थ गाओ नहीं ।

किया इक तुरंती अगर टिप्पणी-
अनर्गल गलत भाव लाओ नहीं । 

करूँ भेद लिंगी धरम जाति ना 
खरी-खोटी यूँ तो सुनाओ नहीं ।

सुवन-टिप्पणी पर बड़े खुश दिखे 
मगर मित्र को तो भगाओ नहीं ।

टिप्पणी का जरा ब्लॉग देखो इधर-
रूठ कर इस तरह दूर जाओ नहीं ।। 

दिनेश की टिप्पणी - आपका लिंक 

अनर्गल-अनर्गल-अनर्गल-टिप्पणी-

(१)
मैया माहिर शायरा, बेटी चैटिंग क्वीन ।
अब्बू रोटी सेकते, बेटा ब्लॉग प्रवीन
बेटा ब्लॉग प्रवीन, पराठे बन न पायें ।
बेढब अब्बू लीन, अंगुलियाँ जल-जल जायें ।

"रविकर" चीखे जोर, उलटती तेल कढ़ैया ।
देह जले अति घोर, पुकारे दैया-मैया ।। 


(२)
मुशायरा भोपाल का, मैया लेती लूट ।
पर अब्बू की चाल से, पड़ती घर में फूट ।

पड़ती घर में फूट, जले पर रखने मरहम
मिली नर्स को छूट, मिटाई रविकर हरगम ।


 
गई रोटियां फूल, फैलता फला दायरा ।
मैया मन मशगूल, लूटती हर मुशायरा ।। 

Thursday 22 March 2012

बहुत बोले! करके दिखावो तो जानें!!

जिस देश में मेहनत और ईमानदारी से किए गये कार्यों के पारिश्रमिक की भी प्राप्ति हेतु आवश्यक रूप से घूस देना पड़ता हो तो उस देश का भविष्य क्या हो सकता है? आप सभी अनुमान कर सकते हैं कि विद्यालयीय कार्मिकों की कोई भी ऐसी कमाई नहीं होती जिसे आमतौर पर ऊपरी कमाई कहा जाता है। अब उसे भी यदि अपना वेतन भुगतान कराने के लिए घूस देना पड़े तो उसकी हालत क्या होगी? आप सोच रहे होंगे कि मैं यह क्या मामला उठा बैठा? तो साहब बता दूं कि वह दुर्भाग्यशाली कर्मी मैं ही हूँ। हम लोगों का वेतन क्षेत्रीय शिक्षा निदेशक कार्यालय, लखनऊ से पास होता है। वहां का एक बाबू, जो हमारे विद्यालय को डील करता है, की नज़ाक़त यह कि बगै़र पैसा लिए वह आपसे बात करने के लिए सर तक नहीं उठाता। छठे वेतनमान के मद्देनज़र हमारा वेतन निर्धारण होना था। उसके लिए उसने दो बार घूस लिया हमारी मज़बूरी कि दिये। अब उसका एरियर पास होना है नहीं तो आगामी सत्र के लिए लटक जायेगा। मार्च का महीना है, फरवरी का वेतन भी पास होना है यदि इस महीने में नहीं पास हुआ तो मई तक जाकर मिल पायेगा। हमारी मज़बूरी उसकी चांदी हो गयी। हर क़दम पर वह पैसा मांग रहा है वह भी जबरन। न दें तो तीन महीने घर का ख़र्च कैसे चले। हम लोगों की ऊपरी कमायी कुछ है नहीं। क्या करें? हमने सोचा कि बहुत सारे ब्लॉगर भाई हैं जो भ्रष्टाचार पर इतना कुछ लिख मारे कि सैकड़ों पुस्तकें तैयार हो सकती हैं, बहुत सारे पत्रकार बन्धु भी ब्लॉग से जुड़े हैं जो इस मामले में हमारी मदद कर सकते हैं या अनेक अधिकारी वर्ग भी हमारी ज़मात में हैं जिनसे हम सहायता की अपील कर सकते हैं तो भला बताइए कोई है हमारे साथ हमारी मदद करने को तैयार? वह बाबू खुलेआम पैसा लेता है। उसके पास यदि आप एक घंटे खड़े हो जाइये तब तक कईयों से वह पैसा आपके सामने ही ले चुका होगा वह ढीठ। उसका स्टिंग ऑप्रेशन भी हो सकता है पर कोई सक्षम, हिम्मती, दिलदार तैयार हो यह सब करने को तब न नहीं तो भ्रष्टाचार के विरोध में केवल कहने और लिखने से कुछ नहीं होने वाला। अगर आप सदाचारी बुद्धिजीवी हमारे साथ हैं तो हम इस भ्रष्टाचार की लड़ाई लड़ने को तैयार हैं वर्ना मज़बूर हैं कि उसे उसका मनमानी घूस दें, अपना वेतन पास करायें और भ्रष्टाचार को मज़बूत बनायें। हम अपने परम सहयोगी, तेज़तर्रार पत्रकार बन्धु महेन्द्र श्रीवास्तव से विशेष आशा रखते हैं और जो भी कोई सदाचारी, जागरूक हमारा सहयोग करने को तैयार हों वे हमसे सम्पर्क कर सकते हैं फोन नं. 09532871044 तथा ईमेल- cm07589@gmail.com पर। हमें आपके मानसिक और भौतिक सहयोग की महती आवश्यकता है। इस मंच के माध्यम से ऐसी विकट समस्याओं के ज़ानिब हम ध्यान आकृष्ट कराना चाहते हैं अपने युवा और तेज़ मुख्यमन्त्री श्रीमान् अखिलेश यादव जी का भी।
                                                             -ग़ाफ़िल

