Sunday, 29 April, 2012

हाइगा


Saturday, 28 April, 2012

झारखण्ड की दुर्दशा, बढ़े साल दर साल-

 (१)
खनिज सम्पदा लूट के,  होते मालामाल ।
झारखण्ड की दुर्दशा,  बढ़े साल दर साल ।

बढ़े साल दर साल, स्वार्थी अफसर नेता ।
नक्सल पुलिस दलाल, आम-जनता को रेता ।

हुई व्यवस्था ध्वस्त, सहे जनता दुःख-विपदा ।
बर-बंडी सब मस्त,  लूटते  खनिज संपदा ।।
(२)
परिजन को बरगला के, तस्कर दुष्ट दलाल ।
महानगर में बेंच दें, लाखों बाला-बाल ।

लाखों बाला-बाल,  सड़ें बंगले में जाकर ।
करते सारे काम,  पेट भर झापड़ खाकर ।

पप्पी से कर द्वेष, जलाये पप्पू मन को ।
सहता रहे कलेश,  कोस के घर परिजन को ।।
 
(३)
महानगर में खट रहे, लाखों औरत मर्द ।
तारकोल सीमेंट से, लिखते जाते दर्द । 

लिखते जाते दर्द, व्यथा बढती ही जाए ।
सरपट दौड़े सड़क, नगर पुल भवन बनाए । 

किन्तु श्रमिक परिवार, भटकता रहा डगर में ।
शिक्षा-स्वास्थ्य बगैर, गुजरता महानगर में ।।

Friday, 20 April, 2012

प्यास बुझी ना बावली, ले ले बच्ची गोद-

प्यास बुझी ना बावली,  किया वारुणी पान ।
हुआ बावला इस कदर, भूल गया पहचान ।।  

प्यास बुझी ना बावली, ढूंढे सलिल अथाह । 
गया बावला दूर अति, पकड़ समन्दर राह ।। 

प्यास बुझी ना बावली,  बैठ घास पर जाय ।
शबनम बिखरी चमकती, जाती प्यास बुझाय ।। 

प्यास बुझी ना बावली,  प्रभु चरणों में बैठ ।
चरणामृत का पान कर, अपने कान उमेठ ।।

प्यास बुझी ना बावली, करले इक तदवीर ।
वृद्धाश्रम जा घूम ले, पी ले उनकी पीर ।।

प्यास बुझी ना बावली, ले ले बच्ची गोद ।
अश्रु-कणों का पान कर, जीवन कर सामोद ।।

Sunday, 15 April, 2012

आई बैसाखी

हाइगा


*********************

Friday, 13 April, 2012

तो रक्त-कोष की पहरेदारी, नर-पिशाच के जिम्मे आई

चालबाज, ठग, धूर्तराज   सब,   पकडे   बैठे   डाली - डाली |

आज बाज को काज मिला जो करता चिड़ियों की रखवाली |


गौशाला मे धामिन ने जब, सब गायों पर छान्द लगाया |
मगरमच्छ ने  अपनी हद में,  मछली-घर मंजूर  कराया ||  


महाघुटाले - बाजों   ने   ली,  जब तिहाड़ की जिम्मेदारी |

जल्लादों ने झपटी झट से,  मठ-मंदिर की  कुल मुख्तारी ||



अंग-रक्षकों  ने  मालिक  की  ले ली  जब से मौत-सुपारी |

लुटती  राहें,   करता  रहबर  उस  रहजन  की  ताबेदारी  ||



शीत - घरों  के  बोरों  की  रखवाली  चूहों  का  अधिकार |

भले - राम   की   नैया   खेवें,  टुंडे - मुंडे   बिन   पतवार ||


तिलचट्टों ने तेल कुओं पर, अपनी कुत्सित नजर गढ़ाई |
तो रक्त-कोष  की  पहरेदारी,  नर-पिशाच के जिम्मे  आई |
 

Thursday, 12 April, 2012

रहता रविकर मस्त, गधे से दुनिया जलती

नई-गलती 


गलत कभी भी ना करें, केवल दो इंसान ।
महा-आलसी का-हिली, बेवकूफ नादान । 

बेवकूफ नादान, समझ न पाता गलती ।
रहता रविकर मस्त, गधे से दुनिया जलती ।

 महा-आलसी काम, करे ना खुद से कोई ।
फिर गलती बदनाम, कहाँ से क्यूँकर होई ।।

 

 

