Sunday 2 September 2012

उमडे मेघा ( हाइकु )


बेचैन धरा
आषाढ ने सताया
बरसो मेघा |

आया सावन
छाई काली घटाएँ
नाचे मयूर |

उमडे मेघा
बरसे छमाछम
धन्य धरती|

हुई बारिश
खिल उठी प्रकृति
जैसे नवोढा |

देखो नजारे
रिमझिम बारिश
नहाते बच्चे |

बरसे पानी
ज्यों अमृत बरसे
जी उठी धरा |

घोर अँधेरा
गुम सुम मौसम
छाई है घटा |

कभी रूठते
कभी क्रोध दिखाते
मेघ सताते |

बरसो मेघा
है किसान व्याकुल
आस न तोड़ो |

विष की बूंदे
बेमौसमी बारिश
यूं है अमृत |

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