Wednesday 21 March 2012

जीवन क्या है? जीवन या एक पहेली....

एक बेहतरीन लेखिका के एक ब्लॉग को पढ़कर मेरे मन में उठे कुछ विचार 
     गहराइयों मे जाकर भी सोचा है कभी कि यह जीवन क्या है ? समझ ही नहीं आता कि जीवन क्या है एक पहेली या एक हकीकत, जिसे समझते सुलझाते ही इंसान की तमाम उम्र गुज़र जाती है। मगर ज़िंदगी के अंतिम पड़ाव तक समझ नहीं आता कि यह जीवन आखिर था क्या? शून्य में निहारते हुए इंसान को अकेले में अक्सर कुछ प्रश्न आ घेरते है जैसे हम क्या चाहते हैं, क्यों चाहते हैं...जीवन हमें कैसा चाहिए जैसे सवाल। यूं तो हर इंसान दौहरी ज़िंदगी जिया करता है। हमेशा दो मुखौटों के साथ एक वो जो समाज और दुनिया को दिखाने के लिए होता है और एक वो जो खुद के लिए सच्चाई के आईने से कम नहीं होता। समाज और दुनिया के लिए लगाया गया मुखौटा अक्सर हम सभी रोज़ ही सुबह से अपने चहरे पर लगा लिया करते है, एक औपचारिकता भरी मुस्कान और जीवन के दो औपचारिक शब्द माफ़ करना और धन्यवाद के साथ और जब रात को अकेले में दिन भर की भागदौड़ के बाद जैसे ही सुकून के कुछ पल मिला करते है, तन्हाइयों के साथ तब अपने आप ही उतर जाता है,यह दिन भर से चढ़ा दिखावे का मुखौटा जैसे हटा हो कोई नकाब किसी अजनबी के चेहरे से,