23 June, 2011

को प्रकाशित

  पुरानी गलती

गलती कर कर के बने, महा-अनुभवी लोग |



शान्ति-प्रिय होते सदा, जिनको प्रिय सम्मान |
करते छल हद तोड़  कर,  माया जिनके प्राण |  

माया   जिनके   प्राण,    डुबाते   सारे   रिश्ते |
शांतिप्रिय  जो लोग,  आज  के  वही फ़रिश्ते |

पर रविकर यह शांति,  नहीं श्मशान घाट की |
करता पूजा कर्म,  जिन्दगी जिए ठाठ  की || 


*          *          *          *           *           *

गलती कर कर के बने, महा-अनुभवी लोग |
महाकवि बनता कोई, सहकर  कष्ट वियोग |

सहकर कष्ट वियोग, गलतियाँ  करते जाएँ  |
किन्तु रहे यह ध्यान, उन्हें फिर न दोहराएँ |

कह रविकर सन्देश, यही है  श्रेष्ठ-जनों का  |
पंडित "शास्त्री" संत, आदि सब महामनों का || 


&          &             &              &          & 

बिकता है हर आदमी, भिन्न-भिन्न है दाम |
सच्चा मोल चुकाय वो, पड़ता जिसको काम |

पड़ता  जिसको  काम , खरीदे  देकर  पैसा  | 
करता  न  सम्मान,   करे  बदनाम   हमेशा |

पर रविकर यदि प्यार, ख़रीदे तुम्हें तोल के -
बिक जाना तुम यार, वहाँ पर बिना मोल के ||

Tuesday, 10 April, 2012

यूपी सरकार का काला सच...