तो तब अक्सर मन करता है निकल जाने को एक ऐसी सुनसान राह पर जहां तेज रोशनी उगलते ख़ाबों के बीच से गुज़रता कोई अपने आप सा खाली सा रास्ता तालाशता हुआ मन जहां हवा की सरसराहट से यहाँ वहाँ उड़ते सूखे पत्ते और बेवजह इक्का दुक्का निकलती गाडियाँ जिन्हें देखकर ऐसा महसूस होता है जैसे इनमें बैठे लोग भी बस भागे चले जारहे हैं अपनी दिन बार की ऊब को ख़त्म करने के लिए और उस अनदेखी अनजानी मंज़िल की तलाश में जिसका सफर है यह ज़िंदगी, ऐसे में जब हम दूर कहीं कोई पार्क में या बागीचे में ऐसे ही एक अधजले से टिमटिमाते बिजली के खंबे के नीचे पड़ी किसी बेंच पर जाकर झींगुरों और मच्छरों के शोर तले कुछ देर बैठे हुए जब अपने आप से मिलते हैं तब अकसर किसी एक पल का कोई टुकड़ा हमारा हाथ पकड़ के हमको ख्यालों की उस दूसरी दुनिया में लेजाता है और हम उसमें गुम हो जाते हैं। जहां हम तन्हा होकर भी खुद को कभी तन्हा महसूस नहीं किया करते और तभी अचानक जैसे  कहीं से कोई आवाज का सूरज उगता है यह कहते हुए कि इतनी रात गए यहाँ क्या कर रहे हो, चलो जाओ अपने घर और हम उस आवाज के साथ उन ख्यालों की दुनिया से बाहर आजाते हैं । तब अक्सर घर लौटे वक्त दिमाग में फिर एक खयाल दस्तक देता है।
     एक दुनिया हमारे अंदर भी है, जो बिकुल बाहरी दुनिया की तरह है। जहां रास्ते भी हैं, मंज़िले भी, जहां पहाड़ भी है,नदियाँ भी,जहां मौसम के रूप में बहार भी है, तो पतझड़ भी, प्यार भी है, तो नफरत भी, वो सब कुछ है जो हमें बाहर दिखाता है। जबकि दरअसल वह सब हमारे अंदर ही होता है। इन्हीं सब ख़यालों के बीच चलते हुए रात का अंचल पसरता जाता है और उस बागीचे से घर को लौटता वह रास्ता जिस पर चलकर हम खुद से मिलने गए थे छोटा होता चला जाता है और अंत में हम फिर वहीं आखड़े होते हैं जहां से चले थे कभी....शायद किसी ने ठीक ही कहा है "दुनिया गोल है"। लेकिन इन सब के बीच एक बात तो तय है, कि किसी भी इंसान को अकेले होने के लिए किसी सुनसान बियाबान जगह पर जाने की कोई जरूरत नहीं होती। हम इंसानों से, रिश्ते नातों से, भरे जंगल में भी अकेले हो सकते हैं। कभी भी, कहीं भी...जैसे वो गीतहै ना
"हर तरफ हर जगह बेशुमार आदमी 
फिर भी तन्हाइयों का शिकार आदमी"
     सोचते-सोचते लगता है उफ़्फ़ कितनी उलझन भरी है यह ज़िंदगी जिसका सफर है मगर मंज़िल कोई नहीं, शायद मंज़िल नाम की कोई चीज़ होती ही नहीं, सिर्फ सफर ही हुआ करता है। हाँ जब भी ऐसा लगता है, कि  हमको हमारी मंज़िल मिल गई, किन्तु तब वास्तव में वो मंज़िल नहीं जीवन के सफर का एक पड़ाव होता है।  जहां हम कुछ देर रुकते है और यह गुमान हो जाता है। कि यही तो है हमारी मंज़िल, मगर फिर थोड़े ही दिनों में यह अहसास भी हो जाता है, कि अभी कहाँ अभी तो दिल्ली बहुत दूर है। अभी तो बहुत कुछ है जीवन में जिसे अभी पाना है। अभी हम रुक नहीं सकते अभी तो बस चलते ही चले जाना है और हम फिर निकल पड़ते हैं उस अनजानी सी अनदेखी मंज़िल की ओर जीवन के इस पथ पर चलते-चलते कुछ हमसफर मिलते हैं ऐसा आभास सा होता है, लेकिन उनके बिछड़ते ही हम और अकेले हो जाते हैं। यानी शाश्वत है अकेला होना ही। तो क्यूँ न यह जीवन भी अकेले ही जिया जाये। क्या जरूरत है किसी के साथ की, यूं भी तो अब तक का सफर हमने अकेले ही तय किया है। क्यूंकि हमसफर भले साथ हो आपके मगर उसके बावजूद भी आपकी अपनी एक अलग दुनिया होती है जहां सिर्फ और सिर्फ आप होते हैं। आपके अंदर कि दुनिया बिना मुखौटे की दुनिया,जहां आप खुद से मिला करते हैं।  
तब कभी महसूस किया है, किसी नदी के किनारे बने 
किसी मरघट के दृश्य को
कहीं किसी के स्मृतिचिन्ह किसी पत्थर के रूप में दर्जहोते हैं 
तो कहीं थोड़ी थोड़ी दूरी पर आग भी होती है।   
जीवन भर की थकी हुई देहों को विश्राम देती आग. 
कहीं आग बस बुझने को हुआ करती है 
तो कहीं धू-धूकर जल रही होती है।   
तो कहीं मंथर गति से जल रही होती है  
मानो अपनी ही गति पर मुग्ध हो.
हर एक आग का अपना एक अलग ही दृश्य नज़र आता है
मगर उन चिताओं का भी 
अंत समय आने तक वहाँ कोई नहीं रुकता
और रहजाता है वहाँ भी फिर एक बार वही अकेलापन....प्रतिभा कटियार 
     यह जीवन का कैसा सत्य है। जहां इंसान का रिश्ता केवल उसकी साँसों पर टीका होता है। जहां साँसें ख़त्म वहाँ सब कुछ जैसे अचानक कहीं विलीन हो जाता है। सासों के रुकते ही शरीर अपवित्र हो जाता है। अपने ही घर में अपनी ही लाश छूत पाक का करण बन जाती है और जल्द से जल्द उसे अग्नि के सुपुर्द करने कि कोशिशें शुरू हो जाती है और शायद तब उस अग्नि में आहुति हम खुद ही रूह रूप में दूर खड़े हो दे दिया करते हैं। अपने अंदर उन बरसों से चल रहे प्रश्नो को, कि हम कौन है, हमारी मंज़िल क्या है कोई मंज़िल भी है या यह सफ़र ही है बस जो न रुकता है न थमता है बस केवल चला करता है। क्या पता इन जलती हुई चिताओं में इन सवालों कि आहुतियों के बाद भी इंसान को सुकून मिल भी पाता है या नहीं, इस अंतिम सफर के बाद भी यह जीवन-पहेली सुलझ भी पाती है या नहीं ????        

Tuesday 20 March 2012

हा हा हा...रेलमंत्री पर ही चढ़ गई रेल !


एक कहानी याद आ रही है, जब लोग बेवकूफी करते हैं तो ये कहानी उन्हें सुनाई जाती है। उन्हें बताया जाता है कि एक पहलवान था, बहुत ताकत थी उसमें, इसलिए उसे अपनी ताकत पर गुमान हो गया, एक दिन वो लोगों के बहकावे में आकर शेर से लड़ गया और शेर उसे मार कर खा गया। तब से कहा जाने लगा कि ताकत ही सबकुछ नहीं है दिमाग भी होना चाहिए, जिससे ताकत का सही इस्तेमाल हो सके।
     आइये अब चर्चा करते हैं इतिहास बन चुके पूर्व रेलमंत्री दिनेश त्रिवेदी की। त्रिवेदी जी अच्छी तरह जानते थे कि ममता बनर्जी सब कुछ बर्दाश्त कर सकती हैं,पर ट्रेन का किराया बढ़े वो इस बात कत्तई बर्दाश्त नहीं कर सकतीं। वैसे भी जब दो रुपये पेट्रोल या डीजल की कीमत बढ़ती है तो वो केंद्र की सरकार से समर्थन वापस लेने पर आमादा हो जाती हैं, ऐसे में भला ट्रेन का किराया बढ़ाना वो कैसे बर्दाश्त कर सकतीं थीं। सच तो ये है कि त्रिवेदी को ये बात पता थी कि रेल बजट के बाद हंगामा होना तय है। पर उन्हें लग रहा था कि कांग्रेसी उनका साथ देगें और वो ऐसे वीर रेलमंत्री कहे जाएंगे जिसने वो काम कर दिखाया, जिसकी हिम्मत लालू यादव और ममता बनर्जी नहीं कर सकीं। यानि दोनों किराया बढ़ाने की हिम्मत नहीं जुटा सके। पर ये क्या किराया बढ़ाने का प्रस्ताव रेल बजट में सुनते ही सबसे पहले विरोध शुरू किया उन्हीं की पार्टी टीएमसी ने। दरअसल सच ये है कि इस पूरे एपीसोड की स्क्रिप्ट सप्ताह भर पहले लिखी जा चुकी थी, मुझे रेलवे के ही एक वरिष्ठ अफसर ने ये बात बताई भी थी और इसकी चर्चा मैने अपने एडीटर से बजट पेश होने के पहले की भी। पर ये नेता हैं, इनकी बातों का कोई भरोसा नहीं करना चाहिए, ऐन वक्त पर पलट जाते हैं। लिहाजा मैने इंतजार किया बजट पेश होने का। बजट पेश हुआ और सभी घटनाक्रम ठीक उसी तरह हो रहे थे, जैसा मुझे बताया गया था। हां थोड़ा सा बदलाव ये था कि मुझे बताया गया था कि मंत्री डरपोक है, ममता जी फटकार के बाद तुरंत किराया वापस करने को तैयार हो जाएगा। लेकिन ममता ने बढ़े हुए किराए को कम करने की बात दूसरे नंबर रखी, पहला तो ये था कि वो श्री त्रिवेदी की शक्ल मंत्री रहते नहीं देखना चाहतीं। अब त्रिवेदी की समझ में ही नहीं आ रहा था कि वो करे तो क्या करें। क्या बोल रहे हैं, वो शायद खुद भी नहीं समझ रहे थे कि क्या कह रहे हैं। कहने लगे कि उनके लिए पार्टी बाद में है देश पहले। त्रिवेदी जी 24 घंटे बाद