     सोच रहा हूं कि आज आपको कुछ नई भले ना हो लेकिन रोचक जानकारी दूं। आपको पता है यूपी मंत्रिमंडल के 80 फीसदी से ज्यादा मंत्रियों की रात की नींद उड़ी हुई है। दरअसल मंत्रियों को लग रहा था कि शपथ लेते ही उनकी कमाई शुरू हो जाएगी,  क्योंकि यूपी में ट्रांसफर पोस्टिंग आज भी  मंत्रियों और बड़े नौकरशाहों की कमाई का एक प्रमुख जरिया है। अब नई सरकार आई है तो उसे पुरानी सरकार के अफसरों को तो हाशिए पर लाना ही है, लेकिन मुश्किल ये है कि यूपी के अफसरों को ना जाने क्या हो गया है कि वो खुद प्रयास ही नहीं कर रहे हैं कि उन्हे मनचाही पोस्टिंग दे दी जाए।
     अब अगर कोई अफसर प्रयास नहीं कर रहा है तो भला वो पोस्टिंग के लिए पैसे क्यों देगा। सुना है कोने  में बैठे किसी तरह दिन काट रहे अफसरों को फोन जाता है कि आप कुछ नई जिम्मेदारी उठाने के लिए तैयार हैं। अफसरों को पता है कि इस समय तो इनकी मजबूरी है, नई जिम्मेदारी देगें नहीं तो जाएंगे कहां, मायावती के शासन में मलाई काट रहे अफसरों की छुट्टी तो होनी ही है। लिहाजा किनारे पड़े अफसर भी कहते हैं कि ना जी मैं तो ठीक ठाक हूं। बच्चों की पढाई भी लखनऊ में बेहतर तरीके चल रही है, लिहाजा मुझे कोई दिक्कत नहीं है।
     ऐसे में जब किसी अफसर को कोई खास पद चाहिए ही नहीं, वो कहीं भी खुशी से नौकरी करने को तैयार बैठा है, तो बेचारे मंत्रियों की नींद तो उड़नी ही है। अफसरों की इस बेरुखी से एक जाति विशेष यानि यदुवंशियों का भाग्य खुल गया है। यादवों का भाग्य ऐसा खुला है कि यूपी के नौकरशाह एक दूसरे ये चुटकुला सुनाते फिर रहे हैं। मुख्यमंत्री किसी अफसर से नाम पूछतें हैं तो अफसर अपना नाम कुछ इस तरह बताता है। सर मेरा नाम तो आर एन मिश्रा है, लेकिन घर में लोग मुझे प्यार से यादव जी यादव जी पुकारते हैं। सर ये नाम मुझे अच्छा भी लगता है। हो सकता है कि कुछ लोगों का भला नाम के चक्कर में हो जाए।
     चलिए एक खुलासा और सुन लीजिए, आप सोचते होंगे कि ये चौथा खंभा यानि पत्रकारिता, सब के सब बड़े ही ईमानदारल टाइप लोग.. ये बकवास है। आपको बताऊं सूबे  में थोड़ा भी आपकी हनक है तो आप एक दो दिन नहीं, घंटे भर में मुंबई के जुहू बीच में फ्लैट लेने की स्थिति में हो सकते हैं। मित्रों मैं कई राज्यों में नौकरी कर चुका हूं, पर सालिड पत्रकारों के लिए जिस तरह का कोटा यूपी  में है, वैसा कहीं नहीं है। यहां अगर आप थोडा भी रसूखदार पत्रकार हैं तो सूबे की सरकार का एक अलिखित संविधान है कि आप साल में एक इंजीनियर का ट्रांसफर पोस्टिंग करा सकते हैं। अब ये अलग बात है कि इंजीनियर आपका दोस्त है या क्लाइंट। ये बड़ा नंगा सच है। कहते हुए भी घिन आ रही है, पर है तो है।
     बहरहाल लोक निर्माण विभाग की हालत तो बहुत पतली है। यहां कर्मचारियों को तीन महीने से वेतन नहीं मिला तो इंजीनियर बेचारे कहीं पोस्टिंग लेकर भी क्या करेंगे। लेकिन इंजीनियरों को समझाया जा रहा है कि वो अच्छी जगह चुनें, सभी  जिलों को अच्छा फंड दिया जाएगा। उन्हें बताया जा रहा है कि विभाग की हालत भिखमंगों जैसी इसलिए हुई है कि मायावती ने सभी का फंड काट कर अंबेडकर पार्क में लगा दिया था, लेकिन अब ऐसा नहीं होगा। पीडब्ल्यूडी और सिंचाई विभाग के कुछ ठेकेदार अब एक बार फिर अपनी गाड़ियों में डीजल भरवाना शुरू किया है, उन्हें लग रहा है कि कुछ चमत्कार हो सकता है। वैसे इन दोनों विभागों का भगवान ही मालिक है।
     वैसे हेल्थ महकमा ऐसा है कि सरकार कोई भी हो, यहां का बजट खत्म नहीं कर सकती। यहां तमाम डिप्टी सीएमओ अभी से लखनऊ का चक्कर काट रहे हैं। सोनभद्र के सीएमओ के लिए तो एक पंडित जी ने 10 लाख रुपये की पेशकश भी मंत्री को कर दी है, लेकिन सीधे मंत्री को नहीं, उसके चेले को। चेले का दावा है कि पहली ही सूची  में पंडित जी का नाम होगा और वो सोनभद्र की कमान संभाल लेंगे। हां  एक बात तो बताना ही भूल  गया। खादी भंडार का बुरा हाल है। इस महकमें के मंत्री बने हैं वो पांच साल पहले भी इसी महकमें को देख रहे थे, बेचारे की कुर्सी गई तो अफसरों ने इनका कमीशन ही रोक लिया। अब दोबारा वहीं पहुंच गए हैं।पता कर रहे हैं कि फलाने साहब अब कहां है। हाहाहहा। कई तो अफसर रिटायर हो गए हैं, लेकिन मंत्री जी को उनका नाम अब भी याद है।
     कोई नहीं अभी तक मैं बातें हंसी मजाक में कर रहा था, पर मित्रों सच ये है कि यूपी में आज मंत्रियों पर नौकरशाह हावी हो गए हैं। मंत्री बेईमानी की बात करता है तो अफसर  पहले ही हाथ खड़े कर दे रहे हैं कि ये तो नहीं हो सकता। मंत्री पूछता है कि मंत्री आप हो या मैं। अफसर का जवाब  आता है कि मंत्री तो आप ही हैं, पर जो पहले चल रहा था, वो अब उस तरह से नहीं चल पाएगा। बराबर बराबर बंटेगा। पहले तो अफसर सिर्फ बदनाम होते थे, अब अफसरों का नाम होगा, मंत्री को बेईमानी झेलनी पडेगी। है ना मजे की। पूर्व मुलायम सिंह यादव समझ रहे थे कि बेटे को गद्दी सौंप कर वो गंगा नहाने चले जाएंगे। कैसे जा सकते हैं, बेचारे अखिलेश को ऐसी टीम दे दिया है, जिसमें चोट्टों की भरमार है। मुझे तो लगता है कि कहीं अखिलेश ही गुस्सा होकर अपने पापा श्री को बोल दे कि ये अपने पापी मंत्रियों को खुद ही संभालो। मुझे नहीं चाहिए बूढे और बेईमान मंत्रियों की फौज..।