ही देश कहां चला गया, पार्टी क्यों पहले हो गई। यार देश का नाम रोशन ना करो तो गिराओ भी नहीं। कह रहे थे ममता इस्तीफा मांगेगी क्यों, इशारा भी कर दें तो इस्तीफा दे दूंगा, लेकिन जब पार्टी ने कहा इस्तीफा दो तो ममता से लिखित मांगने लगे। कह रहे थे कि जो बजट उन्होंने संसद में पेश किया है, उसे लावारिश नहीं छोडूंगा,  भाई फिर क्यों त्यागपत्र दे दिया, बर्खास्त होने का इंतजार करते।
     राजनीति में दिक्कत ही ये है कि लोग मंत्री बनते ही हवा में उड़ने लगते हैं, असलियत भूल  जाते हैं कि आखिर वो क्या हैं और कोई भी लड़ाई कहां तक लड़ सकते हैं। बहरहाल कुछ ऐसे मंत्री होते हैं, जो " ही " में ना " सी " में फिर भी पांचो ऊंगली घी में होती है। त्रिवेदी भी उन्हीं में से एक हैं, क्योंकि ये ममता के सामने कोई तर्क दे ही नहीं पाएंगे, कांपने जरूर लगेंगे। बहरहाल नासमझ मंत्री होता है तो अफसरों के मजे होते हैं, पूरे साल रेल अफसरों ने खूब मजे लिेए। मंगलवाल को बदलाव के बाद भले ही मुकुल राय रेलमंत्री बन जाएं, पर यहां उनका सामना ऐसे अफसरों से होगा, जितनी मुकुल राय की उम्र है, उतनी वो नौकरी कर चुके होंगे। खैर..
    चलिए चलते-चलाते एक आंकडे़ की जानकारी आपको दे दूं। ममता बनर्जी कह रही हैं कि जनरल क्लास और स्लीपर क्लास का बढ़ा किराया वापस होना चाहिए। दोस्तों जो किराया बढ़़ाया गया है, उससे रेलवे को सालाना छह हजार करोड़ रुपये की आमदनी होगी। रेलवे में रोजाना कुल दो करोड़ 20 लाख यात्री सफर करते हैं, इसमें महज आठ फीसदी लोग ही अपर क्लास यानि एसी फर्स्ट, एसी टू और एसी थ्री के होते हैं। अगर जनरल और स्लीपर क्लास के यात्रियों से बढ़ा किराया वापस ले लिया गया तो चार हजार पांच सौ करोड़ रुपये की आमदनी बंद हो जाएगी, रह जाएगा 1500 करोड़ रुपये तो अपर क्लास पर सर्विस टैक्स का प्रावीजन आम बजट में किया गया है। अभी ये साफ नहीं है कि सर्विस टैक्स यात्रियों को देना होगा या फिर रेल मंत्रालय देगा। अगर रेल मंत्रालय को देना पड़ा तो छह सौ करोड़ रुपये और निकल जाएंगे, बचेगा सिर्फ 900 करोड़ रुपये और नौ सौ करोड़ रेलवे की नजर में कुछ नहीं होता।
     बहरहाल पूर्व रेलमंत्री दिनेश त्रिवेदी मुंगेरी लाल के हसीन सपने देखने के चक्कर में अपनी कुर्सी भी गवां बैठे और रेलवे का भी बंटाधार कर दिया। वो साल भर रेलमंत्री रहे हैं, कुछ कुछ चीजें उन्हें समझ में आ रहीं थीं, अब फिर कोई नया आदमी साल भर समझेगा, खैर रेलवे का भगवान मालिक है।

Sunday 18 March 2012

भरो टैक्स दो लाख पर


पाई बढ़ सीमा नहीं , उम्मीदों अनुसार |
भरो टैक्स दो लाख पर, कहती है सरकार ||
कहती है सरकार , अमीर हैं कर्मचारी |
वेतन लेना काट , भले महंगाई भारी ||
मुलाजिमों ने विर्क , मार है गहरी खाई |
गिरता जीवन स्तर , सेलरी आधी पाई ||

* * * * *

Friday 16 March 2012

मेरे भारत रत्न, नई खुशियाँ नित पाओ --

जीते जो तेदुलकर, जो मारे सो मीर ।
शतक मीरपुर में लगा, कब से सभी अधीर ।
 
Sachin Tendulkar celebrates after he scored his 100th international century during their Asia Cup one- day international.
कब से सभी अधीर, बजट ने बहुत रुलाया ।
सही समय पर शतक, सचिन ने धैर्य बंधाया ।
 
मेरे भारत रत्न, नई खुशियाँ नित पाओ ।
रहो हमेशा स्वस्थ, सदा भारत हरसाओ ।।  

Thursday 15 March 2012

पर क्यूँ रही बरस, जरा बरसाओ ममता-


क्षमता से बढ़कर खटे, बरगद सा तृण-मूल ।
सदा हितैषी आम की, पर देती नित हूल ।

पर देती नित हूल, भूल जाती है खुदको ।
टाटा नहीं क़ुबूल, रूल दुश्मन था, फुदको ।

  पर क्यूँ रही बरस, जरा बरसाओ ममता ।
बत्तीस रूपये पाय, बढ़ी पब्लिक की क्षमता ।।

Sunday 11 March 2012

कलयुग की है मार


बुराई  रही जीत है , अच्छाई की हार | 
सब पासे उलटे पड़े , कलयुग की है मार ||
कलयुग की है मार, राम पे रावण भारी |
हार रहा है धर्म , जीतती दुनियादारी ||
काम बुरे सब छोड़ , सीखना तुम अच्छाई |
कहे विर्क कविराय , जगत से मिटे बुराई ||