Sunday, 8 April, 2012

मेरा देश

देश मेरे में
अजूबे ही अजूबे
करें नमन
लोग पैर छूकर ।
               धरती यहाँ 
               कहलाती माता
               गुरु का दर्जा
               ईश्वर से ऊपर ।
मान देवता 
हो पूजा प्रकृति की
कर्म जीवन  
फल देता ईश्वर ।
               चाहें दिल से
               करें रिश्तों की कद्र
               छोटों से प्यार
               दें बड़ों को आदर ।
नहीं बनाते 
पत्थर के मकान
लोग यहाँ पे
बनाते सदा घर ।
               न डरें कभी 
               न कभी घबराएं 
               आफत से भी
               मिलें मुस्कराकर ।
लगते मेले
ख़ुशी में नाचें लोग
भांति-भांति के
त्यौहार यहाँ पर ।
               दुःख बटाएँ
               अक्सर दूसरों का
               रहते लोग
               मदद को आतुर ।
क्या बताऊं मैं
विशेषता इसकी
नहीं समाती
कागज के ऊपर ।
                रंग अनेक
                भाषाएँ भी अनेक
                फिर भी एक
                हैरां है विश्व भर
                इसको देखकर ।


                         --------- दिलबाग विर्क 


           ***********************   
जापानी विधा -------- चोका 
वर्ण कर्म ------ 5+7+5+7----------- +7  
           ************************  

Saturday, 7 April, 2012

 आषाढ़ और भाद्रपद

रहे हाथ दोउ मींज, हुलकते आश्विन रानी

लाग-डांट आषाढ़ में, मास भाद्रपद बीच ।
हूर वास्ते लड़ रहे, विकट पडोसी नीच ।
विकट पडोसी नीच, करे सब पानी पानी ।
रहे हाथ दोउ मींज, हुलकते आश्विन रानी ।
कीड़े जहर पतंग, तंग दूल्हा हो जाता ।
कृष्ण जन्म को छोड़, भाद्र तू अशुभ कहाता ।।

अगहन  / मार्गशीर्ष 

रहा शीर्ष पर पूर्व, साल का पहला महिना
गहन सोच में पड़ गया, मार्ग शीर्ष पर आय ।
कैसे अव्वल बन रहूँ, चिंता रही सताय ।
चिंता रही सताय,  जोड़ियाँ बड़ी बनाईं।
प्राणिमात्र को भाय, लताएँ भी मुस्काई ।
करे कठिन नित कर्म, वेद का है यह कहना ।
रहा शीर्ष पर पूर्व, साल का पहला महिना ।।


पौष 

वृद्धों पर आघात, हुई है प्राकृत निष्ठुर

पूस-फूस सा उड़ रहा, ठंडी लम्बी रात ।
घनी धुंध में निकलती, चोरों की बारात ।
चोरों की बारात, बरसता पानी पत्थर।
वृद्धों पर आघात, हुई है प्राकृत निष्ठुर ।
होंय नहीं शुभ काम, घाम बिन व्याकुल जीवन ।
करो ओढ़ आराम, राम का करिए वन्दन ।

 बैशाख और मेघा / माघ 

पर नन्दन वैशाख,  नहीं मेघा को  प्यारा


मेघा को ताका करे, नाश-पिटा बैसाख ।
करे भांगड़ा तर-बतर, बट्टा लागे शाख ।
बट्टा लागे शाख, मुटाता जाय दुबारा ।
पर नन्दन वैशाख,  नहीं मेघा को  प्यारा ।
मेघा ठेंग दिखाय, चिढाती  कहती  घोंघा ।
ठंडी मस्त बयार, झिड़कती उसको मेघा ।।   

 चित्रा (चैत्र) 

फगुनाहटी सुरूर, त्याग अब कहती मित्रा


चित्रा के चर्चा चले, घर-आँगन मन हाट ।
ज्वार जवानी कनक सी, रही ध्यान है बाँट ।
रही ध्यान है बाँट,  चूड़ियाँ साड़ी कंगन ।
जोह रही है बाट, लाट होंगे मम साजन ।
फगुनाहटी सुरूर, त्याग अब कहती मित्रा ।
विदा करा चल भोर, ताकती माती-चित्रा ।।