* * * * *

Friday 9 March 2012

यू पी लुटी बहार, हुई है स पा मीनिया--

टेनिया को बोला गया,  जमा करो सौ हार । 
अपनी पार्टी का बढ़े, यू पी में आधार । 
Photobucket
यू पी में आधार, तीन पीढ़ी आ धमकी ।
राहुल में है धार, नहीं है सौ से कम की । 

Congress leader Rahul Gandhi
लेकिन लुटी बहार, फैलती स पा मेनिया ।
लेत धुरंधर हार, हार पर बचे टेनिया ।।
Akhilesh Yadav: the making of a leader

Wednesday 7 March 2012

होली है...

मेरी ओर से आप सभी को इस रंगों भरे पावन त्यौहार की रंगबिरंगी हर्ष और उल्लास से परिपूर्ण अनेक-अनेक हार्दिक शुभकामनायें....

आया होली का त्यौहार लेकर रंगों की बौछार
चारों और छाया रंग ,
हर कोई झूम रहा है देखो
होली में पीकर भंग
न कोई गोरा न कोई काला
सबके बंद दिलों का जैसे खुल गया हो ताला
बच्चे खेले गुबारों से और लिए हाथ पिचकारी
न न करती गोरी देखो भीग रही बेचारी ....

कहीं खिले है रंग बसंती ,कहीं उड़ा हुआ है रंग
कोई खाये गुजिया मेवे कोई है रोटी को तंग
कोई मचा रहा हुड़दंग, कोई उड़ा रहा है रंग
परीक्षाओं ने उड़ा दिया है, कई चेहरो का रंग

होली के दिन मन करता है होली कभी न जाये 
जो जाये नहीं भईया कोई तो लौट के कैसे आए 
जीवन भी तो होली का ही है एक त्यौहार
अनुभवों के रंग बिखरते, रहते जहां दिन रात
नीला, पीला, लाल, गुलाबी ,खट्टा, मीठा, तीखा, फीका
हर स्वाद है रंग, 
तो क्यूं न भईया जीवन को भी माने होली का एक रंग और जीलें इसके संग

"क्यूंकि हर घड़ी बदल रही है, रूप ज़िंदगी 
छाँव है कभी-कभी है धूप ज़िंदगी 
हर पल यहाँ जी भर जियो 
जो है समा ,कल हो न हो"......  

Monday 5 March 2012

.चित में समाई है

चिड़ियन सी चहक चमक चंचलता चपला सी ,
चंदा   की चांदनी सी     चित की   शितलाई   है ।
चन्दन   सी   चारु महक     चटकीली   चंपा  सी ,
चकित    चकात       चाम   चटक        गोराई है ।
कुचन   कचोट    चोट चितवनि   सुलोचनि की ,
रुचिर       सुचक्री        चितचोरनी       बनाई है ।
चकई       चकोर प्रीति       चलत सुचाल ब्याल  ,
चित   चोरिबे      को      चली  चित में समाई है । 

Saturday 3 March 2012

रूठ जाये ना गोरी--रविकर

 दोहे 
शिशिर जाय सिहराय के, आये कन्त बसन्त ।
अंग-अंग घूमे विकल, सेवक स्वामी सन्त ।