आश्विन और कार्तिक  

पूजा का माहौल, प्रेम रस भक्ति मिला दे

चूमा-चाटी कर रहे,  उत्सव में पगलान ।
डेटिंग-बोटिंग में पड़े, रेस्टोरेंट- उद्यान ।
रेस्टोरेंट- उद्यान, हुवे खुब कसमे-वादे ।
पूजा का माहौल, प्रेम रस भक्ति मिला दे ।
नव-दुर्गा आगमन, दिवाली जोड़ा घूमा ।
पा लक्ष्मी वरदान, ख़ुशी से माथा चूमा ।। 

फागुन और श्रावणी 

तीन मास संताप, सहूँ मै कैसे निर्गुन

फागुन से मन-श्रावणी,  अस्त व्यस्त संत्रस्त
भूली भटकी घूमती,  मदन बाण से ग्रस्त । 
मदन बाण से ग्रस्त, मिलन की प्यास बढाये ।
जड़ चेतन बौराय, विरह देहीं सुलगाये ।
तीन मास संताप, सहूँ मै कैसे निर्गुन ?
डालो मेघ फुहार, बड़ा तरसाए फागुन ।।
 

आश्विन और ज्येष्ठ 

पर आश्विन इठलाय, भाव बिन समझे कुत्सित

आश्विन की शीतल झलक, ज्येष्ठ मास को भाय।
नैना तपते रक्त से, पर आश्विन  इठलाय ।
पर आश्विन इठलाय, भाव बिन समझे कुत्सित।
मर्यादित व्यवहार, ज्येष्ठ से हरदम इच्छित ।
मेघ देख कर खिन्न, तड़पती तड़ित तपस्विन ।
भीग ज्येष्ठ हो शांत , महकती जाती आश्विन ।।

Friday, 6 April, 2012

पता नहीं क्यों?

आजकल पता नहीं क्यों लिखने से
मन कतराता है...घबराता है
फिर उलझ-उलझ कर रह जाता है
समझ नहीं आता कि
क्या लिखूँ!
कहां से शुरू करूँ और कहां ख़त्म...
इसलिए आज इस लिंक से ही काम चला लीजिए-
                       'घर का न घाट का' 

Wednesday, 4 April, 2012

आखिर क्यूँ ?