मादक अमराई मुकुल, बढ़ी आम की चोप ।
अंग-अंग हों तरबतर, गोप गोपियाँ ओप ।।

जड़-चेतन बौरा रहे, खोरी के दो छोर ।
पी पी पगली पीवरी, देती बाँह मरोर ।।

सर्षप पी ली मालती, ली ली लक्त लसोड़ ।
कृष्ण-नाग हित नाचती, सके लाल-सा गोड़ ।।

ओ री हो री होरियां, चौराहों पर साज ।
ताकें गोरी छोरियां, अघी अभय अंदाज ।


कुंडली 

गोरी कोरी क्यूँ रहे, होरी का त्यौहार ।
छोरा छोरी दे कसम, ठुकराए इसरार ।

ठुकराए इसरार, छबीले का यह दुखड़ा ।
फिर पाया न पार, रँगा न गोरी मुखड़ा ।

लेकर रंग पलाश,  करूँ जो जोरा-जोरी ।
डोरी तोड़ तड़ाक,  रूठ जाये ना गोरी ।।

Friday 2 March 2012

अन्ना दादा! वो भ्रष्टाचारी तो हम महाभ्रष्टाचारी

     अन्ना दादा! आप और हम सब मिलकर बहुत हल्ला मचा लिए भ्रष्टाचार पर। राजनेताओं और तन्त्र पर आरोप लगाते-लगाते, अनशन करते-करते और धमकी देते-देते हम सब ऊब चुके तो हम यू.पी. वालों ने राजनेताओं से अबकी चुनाव में पूरा-पूरा बदला ले लिया। घबराने की कोई ज़रूरत नहीं है। अपने भ्रष्टाचार के बूते राजनेतागण जितना पैसा बतौर घूस जनता से वसूलते पांच सालों में उससे कई गुना ज़्यादा हम लोगों ने वसूल कर लिया। जितने उम्मीदवार खढ़े थे एक-एक से पैसा लेकर वोट दिया है हम लोगों ने। अब वे कमाते रहें पांच वर्ष भरपाई नहीं कर पायेंगे। वे भी सोचें कि भ्रष्टाचारी को कोई महाभ्रष्टाचारी मिला। एक-एक वोट की क़ीमत वसूली है हम लोगों ने सभी उम्मीदवारों से और हाथ भी जुड़वाये तथा पैर पर भी गिरवाये तिस पर तुर्रा यह कि वोट दिया किसी एक को। अगर न यक़ीन हो तो आइए हमारे गांव हजारों गवाहियां पेश कर दूंगी।
     अतः अब रामलीला मैदान में जमावड़ा करने की आवश्यकता नहीं। बेचारे नेतागण कितना कमा लेंगे पांच सालों में। हम लोगों ने प्रत्येक का करोड़ों रूपये ख़र्च करवा दिया। न करें वे हमारे बिजली-पानी की व्यवस्था। शिक्षा और स्वास्थ्य की भी आवश्यकता नहीं। अब हम उनसे शिकायत नहीं करेंगे। हमने अपने वोट की पूरी क़ीमत वसूल कर ली। लगाएं वो हमसे होड़ भ्रष्टाचारिता में। वो शेर तो हम सवा शेर। सो अन्ना दादा! अब आप निश्चिन्त होकर अपने घर बैठिए और स्वास्थ्यलाभ लिजिए। आपकी उम्र भी तो किनारे है कितना जद्दोज़हद करेंगे हमारे लिए? अब हम योग्य और कुशल हो चुके हैं।। तन्त्र और राज-व्यवस्था की शिकायत करने की कोई आवश्यकता नहीं। हम अपने सचेत लेखकों, ब्लॉगरों, कार्टूनिस्टों, व्यंग्यकारों से भी आग्रह करते हैं कि भैया! नेताओं से हम यू.पी. वालों ने पूरा-पूरा दाम वसूला है अपने वोट का और उन्होंने दूना पैसा देकर ख़रीदा है तो अगले पांच वर्षों तक उन बेचारों को बख़्श ही दो। न लिखो उन पर कोई व्यंग्य, न बनाओं उनका कोई कार्टून तथा न कहो उनको भ्रष्टाचारी। यदि आपका शौक चर्राये ही इन सब विशेषणों के उपयोग करने का तो राजनेता या तन्त्र पर नहीं हम जनता पर प्रयोग करो इत्मिनान से, अब हम भी उस लायक हो गये हैं। हमारी योग्यता पर शक मत करना। नेताओं के पैसों से अब भी भरी हमारी जेब इसकी सनद है।
(चित्र गूगल से साभार)
                                                                                                                         -शालिनी




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