     कहते है सच में माँ ,माँ ही होती है उसके जैसा और कोई दूसरा हो ही नहीं सकता. यह भी कहा जाता है की ईश्वर ने माँ इसलिए बनाई क्यूंकि वह खुद चाहकर भी हर वक्त हर जगह अपने बंदो की हिवाज़ात के लिए मौजूद नहीं हो सकता था। इसलिए उसने माँ को बना दिया शायद यही सच भी है, हम खुद हर दर्द ,हर तकलीफ में सबसे पहले माँ को ही याद करते हैं कभी हमारे मुंह से ऊई माँ निकलता है, तो कभी आई गा....मगर दोनों ही सूरते हैं तो माँ की ही क्यूंकि माँ बिना कहे ही अपने बच्चों के दिल कि हर बात समझ लेती है। क्यूंकि उसके बच्चे उस ही का तो अंश होते हैं, इसलिए दुनिया कि हर माँ को शत-शत नमन,
     मगर इस सब में अक्सर हम पिता के महत्व को लगभग भूल ही जाते है। आख़िर हम यह क्यूँ भूल जाते हैं कि यदि हमको दिल माँ ने दिया है, तो धड़कन पिता ने दी है। यदि माँ संस्कार देती है, तो पिता भी तो घर की  मनमोहक दुनिया के बाहर जो एक बेरहम दुनिया बसी है, उससे लड़ने का और जीतकर दिखाने का होंसला देते हैं, एक बालक के जीवन में उसके माता-पिता दोनों की ही बहुत अहम भूमिका होती है। मगर फिर भी सबसे ज्यादा क्रेडिट केवल माँ को ही दिया जाता है यहाँ तक कि कानून भी, माँ का ही साथ देता है। बेचारे पिता के बारे में तो कोई सोचता ही नहीं, जबकि माता-पिता तो सिक्के के वो दो पहलू हैं। जिनके बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती, मगर पिता के बारे में बहुत कम ही लोग लिखा करते हैं। ज्यादातर माँ के बारे में ही लिखा जाता है। माना की "गाय हमारी माता है तो बैल भी तो पिता हुआ न" मगर पूजा केवल गाय को जाता है। यह तो बहुत ना इंसाफ़ी है।
     यदि हम अपने बचपन की स्मृतियों को याद करें और यदि में मेरे अनुभवों की बात करूँ तो मुझे तो हमेशा अपने पापा से ज्यादा अपनी मम्मी से डर लगा करता था। जबकि आमतौर पर यह बात कम ही देखने को मिलता है बच्चे माँ के ज्यादा करीब होते हैं और मन में पिता का डर हुआ करता है। बचपन से ऐसा डर बनाया भी जाता है, कि देखो ऐसा नहीं किया तुमने तो पापा आकर डाँटेंगे, फिर मत रोना और न आना हमारे पास हम नहीं जानते, वैसे तो समान्यता यह भी देखा जाता है कि लड़के माँ के और लड़कीयाँ पिता के ज्यादा करीब होती है शायद इसलिए मैं मेरे पापा के ज्यादा करीब हूँ। जाने क्यूँ मम्मियाँ बात-बात पर बहुत डाँटा डपटा करती हैं ज़रा सी कुछ चूक हुई नहीं की सबसे पहले मम्मी का ही चहेरा नज़र आता है गुस्से वाला फिर भले ही चाहे एक बार को मम्मी उस चूक पर ना भी डांटे, जैसे जब रसोई में नया-नया कम करना सीखो तो अक्सर कोई न कोई भूल चूक होती ही रहती है। जैसे आंटा गूँदते वक्त पानी ज्यादा हो जाना यह बहुत ही आम बात है ,मगर जब भी ऐसा हो जाया करता था जान सुख जाती थी कि अब तो बस भगवान ही बचा सकता है। वरना आज तो गए काम से बहुत डांट पड़ने वाली है।
     यहाँ एक आंटे के विज्ञापन को देखकर मुझे यह बात महसूस हुई और मेरी यादें ताज़ा हो गयीं दिल छु गया मेरा यह विज्ञापन उसमें भी यही दिखाया गया है मगर बस उसमें पानी ज्यादा होने पर डांट नहीं पड़ी जो की असला ज़िंदगी में ज्यादातर पड ही जाया करती थी। :) ऐसे बहुत ही कम मौके होंगे जिसमें उम्मीद हो की डांट पड़ेगी और पड़े ना, फिर भी मम्मी के डांट के आदि हो जाने के कारण डांट का असर भी कम हो जाता है और यदि पापा एक बार सख्ती से कुछ बोल दें तो समझो वो पत्थर की लकीर।
     मगर मेरे साथ ऐसा नहीं था और न आजा है मेरे लिए मेरे पापा वो सब कर दिया करते थे जिसके लिए मम्मी कभी राज़ी नहीं होती थी :) लोगों को अक्सर पापा नारियल के समान लगते हैं पर से सख्त मगर अंदर से बहुत नर्म मगर माँ भी तो ऐसी ही होती है,हाँ इतना ज़रूर है कि माँ का प्यार दिखता है और शायद पापा लोग अपना प्यार वैसे दिखा नहीं पाते मगर करते तो वो भी उतना ही प्यार हैं जितना कि  माँ फिर भी पापा के ऊपर कोई कुछ क्यूँ नहीं लिखता ? आप भी इस विज्ञापन को देखिये और बताइये की इतनी सारी रोज़-रोज़ की डांट के बाद भी मम्मी ही क्यूँ याद आती हैं सबको और ढेर सारे लाड़ प्यार के बावजूद भी लोग पापा को खुलकर याद नहीं कर पाते आख़िर क्यूँ ? :)  

Monday, 2 April, 2012

उल्लू गधा कहो या रविकर

विद्वानों से डर लगता है , उनकी बात समझना मुश्किल ।
आशु-कवि कह देते पहले, भटकाते फिर पंडित बे-दिल ।

 अच्छा है सतसंग मूर्ख का, बन्दर तो नकुना ही काटे -
नहीं चढ़ाता चने झाड पर, हंसकर बोझिल पल भी बांटे ।

सदा जरुरत पर सुनता है, उल्लू गधा कहो या रविकर  
मीन-मेख न कभी निकाले, आज्ञा-पालन को वह तत्पर ।

प्रकृति-प्रदत्त सभी औषधि में, हँसना सबसे बड़ी दवाई ।
अपने पर हँसना जो सीखे, रविकर देता उसे बधाई ।।

लिखिए अपनी भाषा में

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